1
00:00:00,040 --> 00:00:04,560
नमस्कार, स्वागत है आपका महाभारत 
एक कंप्लीट सागा सीज़न फॉर में 

2
00:00:04,640 --> 00:00:08,600
आजम कुरुक्षेत्र के उस पल में उतर
रहे हैं जब तेरहवें दिन का सूरज 

3
00:00:08,600 --> 00:00:12,320
डूब चुका है। 
एक ऐसा दिन जिसने एक युवा नायक को

4
00:00:12,320 --> 00:00:16,680
छीन लिया और एक ऐसी रात को जन्म 
दिया जिसमें दुख, क्रोध और 

5
00:00:16,680 --> 00:00:21,600
प्रतिज्ञा की आग ने अगले दिन के 
युद्ध की कहानी शायद पहले ही लिख 

6
00:00:21,600 --> 00:00:24,120
दी थी। 
बिल्कुल, ये तेरहवें दिन की शाम 

7
00:00:24,120 --> 00:00:26,760
की कहानी है। 
दिन में युवा अभिमन्यु ने अकेले 

8
00:00:26,760 --> 00:00:29,520
ही कौरवों के चक्रव्यूह में 
प्रवेश किया था। 

9
00:00:29,600 --> 00:00:33,080
उसने अंदर ऐसा विनाश किया कि गौरव
सेना कांप उठी। 

10
00:00:33,200 --> 00:00:37,560
लेकिन जब उसने मदद के लिए पीछे 
देखा तो सिंधु देश के राजा जयद्रथ

11
00:00:37,560 --> 00:00:42,080
ने उसने भगवान शिव के वरदान का 
इस्तेमाल करके बाकी चारों पांडवों

12
00:00:42,080 --> 00:00:44,120
को क्यूँ के दरवाजे पर ही रोक 
दिया? 

13
00:00:44,120 --> 00:00:46,320
और अभिमन्यु क्यूँ के अंदर अकेला 
फंस गया? 

14
00:00:46,320 --> 00:00:49,160
एक दम अकेला। 
और ये जानना जरूरी है कि 

15
00:00:49,160 --> 00:00:52,080
चक्रव्यूह कोई साधारण मिलिट्री 
फॉर्मेशन नहीं है। 

16
00:00:52,080 --> 00:00:56,240
जी ये एक मल्टीलेयर्ड स्पिनिंग 
लेब्रंत की तरह है। 

17
00:00:56,280 --> 00:01:00,160
अच्छा, यहाँ हर लेवल पर और भी 
खतरनाक होते जाते हैं। 

18
00:01:00,400 --> 00:01:03,840
अंदर जाने का रास्ता जानना एक बात
है लेकिन बाहर निकलने का सीक्रेट 

19
00:01:04,120 --> 00:01:06,280
वो तो सिर्फ उसे बनाने वाले को 
पता होता है। 

20
00:01:06,320 --> 00:01:11,160
और अभिमन्यु को आधा ही ज्ञान था। 
हाँ, फिर भी उसने अकेले ही कर्ण, 

21
00:01:11,160 --> 00:01:15,160
द्रोण, दुर्योधन जैसे महारथियों 
को चुनौती दी और जब उसे हराना 

22
00:01:15,160 --> 00:01:19,280
असंभव हो गया तो युद्ध के सारे 
नियम तोड़कर कई महारथियों ने 

23
00:01:19,280 --> 00:01:22,120
मिलकर उस अकेले 16 साल के लड़के 
पर हमला किया। 

24
00:01:22,200 --> 00:01:24,360
और इस तरह अभिमन्यु वीर गति को 
प्राप्त हुए। 

25
00:01:24,360 --> 00:01:29,600
एक युवा नायक की ऐसी क्रूर मृत्यु
पांडव शिविर में उस शाम का माहौल 

26
00:01:29,600 --> 00:01:32,560
कैसा रहा होगा? 
ये सिर्फ एक सैनिक की मौत तो नहीं

27
00:01:32,560 --> 00:01:33,720
थी? 
नहीं, बिल्कुल नहीं। 

28
00:01:33,840 --> 00:01:38,920
ये एक बेटे, एक भतीजे की मौत थी, 
एक पूरी पीढ़ी की उम्मीद का अंत 

29
00:01:38,920 --> 00:01:41,240
था। 
वो माहौल मतलब शब्दों में बयां 

30
00:01:41,240 --> 00:01:44,280
करना मुश्किल है। 
हमारे स्त्रोत बताते हैं कि शिविर

