1
00:00:00,040 --> 00:00:05,440
नमस्कार, स्वागत है आपका महाभारत 
कंप्लीट सागा सीज़न 4 में आज हम 

2
00:00:05,680 --> 00:00:09,000
कुरुक्षेत्र युद्ध के पन्द्रहवें 
दिन की घटनाओं की गहराई में 

3
00:00:09,000 --> 00:00:13,600
उतरेंगे लेकिन उससे पहले एक नजर 
डालते हैं चौदवें दिन पर महाभारत 

4
00:00:13,600 --> 00:00:17,800
के इतिहास में पहली बार। 
पहली बार युद्ध रात में लड़ा गया 

5
00:00:17,840 --> 00:00:23,160
घटोत कच के विनाश ने कौरवसेना में
ऐसा हाहाकार मचाया कि कर्ण को 

6
00:00:23,160 --> 00:00:25,520
अपनी अमोख शक्ति का प्रयोग करना 
पड़ा। 

7
00:00:25,520 --> 00:00:27,440
जो उन्होंने अर्जुन के लिए बचा 
रखी थी। 

8
00:00:27,440 --> 00:00:33,040
बिल्कुल घटोत कच मारा गया लेकिन 
कर्ण ने वो शक्ति खो दी उस एक रात

9
00:00:33,040 --> 00:00:35,640
ने। 
कह सकते हैं युद्ध का रुख हमेशा 

10
00:00:35,640 --> 00:00:38,440
के लिए बदल दिया था। 
बिल्कुल और उसी रात के बाद 

11
00:00:38,600 --> 00:00:44,120
पंद्रहवें दिन का सूरज एक नई और 
शायद कहीं ज्यादा भयानक सुबह लेकर

12
00:00:44,120 --> 00:00:46,600
आया। 
आज हम देखेंगे कि कैसे एक गुरु का

13
00:00:46,600 --> 00:00:49,240
क्रोध पूरी सेना पर प्रलय बनकर 
टूटा। 

14
00:00:49,320 --> 00:00:53,160
और कैसे धर्म और अधर्म के बीच की 
जो पहले से धुंधली रेखा थी वह 

15
00:00:53,160 --> 00:00:57,080
लगभग मिट ही गई? 
चौदहवीं दिन की रात का युद्ध सुबह

16
00:00:57,080 --> 00:01:00,560
तक चला था। 
सैनिक चाहे वो कौरव हो या पांडव 

17
00:01:00,920 --> 00:01:05,080
पूरी तरह थक चूके थे। 
अर्जुन के कहने पर सेना ने कुछ 

18
00:01:05,080 --> 00:01:09,240
देर आराम भी किया। 
लेकिन फिर चंद्रहास नाम के वाद्य 

19
00:01:09,240 --> 00:01:12,040
की धनी ने उन्हें फिर से युद्ध के
लिए जगा दिया। 

20
00:01:12,280 --> 00:01:15,480
मतलब दिन की शुरुआत ही बहुत 
तनावपूर्ण लगती। 

21
00:01:15,480 --> 00:01:18,160
है। 
तनाव से भी ज्यादा ये एक हताशा का

22
00:01:18,160 --> 00:01:21,880
माहौल था। 
खासकर कौरव की मृत्यु के बाद 

23
00:01:21,880 --> 00:01:24,960
दुर्योधन का गुस्सा उस सातवें 
आसमान पर था। 

24
00:01:25,000 --> 00:01:27,040
और वो सीधा द्रोणाचार्य के पास 
पहुंचा। 

25
00:01:27,040 --> 00:01:31,080
और उसने जो इलज़ाम लगाया वो कोई 
छोटा मोटा नहीं था। 

26
00:01:31,240 --> 00:01:36,080
उसने सीधे सीधे अपने गुरु अपने 
सेनापति द्रोण पर पक्षपात का आरोप

27
00:01:36,080 --> 00:01:38,800
लगा दिया। 
कहा कि आप पांडवों के प्रति नरम 

28
00:01:38,800 --> 00:01:41,480
है। 
आप मन से नहीं लड़ रहे, एक गुरु 

29
00:01:41,480 --> 00:01:42,960
के लिए इससे बड़ा अपमान क्या हो 
सकता? 