31
00:01:44,280 --> 00:01:47,760
में मौत जैसा सन्नाटा था। 
युधिष्ठिर टूट चूके थे, वो खुद को

32
00:01:47,760 --> 00:01:51,040
दोष दे रहे थे। 
सुभद्रा का विलाप सुनकर तो कहते 

33
00:01:51,040 --> 00:01:55,360
हैं पत्थर भी पिघल जाए लेकिन जो 
दृश्य सबसे ज्यादा दिल दहलाने 

34
00:01:55,360 --> 00:01:59,480
वाला है वो कुंती का है। 
वो अपने पोते के शव के पास बैठकर 

35
00:01:59,480 --> 00:02:02,320
विलाप कर रही थी। 
ये हमें याद दिलाता है कि ये 

36
00:02:02,320 --> 00:02:04,880
सिर्फ राजाओं और साम्राज्यों की 
लड़ाई नहीं थी। 

37
00:02:04,920 --> 00:02:07,720
सही कहा। 
इसके केंद्र में परिवार थे, 

38
00:02:07,840 --> 00:02:12,280
रिश्ते थे और वो व्यक्तिगत दुख था
जो किसी भी जीत या हार से कहीं 

39
00:02:12,280 --> 00:02:13,040
ज्यादा बड़ा। 
था। 

40
00:02:13,040 --> 00:02:15,760
और यही तो इस युद्ध की सबसे बड़ी 
ट्रेजडी है। 

41
00:02:15,840 --> 00:02:20,480
एक तरफ इतना गहरा पर्सनल ग्रीफ और
दूसरी तरफ युद्ध का मैदान। 

42
00:02:20,680 --> 00:02:25,240
जो किसी के आंसू पोछने के लिए एक 
पल भी नहीं रुकता तो इस शोक के 

43
00:02:25,240 --> 00:02:29,520
साये में युद्ध कैसे आगे बढ़ा? 
युद्ध रुका नहीं, लेकिन उसका रूप 

44
00:02:29,520 --> 00:02:32,560
बदल गया। 
स्त्रोतों में एक बहुत ही मार्मिक

45
00:02:32,560 --> 00:02:36,040
घटना का जिक्र है। 
जब अभिमन्यु का खाली रथ शिविर में

46
00:02:36,040 --> 00:02:39,000
लाया गया तो सत्य की खुद उस रथ पर
चढ़ गए। 

47
00:02:39,080 --> 00:02:42,040
अच्छा। 
ये सिर्फ एक सिम्बोलिक अक्ट नहीं 

48
00:02:42,040 --> 00:02:45,800
था। 
ये एक ऐलान था कि एक योद्धा गिरता

49
00:02:45,800 --> 00:02:50,720
है तो दूसरा उसकी जगह लेता है। 
ये एक तरह की रीले रेस है जहाँ 

50
00:02:50,720 --> 00:02:53,440
मशाल एक हाथ से दूसरे हाथ में 
जाती है। 

51
00:02:53,440 --> 00:02:57,040
संघर्ष जारी रहेगा। 
लेकिन वो योद्धा कहाँ था जिससे ये

52
00:02:57,040 --> 00:03:00,760
मशाल उठानी थी? 
मैं अर्जुन की मनस्थिति के बारे 

53
00:03:00,760 --> 00:03:04,320
में सोच रही हूँ। 
वो तो उस समय युद्ध के दूसरे 

54
00:03:04,320 --> 00:03:09,080
मोर्चे पर थे जब वो लौटे होंगे और
उन्होंने अपने बेटे की मृत्यु का 

55
00:03:09,080 --> 00:03:13,640
समाचार सुना होगा। 
एक पिता का दुख और एक योद्धा की 

56
00:03:13,640 --> 00:03:17,000
विफलता। 
इन दोनों भावनाओं का टकराव कैसा 

57
00:03:17,000 --> 00:03:19,680
रहा होगा? 
ये टकराव इतना भयानक था कि स्रोत 

58
00:03:19,680 --> 00:03:23,560
बताते हैं अर्जुन पहले तो ये खबर 
सुनकर मूर्छित हो गए। 

59
00:03:23,600 --> 00:03:27,680
वो जमीन पर गिर पड़े। 
जब उन्हें होश आया तो पहले गहरा 

60
00:03:27,680 --> 00:03:30,520
दुःख था। 
वो कृष्ण से युधिष्ठिर से सवाल कर

61
00:03:30,520 --> 00:03:33,880
रहे थे लेकिन जब युधिष्ठिर ने 
उन्हें पूरी कहानी बताई। 

62
00:03:34,080 --> 00:03:38,880
कि कैसे ने पांडवों को रोका और 
कैसे निहत्थे अभिमन्यु को अधर्म 

63
00:03:38,880 --> 00:03:41,880
से मारा गया? 
तब वो दुख क्रोध में बदल गया 

64
00:03:41,880 --> 00:03:44,360
होगा। 
एक ज्वालामुखी की तरह वो दुख एक 

65
00:03:44,360 --> 00:03:46,120
ज्वालामुखी की तरह क्रोध में बदल 
गया। 

66
00:03:46,120 --> 00:03:50,120
और यही से उस प्रतिज्ञा का जन्म 
हुआ जिसने चौदहवीं दिन के युद्ध 

67
00:03:50,120 --> 00:03:53,000
की पूरी स्क्रिप्ट ही लिख दी। 
बिल्कुल दुख। 

68
00:03:53,400 --> 00:03:57,480
क्रोध और ग्लानी की उस आग में 
तपकर अर्जुन ने वो प्रतिज्ञा ली। 

69
00:03:57,800 --> 00:04:02,480
उन्होंने कहा मैं सत्य की शपथ 
लेता हूँ, कल सूर्या से पहले अगर 

70
00:04:02,480 --> 00:04:06,360
मैंने जयद्रा का वध नहीं किया तो 
मैं स्वयं अग्नि में प्रवेश कर 

71
00:04:06,360 --> 00:04:08,920
जाऊंगा। 
मैं स्वयं अग्नि में प्रवेश कर 

72
00:04:08,920 --> 00:04:12,120
जाऊंगा। 
ये सिर्फ एक धमकी नहीं थी, ये एक 

73
00:04:12,120 --> 00:04:16,760
वॉरियर्स कोड था। 
हाँ, एक ऐसा वचन जिससे पीछे हटना 

74
00:04:16,760 --> 00:04:21,920
मृत्यु से भी बदतर था। 
और ये एक मिलिट्री गैंबल भी था। 

75
00:04:21,920 --> 00:04:25,560
है ना आपने सही पकड़ा? 
ये प्रतिज्ञा सिर्फ भावनात्मक 

76
00:04:25,560 --> 00:04:31,400
नहीं थी, अर्जुन ने खुद को एक नॉन
निगोशिएबल डेडलाइन में बांध लिया।

77
00:04:31,480 --> 00:04:34,280
इसका मतलब था। 
कि चौदहवे दिन का युद्ध अब सिर्फ 

78
00:04:34,320 --> 00:04:38,720
सेनाओं के बीच नहीं बल्कि समय के 
विरुद्ध अर्जुन की एक पर्सनल रेस 

79
00:04:38,720 --> 00:04:41,960
बन गया था। 
उन्होंने को अपना टारगेट और अपनी 

80
00:04:41,960 --> 00:04:46,200
टाइमलाइन दोनों बता दी थी। 
लेकिन क्या ये सिर्फ संकल्प था या

81
00:04:46,200 --> 00:04:50,040
इसमें अहंकार का भी कोई अंश था? 
मतलब एक महायोद्धा के लिए 

82
00:04:50,040 --> 00:04:52,120
सार्वजनिक रूप से ऐसी प्रतिज्ञा 
करना। 

83
00:04:52,200 --> 00:04:57,840
ये एक बहुत अच्छा सवाल है और इसका
जवाब हाँ और नहीं दोनों है हाँ, 

84
00:04:58,160 --> 00:05:02,080
क्योंकि एक क्षत्रिय की प्रतिज्ञा
उसकी पहचान होती है, लेकिन यहाँ 

85
00:05:02,080 --> 00:05:06,160
अहंकार से ज्यादा एक पिता का 
न्याय के लिए संकल्प था। 

86
00:05:06,160 --> 00:05:09,520
अच्छा, कृष्ण ने भी अर्जुन को 
उनकी प्रतिज्ञा की भयावहता के 

87
00:05:09,520 --> 00:05:12,040
बारे में चेताया था। 
उन्होंने कहा कि ये तुमने 

88
00:05:12,040 --> 00:05:15,680
जल्दबाजी में किया। 
अब गौरव अपनी पूरी ताकत जयद्रथ को

89
00:05:15,680 --> 00:05:19,760
बचाने में लगा देंगे। 
तो अर्जुन ने अपने सबसे मुश्किल 