30
00:01:42,960 --> 00:01:44,560
है। 
मैं दुर्योधन की डेस्परेशन दिखा 

31
00:01:44,560 --> 00:01:45,440
रहा था। 
है ना? 

32
00:01:45,440 --> 00:01:48,920
उसे लगा की युद्ध हाथ से निकल रहा
है और इसका दोष किसी पर तो डालना 

33
00:01:48,920 --> 00:01:52,120
ही था, लेकिन द्रोणाचार्य कोई 
साधारण सैनिक नहीं थे। 

34
00:01:52,480 --> 00:01:56,520
उन्होंने इस अपमान का जवाब बहुत 
ही मतलब व्यंग्यपूर्ण अंदाज में 

35
00:01:56,520 --> 00:01:58,600
दिया। 
अच्छा उन्होंने दुर्योधन को उसकी 

36
00:01:58,600 --> 00:02:03,600
सारी गलतियाँ याद दिलाई के साथ 
मिलकर खेला गया जुआ भरी सभा में 

37
00:02:03,600 --> 00:02:06,760
द्रौपदी का अपमान। 
पांडवों को वनवास भेजना। 

38
00:02:07,200 --> 00:02:11,280
उन्होंने कहा तुमने जो अधर्म के 
बीज बोये हैं अब उसकी फसल काटने 

39
00:02:11,280 --> 00:02:13,840
का समय आ गया है इसके लिए मुझे 
दोष मत दो। 

40
00:02:14,080 --> 00:02:16,240
ये तो सीधी सीधी आईना दिखाने वाली
बात। 

41
00:02:16,240 --> 00:02:19,120
हो बिलकुल। 
और इसके बाद ही उन्होंने वो भयानक

42
00:02:19,120 --> 00:02:21,440
प्रतिज्ञा की। 
जिसने पंद्रहवें दिन को इतना 

43
00:02:21,440 --> 00:02:23,920
विनाशकारी बना दिया। 
हाँ, उन्होंने प्रतिज्ञा की अब वो

44
00:02:23,920 --> 00:02:27,680
किसी को नहीं बख्शेंगे और पांडव 
सेना में ऐसा संहार मचाएंगे जैसा 

45
00:02:27,680 --> 00:02:31,160
पहले कभी नहीं हुआ। 
ये बातचीत सिर्फ एक बहस नहीं थी। 

46
00:02:31,480 --> 00:02:34,560
ये पंद्रहवें दिन द्रोण के रौद्र 
रूप की कह सकते हैं। 

47
00:02:34,840 --> 00:02:38,280
साइकोलॉजिकल फाउंडेशन थी। 
वो अब सिर्फ एक सेनापति नहीं 

48
00:02:38,280 --> 00:02:41,480
बल्कि एक अपमानित गुरु थे। 
जो अपने क्रोध की अग्नि में सब 

49
00:02:41,480 --> 00:02:44,640
कुछ भस्म कर देना चाहते थे। 
और उन्होंने अपनी प्रतिज्ञा निभाई

50
00:02:44,640 --> 00:02:48,400
भी, पंद्रहवें दिन द्रोणाचार्य 
सचमुच काल बनकर पांडव सेना पर 

51
00:02:48,400 --> 00:02:52,640
टूटे उनका पहला निशाना कौन बना? 
उनकी स्ट्रेटेजी बहुत साफ थी। 

52
00:02:53,200 --> 00:02:55,760
उन्होंने पांडव सेना की जड़ों पर 
हमला किया। 

53
00:02:55,920 --> 00:02:59,520
उनके सबसे पुराने और सबसे मजबूत 
सहयोगियों पर। 

54
00:02:59,640 --> 00:03:02,000
अच्छा। 
उन्होंने पांचाल सेना को अपना 

55
00:03:02,000 --> 00:03:05,680
निशाना बनाया, जो द्रुपद और 
दृष्टि की सेना थी। 

56
00:03:06,400 --> 00:03:10,320
एक एक करके उन्होंने ध्रुपद के कई
पुत्रों और पत्रों को मार गिराया।

57
00:03:10,480 --> 00:03:14,840
और फिर उन्होंने वो किया जिसने 
पांडव खेमे की नींव हिला दी। 

58
00:03:15,200 --> 00:03:18,600
उन्होंने दो सबसे महत्वपूर्ण 
स्तंभों को गिरा दिया। 

59
00:03:18,680 --> 00:03:22,960
राजा विराट और राजा ध्रुपद। 
बिल्कुल, ये सिर्फ दो राजाओं की 

60
00:03:22,960 --> 00:03:26,640
मृत्यु नहीं थी। 
यही हमें मनोवैज्ञानिक युद्ध यानी

61
00:03:26,880 --> 00:03:29,560
साइकोलॉजिकल वारफेयर का एक सटीक 
उदाहरण मिलता है। 

62
00:03:29,600 --> 00:03:32,200
कैसे? 
दृण केवल योद्धाओं को नहीं मार 

63
00:03:32,200 --> 00:03:35,440
रहे थे। 
वो पांडव सेना के दिल और दिमाग पर

64
00:03:35,440 --> 00:03:38,880
हमला कर रहे थे। 
विराट वो राजा थे जिनके राज्य में

65
00:03:38,880 --> 00:03:40,960
पांडवों ने अपना ज्ञात लॉस बिताया
था। 

66
00:03:41,040 --> 00:03:45,320
वो उनके ससुर थे। 
ध्रुपद द्रौपदी के पिता थे एक और 

67
00:03:45,320 --> 00:03:48,520
ससुर। 
तो ये एक तरह का डिकपिटेशन 

68
00:03:48,520 --> 00:03:52,240
स्ट्राइक था। 
नेतृत्व को ही खत्म कर दो ताकि 

69
00:03:52,240 --> 00:03:54,920
सेना अपने आप बिखर जाए। 
बिलकुल सही। 

70
00:03:55,320 --> 00:04:00,400
द्रण एक साथ कई संदेश दे रहे थे। 
तुम्हारे सबसे पुराने और भरोसेमंद

71
00:04:00,400 --> 00:04:02,920
साथी भी सुरक्षित नहीं है। 
तुम्हारा लीडरशिप। 

72
00:04:02,920 --> 00:04:06,080
बिखर रहा है। 
तुम्हारे परिवार को निशाना बनाया 

73
00:04:06,080 --> 00:04:09,360
जा रहा है। 
हाँ, ये सेना के मनोबल को जड़ से 

74
00:04:09,360 --> 00:04:11,560
तोड़ने की एक सोंची समझी रणनीति 
थी। 

75
00:04:11,760 --> 00:04:14,640
और इसका असर भी हुआ। 
अपने पिता, भाइयों और पुत्रों को 

76
00:04:14,640 --> 00:04:19,200
अपनी आँखों के सामने मरते देख ने 
उसी क्षण प्रतिज्ञा ली। 

77
00:04:19,200 --> 00:04:22,360
कि वो किसी भी कीमत पर द्रोणाचारी
का वध करेगा। 

78
00:04:22,400 --> 00:04:24,760
अब ये युद्ध उसके लिए निजी बन 
चुका था। 

79
00:04:24,760 --> 00:04:29,080
एक तरफ द्रोण का ये महाविनाश चल 
रहा था लेकिन इस उथल पुथल के बीच 

80
00:04:29,080 --> 00:04:31,200
बाकी महारतियों का क्या हो रहा 
था? 

81
00:04:31,280 --> 00:04:34,760
क्या अर्जन या भीम इस विनाश को 
रोकने की कोशिश नहीं कर रहे थे? 

82
00:04:34,760 --> 00:04:39,280
पूरा कुरुक्षेत्र मैदान जैसे कई 
छोटे छोटे बुद्धों का एक विशाल 

83
00:04:39,280 --> 00:04:42,080
मंच बन गया था। 
हर महारथी अपनी निजी लड़ाई में 

84
00:04:42,080 --> 00:04:44,720
उलझा हुआ था। 
एक तरफ दुशासन और सहदेव के बीच 

85
00:04:44,720 --> 00:04:49,680
युद्ध चल रहा था, वहीं दूसरी ओर 
कण और भीमसेन का संग्राम अपने चरम

86
00:04:49,680 --> 00:04:52,440
पर था। 
कर्ण और भीम की दुश्मनी तो बहुत 

87
00:04:52,440 --> 00:04:56,040
पुरानी और व्यक्तिगत थी। 
लाक्षागृह से लेकर द्रौपदी के 

88
00:04:56,040 --> 00:05:00,200
अपमान तक, भीम के मन में कर्ण के 
लिए बहुत क्रोध था। 