90
00:05:19,760 --> 00:05:24,160
मिशन को और भी ज्यादा मुश्किल बना
दिया था और ये मिशन इतना मुश्किल 

91
00:05:24,160 --> 00:05:24,960
था। 
के। 

92
00:05:24,960 --> 00:05:28,560
इसे पूरा करने के लिए सिर्फ 
मानवीय पराक्रम शायद काफी नहीं 

93
00:05:28,560 --> 00:05:31,200
था। 
जयद्रथ को बचाने के लिए द्रोण, 

94
00:05:31,400 --> 00:05:34,800
कर्ण, दुर्योधन जैसे योद्धा एक 
दीवार खड़ी कर देते। 

95
00:05:35,120 --> 00:05:39,400
इस दीवार को तोड़ने के लिए अर्जुन
को किसी दैवी शक्ति की जरूरत 

96
00:05:39,400 --> 00:05:42,240
पड़नी ही थी। 
और यही पर कृष्ण की भूमिका सामने 

97
00:05:42,240 --> 00:05:44,760
आती है। 
वो सिर्फ अर्जुन के सारथी नहीं 

98
00:05:44,760 --> 00:05:47,480
थे। 
वो उनके स्ट्रेटेजिस्ट और आप कह 

99
00:05:47,480 --> 00:05:50,080
सकते हैं। 
मेंटल कोच भी थे। 

100
00:05:50,280 --> 00:05:53,920
जब अर्जुन अपनी प्रतिज्ञा के बोझ 
तले दबे थे तो कृष्ण ने उन्हें 

101
00:05:53,920 --> 00:05:57,360
उनकी असली शक्ति याद दिलाई। 
उन्होंने अर्जुन को उनकी तपस्या 

102
00:05:57,360 --> 00:06:00,600
के बारे में याद दिलाया जो 
उन्होंने वनवास के दौरान की थी। 

103
00:06:00,800 --> 00:06:05,000
आप पशुपथास्त्र की बात कर रहे हैं
वो दिव्यास्त्र जो उन्होंने भगवान

104
00:06:05,000 --> 00:06:08,680
शिव से प्राप्त किया था। 
हाँ, कृष्ण ने अर्जुन से कहा कि 

105
00:06:08,680 --> 00:06:12,720
वो उस परम शक्ति का ध्यान करें। 
ये सिर्फ एक हथियार को याद करना 

106
00:06:12,720 --> 00:06:14,760
नहीं था। 
ये अपनी स्पिरिचुअल कोर्स से 

107
00:06:14,760 --> 00:06:18,040
कनेक्ट करना था। 
ये एक मॉडर्न डे टॉप एथलीट की तरह

108
00:06:18,040 --> 00:06:20,480
है। 
जो किसी बड़े फाइनल से पहले अपने 

109
00:06:20,480 --> 00:06:24,040
सालों की ट्रेनिंग और मेन्टल 
कंडीशनिंग पर फोकस करता है। 

110
00:06:24,040 --> 00:06:26,880
बिल्कुल सही एनालॉजी है। 
वो अपने इन्नर स्ट्रेंथ को चैनल 

111
00:06:26,880 --> 00:06:30,640
करता है और स्रोतों में इस 
आध्यात्मिक तैयारी का एक बहुत ही 

112
00:06:30,640 --> 00:06:31,440
अद्भुत वर्णन। 
है। 

113
00:06:31,440 --> 00:06:32,880
अच्छा। 
है। 

114
00:06:33,320 --> 00:06:37,320
स्रोत बताते हैं कि कृष्ण के कहने
पर अर्जुन ने उस रात भगवान शिव की

115
00:06:37,360 --> 00:06:40,240
आराधना की। 
और फिर उन्हें एक स्वप्न आया। 

116
00:06:40,400 --> 00:06:43,400
स्वप्न? 
हाँ, उस स्वप्न में वो कृष्ण के 

117
00:06:43,400 --> 00:06:47,320
साथ कैलाश पर्वत पर गए, जहाँ 
उन्होंने स्वयं भगवान शिव को 

118
00:06:47,320 --> 00:06:49,880
देखा। 
शिव ने अर्जुन को आशीर्वाद दिया 

119
00:06:49,960 --> 00:06:53,560
और उन्हें एक बार फिर पशुपथास्त्र
की शक्ति का स्मरण कराया। 

120
00:06:53,560 --> 00:06:56,280
तो ये एक तरह का डिवाइन रीअशुरेंस
था। 

121
00:06:56,280 --> 00:06:59,520
हाँ एक साइकोलॉजिकल बूस्ट। 
ये विश्वास कि ब्रह्मांड की 