89
00:05:00,200 --> 00:05:03,720
और उस दिन के युद्ध में दोनों ने 
एक दूसरे पर अपनी पूरी शक्ति से 

90
00:05:03,720 --> 00:05:06,720
प्रहार किया। 
दोनों ने एक दूसरे को लगभग पराजित

91
00:05:06,720 --> 00:05:09,880
कर ही दिया था पर कोई निर्णायक 
नतीजा नहीं निकल सका। 

92
00:05:09,960 --> 00:05:14,920
लेकिन शायद सबसे महत्वपूर्ण और 
भावनात्मक मुकाबला गुरु और शिष्य 

93
00:05:14,920 --> 00:05:18,760
के बीच हो रहा था। 
द्रोणाचार्य और अर्जुन ये कल्पना 

94
00:05:18,760 --> 00:05:22,320
करना भी मुश्किल है। 
एक तरफ गुरु जिसने उसे दुनिया का 

95
00:05:22,320 --> 00:05:25,880
सर्वश्रेष्ठ धनोर्धर बनाया और 
दूसरी तरफ वही शिष्य। 

96
00:05:26,160 --> 00:05:29,040
जिसे अपने गुरु के विरुद्ध शस्त्र
उठाना पड़ रहा था। 

97
00:05:29,040 --> 00:05:32,200
उनका युद्ध ऐसा था मानो दो दिव्य 
शक्तियां टकरा रही हो। 

98
00:05:32,280 --> 00:05:34,640
कोई भी एक दूसरे पर बड़ा हासिल 
नहीं कर पा रहा था। 

99
00:05:34,920 --> 00:05:38,360
ये सिर्फ वस्त्रों का युद्ध नहीं 
था, ये भावनाओं, कर्तव्यों और 

100
00:05:38,360 --> 00:05:43,760
धर्म के द्वंद्व का युद्ध था। 
अर्जुन अपने गुरु पर पूरी शक्ति 

101
00:05:43,760 --> 00:05:47,480
से प्रहार नहीं कर पा रहा था। 
और द्रोण अपने सबसे प्रिय शिष्य 

102
00:05:47,480 --> 00:05:50,960
के सामने खड़े थे। 
इस बीच दृष्ट्युद्यम अपनी 

103
00:05:50,960 --> 00:05:54,520
प्रतिज्ञा पूरी करने के लिए द्रोण
की ओर बढ़ रहा था और स्याति की 

104
00:05:54,520 --> 00:05:56,960
जैसे योद्धा उसे बचाने की कोशिश 
कर रहे थे। 

105
00:05:57,280 --> 00:05:59,560
हर तरफ एक अलग ही महाभारत चल रहा 
था। 

106
00:05:59,560 --> 00:06:02,520
द्रोण को रोकना लगभग असंभव लग रहा
था। 

107
00:06:02,680 --> 00:06:05,600
वो ब्रह्मास्त्र जैसे 
दिव्यास्त्रों का प्रयोग कर रहे 

108
00:06:05,600 --> 00:06:09,000
थे, जिससे एक साथ हजारों सैनिक 
मारे जा रहे थे। 

109
00:06:09,200 --> 00:06:11,880
पांडव सेना में सचमुच हाहाकार मचा
हुआ था। 

110
00:06:12,200 --> 00:06:14,920
ऐसा लग रहा था कि आज ही युद्ध का 
अंत हो जाएगा। 

111
00:06:15,360 --> 00:06:19,080
तब कुछ ऐसा हुआ जिसकी किसी ने 
कल्पना भी नहीं की थी। 

112
00:06:19,080 --> 00:06:23,760
हाँ, युद्ध भूमि के ठीक ऊपर। 
आकाश में सप्त ऋषि प्रकट हुए। 

113
00:06:23,760 --> 00:06:28,480
ये एक असाधारण घटना थी। 
वो कोई साधारण ऋषि नहीं थे, वो 

114
00:06:28,480 --> 00:06:32,000
ब्रह्मांड के महान संत थे। 
ये तो अविश्वसनीय है। 

115
00:06:32,080 --> 00:06:34,560
लड़ाई के बीच में सप्त ऋषियों का 
प्रकट होना। 

116
00:06:34,800 --> 00:06:38,680
ये कोई सामान्य घटना नहीं थी। 
क्या ये एक दैवी हस्तक्षेप था? 