122
00:06:59,520 --> 00:07:03,320
शक्तियां उनके साथ है, ये सिर्फ 
एक सपना नहीं था। 

123
00:07:03,320 --> 00:07:06,560
ये अर्जुन की चेतना की वो गहरी 
अवस्था थी जहाँ उन्होंने अपनी 

124
00:07:06,560 --> 00:07:10,120
सारी शक्तियां को, अपने सारे 
अस्त्र को और अपनी सारी 

125
00:07:10,120 --> 00:07:12,680
आध्यात्मिक ऊर्जा को एक लक्ष्य पर
केंद्रित कर लिया था। 

126
00:07:13,000 --> 00:07:16,920
लक्ष्य था। 
जब अर्जुन की इस प्रतिज्ञा और 

127
00:07:16,920 --> 00:07:21,360
उनकी तैयारी की खबर कौरव खेमे में
पहुंची होगी तो वहाँ का माहौल 

128
00:07:21,360 --> 00:07:24,280
कैसा था? 
वहाँ तो जरूर खलबली मची होगी। 

129
00:07:24,320 --> 00:07:29,120
खलबली से कहीं ज्यादा वहाँ डर का 
माहौल था तो डर के मारे कांप रहा 

130
00:07:29,120 --> 00:07:30,040
था। 
सच में। 

131
00:07:30,040 --> 00:07:33,560
हाँ, वो युद्ध छोड़कर अपने राज्य 
वापस भाग जाना चाहता था। 

132
00:07:33,680 --> 00:07:36,600
वो दुर्योधन के पास गया और कहा 
मैंने सुना है अर्जुन ने मुझे 

133
00:07:36,600 --> 00:07:39,960
मारने की प्रतिज्ञा की है, मैं 
उनके सामने नहीं टिक सकता, मुझे 

134
00:07:39,960 --> 00:07:42,520
जाने दो। 
इससे जयद्रथ का कैरेक्टर भी सामने

135
00:07:42,520 --> 00:07:45,240
आता है। 
वो एक महान योद्धा था लेकिन 

136
00:07:45,280 --> 00:07:48,680
अर्जुन के क्रोध का सामना करने की
हिम्मत उसमें नहीं थी। 

137
00:07:48,680 --> 00:07:52,760
नहीं थे, लेकिन दुर्योधन, 
द्रोणाचार्य और कण ने उसे भरोसा 

138
00:07:52,760 --> 00:07:56,240
दिलाया। 
दुर्योधन ने कहा तुम डरो मत मैं 

139
00:07:56,360 --> 00:08:00,720
कर्ण द्रोण अश्वथमा पूरी कौरव 
सेना तुम्हारी रक्षा करेगी, 

140
00:08:01,200 --> 00:08:02,640
अर्जुन तुम तक पहुँच ही नहीं 
पाएगा। 

141
00:08:02,640 --> 00:08:05,000
तो अब कौरवों का गेम प्लान बदल 
गया। 

142
00:08:05,000 --> 00:08:07,800
पूरी तरह से। 
चौधरी दिन उनका मकसद पांडवों को 

143
00:08:07,800 --> 00:08:12,800
हराना नहीं बल्कि सिर्फ जयद्रत को
सूर्यास्त तक बचाना था। 

144
00:08:12,880 --> 00:08:14,800
ये एक तरह से डिफेंसिव गेम हो 
गया। 

145
00:08:14,800 --> 00:08:18,000
एग्ज़ैक्ट्ली। 
और इस डिफेंसिव गेम के आर्किटेक्ट

146
00:08:18,000 --> 00:08:21,160
थे गुरु द्रोणाचार्य। 
उन्होंने एक ऐसी मिलिट्री 

147
00:08:21,160 --> 00:08:24,240
फॉर्मेशन की योजना बनाई जो लगभग 
अभेद्य थी। 

148
00:08:24,240 --> 00:08:27,360
कैसी थी वो फॉर्मेशन? 
उन्होंने तीन व्यूवों का एक 

149
00:08:27,360 --> 00:08:31,120
कॉम्बिनेशन बनाया। 
सबसे बाहर शकट क्यूँ उसके अंदर, 

150
00:08:31,120 --> 00:08:34,240
एक पद्म क्यूँ? 
और उसके केंद्र में एक सुई की नोक

151
00:08:34,240 --> 00:08:38,120
जैसा सूची मुख क्यूँ? 
जिसके अंत में जय द्रथ को छिपाया 

152
00:08:38,120 --> 00:08:40,480
गया था। 
ये तो किसी मॉडर्न डे मिलिट्री 

153
00:08:40,480 --> 00:08:44,280
फोर्ट्रस जैसा लगता है, जिसमे 
मल्टीप्ल लेयर्स ऑफ़ डिफेंस हो। 

154
00:08:44,280 --> 00:08:47,960
आप बिलकुल सही समझ रही हैं। 
इस पूरी फॉर्मेशन की लम्बाई कई 

155
00:08:47,960 --> 00:08:51,080
मीलों में थी और इसकी रक्षा कौन 
कर रहा था? 

156
00:08:51,200 --> 00:08:55,840
खुद द्रोणाचार्य, दुर्योधन कर्ण, 
अश्वथमा। 

157
00:08:55,840 --> 00:08:59,480
मतलब अर्जुन को जैद्रग तक पहुंचने
के लिए पहले उस युग के महानतम 

158
00:08:59,480 --> 00:09:02,960
योद्धाओं से लड़ना था। 
हाँ, द्रोणाचार्य ने दुर्योधन को 

159
00:09:02,960 --> 00:09:07,760
वचन दिया था, आज मैं ऐसा क्यूँ 
रचूँगा कि अर्जुन तो क्या स्वयं 

160
00:09:07,880 --> 00:09:11,600
इंद्रभी से नहीं भेद पाएंगे? 
तो एक तरफ अर्जुन की प्रतिज्ञा, 

161
00:09:11,680 --> 00:09:15,960
उनका संकल्प और उनका पशुपद आस्त्र
और दूसरी तरफ द्रोणाचार्य का 

162
00:09:15,960 --> 00:09:20,880
अभेद्य क्यूँ और कौरवों की पूरी 
सेना जिसका एकमात्र लक्ष्य है जय 

163
00:09:20,880 --> 00:09:24,080
द्रथ को बचाना। 
बिल्कुल तेरहवें दिन की रात दोनों

164
00:09:24,080 --> 00:09:27,920
खेमों में शायद ही कोई सोया होगा।
पांडव शिविर में चिंता और 

165
00:09:27,920 --> 00:09:30,720
प्रार्थना थी। 
वहीं गौरव शिविर में भय और एक 

166
00:09:30,720 --> 00:09:34,240
मजबूत रक्षा पंक्ति की तैयारी थी।
तो मंच तैयार है। 

167
00:09:34,280 --> 00:09:38,520
एक तरफ अपने पुत्र की मृत्यु के 
शोक और क्रोध से जलते हुए अर्जुन 

168
00:09:38,520 --> 00:09:43,600
है, जिनके तरकश में पशुपतास्त्र 
जैसी देवीय शक्ति है और सारथी के 

169
00:09:43,600 --> 00:09:45,880
रूप में स्वयं कृष्ण। 
और दूसरी तरफ। 

170
00:09:46,320 --> 00:09:50,400
द्रोणाचार्य के क्यूँ के लोहे के 
किले में छुपा हुआ जयद्रत और उसे 

171
00:09:50,400 --> 00:09:55,200
बचाने के लिए खड़ी पूरी गौरव सेना
तेरहवें दिन का सूरज अस्त हो चुका

172
00:09:55,200 --> 00:09:59,600
है लेकिन चौदहवें दिन का सूरज 
कुरुक्षेत्र के इतिहास का शायद 

173
00:09:59,880 --> 00:10:03,800
सबसे निर्णायक। 
सबसे लंबा और सबसे भावनात्मक 

174
00:10:03,800 --> 00:10:06,560
युद्ध लेकर आने वाला है। 
ये सिर्फ एक युद्ध नहीं होगा। 

175
00:10:06,560 --> 00:10:09,600
नहीं, ये समय के खिलाफ़ एक दौड़ 
होगी। 

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00:10:09,600 --> 00:10:13,680
क्या अर्जुन अपनी प्रतिज्ञा पूरी 
कर पाएंगे और अभिमन्यु का बदला ले

177
00:10:13,680 --> 00:10:16,080
पाएंगे? 
क्या द्रोणाचार्य का चक्रव्यूह 

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00:10:16,160 --> 00:10:18,520
अर्जुन के पराक्रम को रोकने में 
सफल होगा? 

179
00:10:18,520 --> 00:10:22,880
हम आपसे फिर मिलेंगे जल्द ही। 
महाभारत कंप्लीट सागा में।