117
00:06:38,800 --> 00:06:41,160
एक चेतावनी? 
ये एक सीधी चेतावनी थी। 

118
00:06:41,360 --> 00:06:44,760
द्रोणाचार्य के लिए उन्होंने 
द्रोण से कहा, तुम एक ब्राह्मण 

119
00:06:44,760 --> 00:06:49,000
हो, तुम्हारा कर्म, ज्ञान और 
तपस्या है, इस तरह का नरसंहार 

120
00:06:49,000 --> 00:06:52,840
नहीं। 
तुमने अधर्म का साथ दिया है और 

121
00:06:52,840 --> 00:06:56,800
तुम्हारा समय अब पूरा हो चुका है,
अपने अस्त्र त्याग दो। 

122
00:06:56,800 --> 00:07:00,360
लेकिन क्या द्रोण रुके? 
क्या उन पर इस दैवीय चेतावनी का 

123
00:07:00,360 --> 00:07:04,520
कोई असर हुआ? 
नहीं उस समय वो क्रोध और प्रतिशोध

124
00:07:04,520 --> 00:07:08,760
में इतने डूबे हुए थे कि उन्होंने
ऋषियों की बात भी नहीं मानी। 

125
00:07:09,040 --> 00:07:12,640
वो लड़ते रहे। 
तब श्रीकृष्ण समझ गए कि द्रोण को 

126
00:07:12,640 --> 00:07:16,240
वस्त्रों से नहीं हराया जा सकता। 
उन्हें मनोवैज्ञानिक रूप से 

127
00:07:16,240 --> 00:07:19,520
तोड़ना होगा। 
उनकी सबसे बड़ी कमजोरी पर वार 

128
00:07:19,520 --> 00:07:21,160
करना होगा। 
उनके पुत्र। 

129
00:07:21,360 --> 00:07:24,320
अश्वथामा। 
बिल्कुल द्रोण अपने पुत्र 

130
00:07:24,320 --> 00:07:29,400
अश्वथामा से असीम प्रेम करते थे। 
कृष्ण जानते थे कि अगर द्रोण को 

131
00:07:29,400 --> 00:07:33,840
अश्वथामा की मृत्यु का समाचार मिल
जाए तो वो लड़ने की सारी इच्छा 

132
00:07:33,840 --> 00:07:37,280
खोदेंगे। 
यहीं से उस योजना की शुरुआत हुई। 

133
00:07:37,520 --> 00:07:41,280
जो महाभारत के सबसे बड़े नैतिक 
सवालों में से एक को जन्म देती 

134
00:07:41,280 --> 00:07:43,400
है। 
तो कृष्ण की योजना तैयार थी। 

135
00:07:43,800 --> 00:07:48,920
भीम ने मालवा के राजा इंद्र वर्मा
के अश्वत्थामा नाम के एक विशाल 

136
00:07:48,920 --> 00:07:53,720
हाथी का वध कर दिया और ज़ोर ज़ोर 
से चिल्लाने लगे अश्वत्थामा मारा 

137
00:07:53,720 --> 00:07:56,360
गया। 
लेकिन द्रोण जैसा चतुर योद्धा। 

138
00:07:56,400 --> 00:07:58,760
भीम पर क्यों विश्वास करता? 
वो नहीं करते थे। 

139
00:07:58,760 --> 00:08:02,840
उन्हें पता था भीम छूट बोई सकता 
है और ये कोई चाल हो सकती है। 

140
00:08:02,880 --> 00:08:06,000
इसीलिए उन्होंने उस एक व्यक्ति से
सत्य की पुष्टि करने का फैसला 

141
00:08:06,000 --> 00:08:07,960
किया। 
जीस पर उन्हें अंधा विश्वास था। 

142
00:08:08,000 --> 00:08:12,560
धर्मराज युधिष्ठिर, जिसके सत्य के
प्रभाव से उसका रथ भी। 

143
00:08:12,680 --> 00:08:15,640
हमेशा धरती से चार अंगुल ऊपर चलता
था। 

144
00:08:15,640 --> 00:08:18,840
और यही कृष्ण ने अपना सबसे बड़ा 
दांव खेला। 

145
00:08:18,960 --> 00:08:21,680
उन्होंने युधिष्ठिर को आधा सच 
बोलने के लिए मना लिया। 

146
00:08:21,760 --> 00:08:24,240
ये युधिष्ठिर के जीवन का सबसे 
कठिन क्षण था। 

147
00:08:24,440 --> 00:08:28,160
एक तरफ उनका सत्य का व्रत और 
दूसरी तरफ अपनी सेना को बचाने का 

148
00:08:28,160 --> 00:08:31,280
कर्तव्य है। 
तो यदिष्ठिर द्रोण के पास गए। 

149
00:08:31,360 --> 00:08:36,360
और उन्होंने वह प्रसिद्ध वाक्य 
कहा अश्वथामा हतो नरोवा कुंजरोवा 

150
00:08:36,400 --> 00:08:41,520
यानी यानी अश्वथामा मारा गया। 
पर वह मनुष्य था या हाथी, यह 

151
00:08:41,520 --> 00:08:44,640
निश्चित नहीं है। 
कहते हैं कि जैसे ही युधिष्ठिर ने

152
00:08:44,640 --> 00:08:49,200
नरोवा कुंजरोवा वाला हिस्सा धीमी 
आवाज में कहा कृष्ण ने अपना पांच 

153
00:08:49,200 --> 00:08:52,880
जन शंख इतनी ज़ोर से बजाया। 
कि उसकी ध्वनि में युधिष्ठिर के 

154
00:08:52,880 --> 00:08:56,240
आखिरी शब्द दब गए। 
द्रोण ने सिर्फ पहला और सबसे 

155
00:08:56,240 --> 00:08:58,680
महत्वपूर्ण भाग्य सुना अश्वथामा 
हतो। 

156
00:08:58,760 --> 00:09:03,480
युधिष्ठिर, धर्मराज युधिष्ठिर के 
मुँह से यह सुनकर द्रोण के लिए तो

157
00:09:03,480 --> 00:09:05,600
जैसे दुनिया ही खत्म हो गई होगी, 
बिल्कुल। 

158
00:09:06,080 --> 00:09:10,160
यह मिस इन्फॉर्मेशन का आप कह सकते
हैं क्लासिक उदाहरण है जहाँ सच 

159
00:09:10,160 --> 00:09:13,120
को। 
इस तरह से पेश किया जाता है कि वो

160
00:09:13,120 --> 00:09:15,840
झूठ का काम करें। 
युधिष्ठिर ने तकनीकी रूप से झूठ 

161
00:09:15,840 --> 00:09:19,000
नहीं बोला, लेकिन उनका इरादा 
द्रोण को धोखा देना ही था। 

162
00:09:19,080 --> 00:09:21,720
और इस एक वाक्य का परिणाम भी 
तुरंत मिला। 

163
00:09:21,720 --> 00:09:26,560
हाँ कहते हैं उसी क्षण युधिष्ठिर 
का रथ जो हमेशा धरती से ऊपर रहता 

164
00:09:26,560 --> 00:09:29,440
था, जमीन पर आ गया। 
ये प्रतीक था। 

165
00:09:29,520 --> 00:09:31,760
कि उन्होंने अपने सत्य का एक अंश 
खो दिया। 

166
00:09:31,760 --> 00:09:34,040
था। 
लेकिन क्या इसे सिर्फ एक झूठ की 

167
00:09:34,040 --> 00:09:37,680
तरह देखना सही है या ये आपस धर्म 
का एक उदाहरण था? 

168
00:09:37,800 --> 00:09:41,920
एक असाधारण परिस्थिति में धर्म की
रक्षा के लिए उठाया गया एक कठोर 

169
00:09:41,920 --> 00:09:45,080
कदम? 
यही इस घटना का सबसे बड़ा डिलेमा 

170
00:09:45,080 --> 00:09:47,320
है। 
कृष्ण की दृष्टि में ये अधर्म 

171
00:09:47,320 --> 00:09:50,600
नहीं बल्कि। 
एक बड़ी सच्चाई को स्थापित करने 

172
00:09:50,600 --> 00:09:54,440
के लिए जरूरी कूटनीति थी। 
द्रोण ब्रह्मास्त्र का प्रयोग 

173
00:09:54,440 --> 00:09:56,360
करके युद्ध के सारे नियम तोड़ रहे
थे। 

174
00:09:56,760 --> 00:10:00,360
उन्हें रोकने के लिए एक असाधारण 
उपाय की जरूरत थी, लेकिन पीजस्टि 

175
00:10:00,360 --> 00:10:04,720
के लिए ये जीवन भर का दाग बन गया।
ये घटना हमें ये सोचने पर मजबूर 

176
00:10:04,720 --> 00:10:07,440
करती है कि क्या लक्ष्य इतना महान
हो सकता है? 

177
00:10:07,520 --> 00:10:10,640
कि उसके लिए साधनों की पवित्रता 
को नज़रअंदाज़ कर दिया जाए। 

178
00:10:10,680 --> 00:10:14,640
अपने पुत्र की मृत्यु का समाचार 
वो भी धर्मराज के मुख से सुनकर 

179
00:10:14,880 --> 00:10:17,560
द्रोणाचार्य पूरी तरह टूट गए। 
हाँ, बिलकुल। 

180
00:10:17,840 --> 00:10:20,280
उन्होंने जीवन की सारी आशा छोड़ 
दी। 

181
00:10:20,600 --> 00:10:23,920
उन्होंने अपने धनुष बाण। 
और सारे अस्त्र शस्त्र अपने रथ 

182
00:10:23,960 --> 00:10:26,520
में ही फेंक दिए। 
और वो अपने रथ पर ही पद्मासन में 

183
00:10:26,560 --> 00:10:29,760
ध्यान की मुद्रा में बैठ गए। 
वो एक महान योगी भी थे। 

184
00:10:30,400 --> 00:10:33,400
उन्होंने योग शक्ति से अपने प्राण
त्यागना का निश्चय किया। 

185
00:10:33,680 --> 00:10:36,880
उनका शरीर रथ पर था, लेकिन उनकी 
आत्मा ब्रह्मलोक की यात्रा पर 

186
00:10:36,880 --> 00:10:39,680
निकल चुकी थी। 
वो युद्ध, भूमि के शोर और कुलाहल 

187
00:10:39,680 --> 00:10:43,080
से बहुत दूर जा चूके। 
थे और ठीक इसी समय अपनी प्रतिज्ञा

188
00:10:43,080 --> 00:10:47,160
से बंधे दृष्टुम वहाँ पहुंचे। 
उन्होंने द्रोण को निहत्था और 

189
00:10:47,160 --> 00:10:51,080
ध्यानमग्न अवस्था में देखा। 
ये एक भयानक दृश्य रहा होगा। 

190
00:10:51,080 --> 00:10:55,200
अर्जुन, सत्य की कृपाचार्य? 
यहाँ तक कि कुछ गौरव योद्धाओं ने 

191
00:10:55,200 --> 00:10:58,960
भी उसे रोकने की बहुत कोशिश की। 
सबने चिल्लाकर कहा कि ये अधर्म 

192
00:10:58,960 --> 00:11:00,200
है। 
सही बात है। 

193
00:11:00,200 --> 00:11:05,120
एक निहत्थे शस्त्र त्याग चूके और 
ध्यानमग्न व्यक्ति पर वार करना 

194
00:11:05,280 --> 00:11:08,000
युद्ध के नियमों का सबसे बड़ा 
उल्लंघन है। 

195
00:11:08,200 --> 00:11:13,200
एक निहत्थे गुरु की इस तरह हत्या 
क्या ये धर्मयुद्ध की सारी सीमाओं

196
00:11:13,200 --> 00:11:16,440
का उल्लंघन नहीं था? 
अर्जुन और सात्विक ने भी तो उसे 

197
00:11:16,440 --> 00:11:19,120
रोका था। 
बिल्कुल युद्ध के नियमों के 

198
00:11:19,120 --> 00:11:23,240
अनुसार ये सरासर अधर्म था। 
लेकिन अगर हम दृष्टयाम के नज़रिए 

199
00:11:23,240 --> 00:11:27,600
से देखें तो उसका जन्म ही द्रोण 
का वध करने के लिए एक यज्ञ से हुआ

200
00:11:27,600 --> 00:11:29,760
था। 
अच्छा उसके लिए अपनी प्रतिज्ञा 

201
00:11:29,760 --> 00:11:33,520
पूरी करना ही उसका परम धर्म था, 
चाहे उसके लिए कोई भी नियम क्यों 

202
00:11:33,520 --> 00:11:36,240
ना तोड़ना पड़े। 
यहाँ व्यक्ति का धर्म और युद्ध का

203
00:11:36,240 --> 00:11:39,680
धर्म आपस में टकरा रहे थे। 
और उसने किसी की नहीं सुनी। 

204
00:11:39,680 --> 00:11:43,520
नहीं। 
उसने कहा ये गुरु नहीं एक अताई 

205
00:11:43,520 --> 00:11:48,000
सैनिक है जिसने मेरे पिता, मेरे 
पुत्रों और अनगिनत पांचाली 

206
00:11:48,000 --> 00:11:51,640
योद्धाओं को क्रूरता से मारा है 
और उसने अपनी तलवार से। 

207
00:11:51,720 --> 00:11:55,280
ध्यानमग्न द्रोणाचार्य का सिर 
उनके धड़ से अलग कर दिया। 

208
00:11:55,280 --> 00:11:59,120
कुरुक्षेत्र के मैदान में एक 
भयानक सन्नाटा छा गया होगा। 

209
00:11:59,520 --> 00:12:04,120
यहाँ तक कि पांडव सेना में भी इस 
जीत का कोई जश्न नहीं था। 

210
00:12:04,280 --> 00:12:08,600
एक महान गुरु की ऐसी मृत्यु ने 
सबको स्तब्ध कर दिया था। 

211
00:12:08,680 --> 00:12:12,600
कहते हैं भीम के अलावा किसी ने भी
दृष्ट्या धुमन के इस काम की 

212
00:12:12,600 --> 00:12:16,520
सराहना नहीं की। 
ये एक ऐसी जीत थी जो हार से भी 

213
00:12:16,520 --> 00:12:20,000
ज्यादा दुखदायी थी। 
इसने युद्ध की नैतिकता पर एक ऐसा 

214
00:12:20,000 --> 00:12:23,520
प्रश्न चिन्ह लगा दिया जिसका 
उत्तर आज तक खोजा जा रहा। 

215
00:12:23,520 --> 00:12:26,600
है तो इस तरह महाभारत के एक महान 
गुरु? 

216
00:12:26,840 --> 00:12:32,280
और अजेय योद्धा का अंत हुआ धर्म 
और अधर्म के एक ऐसे चक्रव्यूह 

217
00:12:32,280 --> 00:12:35,000
हमें जिसका निर्णय आज भी मुश्किल 
है। 

218
00:12:35,120 --> 00:12:37,080
इस घटना ने कई बड़े सवाल खड़े कर 
दिए। 

219
00:12:37,400 --> 00:12:42,880
क्या युधिष्ठिर का अर्ध सत्य 
न्यायसंगत था और प्रतिशोध धर्म की

220
00:12:42,880 --> 00:12:45,720
सीमा में था? 
ये ऐसी बातें हैं जो हमें सोचने 

221
00:12:45,720 --> 00:12:48,680
पर मजबूर करती हैं। 
कि युद्ध में सही और गलत की 

222
00:12:48,680 --> 00:12:51,480
परिभाषा कितनी जटिल और व्यक्तिगत 
हो जाती। 

223
00:12:51,480 --> 00:12:54,200
है। 
पंद्रहवें दिन का युद्ध तो द्रोण 

224
00:12:54,200 --> 00:12:58,320
की मृत्यु के साथ समाप्त हो गया, 
लेकिन एक और विनाश की कहानी बस 

225
00:12:58,320 --> 00:13:03,280
शुरू ही हुई थी अपने पिता की इस 
तरह हुई छलपूर्ण मृत्यु का समाचार

226
00:13:03,280 --> 00:13:05,960
सुनकर। 
अश्वत थामा की क्या प्रतिक्रिया 

227
00:13:05,960 --> 00:13:08,400
होगी? 
उसका क्रोध कुरुक्षेत्र पर क्या 

228
00:13:08,400 --> 00:13:12,560
प्रलय लाएगा और क्या वो अपने पिता
की मृत्यु का बदला ले पाएगा? 

229
00:13:12,680 --> 00:13:16,280
ये हम जायेंगे अगली कड़ी में। 
हम आपसे फिर मिलेंगे जल्द ही 

230
00:13:16,280 --> 00:13:18,240
महाभारत कंप्लीट सागा में।
