1
00:00:00,040 --> 00:00:04,440
नमस्कार, स्वागत है आपका महाभारत 
कंप्लीट सागा सीज़न 4 में। 

2
00:00:04,480 --> 00:00:10,240
और आज के इस डीप ड्राइव में हम हम
कुरुक्षेत्र युद्ध के बारहवीं दिन

3
00:00:10,240 --> 00:00:14,240
की गहराइयों में उतरने वाले हैं। 
हाँ, मतलब एक ऐसा दिन जब 

4
00:00:14,240 --> 00:00:18,320
रणनीतियां पल पल बदल रही थी, 
महाबली योद्धाओं का खून पानी की 

5
00:00:18,320 --> 00:00:21,720
तरह बह रहा था। 
और तबाही अपने चरम पर थी। 

6
00:00:21,720 --> 00:00:26,720
बिल्कुल, लेकिन बारवे दिन के इस 
भयंकर तूफान और खून खराबे में 

7
00:00:26,720 --> 00:00:31,160
जाने से पहले अगर हम ठीक पिछले 
दिन यानी ग्यारहवें दिन पर एक नजर

8
00:00:31,160 --> 00:00:34,360
डालें तो तस्वीर कुछ और ही थी। 
सही बात है। 

9
00:00:34,440 --> 00:00:38,480
द्रोणाचार्य ने युधिष्ठिर को 
जिंदा पकड़ने की बहुत ही सटीक और 

10
00:00:38,480 --> 00:00:42,560
अचूक रणनीति बनाई थी। 
हाँ, कौरवों को लगा था कि बस आज 

11
00:00:42,560 --> 00:00:45,960
युधिष्ठिर पकड़े जाएंगे और ये 
युद्ध यही खत्म हो जाएगा। 

12
00:00:45,960 --> 00:00:48,920
लेकिन वो अचूक रणनीति पूरी तरह से
नाकाम हो गई। 

13
00:00:49,240 --> 00:00:52,680
और उसके उसके तीन सबसे बड़े कारण 
थे। 

14
00:00:53,280 --> 00:00:57,440
पहला तो वीर अभिमन्यु का वो 
अद्भुत शौर्य जिसने गौरव सेना के 

15
00:00:57,440 --> 00:01:01,280
छक्के छुड़ा दिए। 
दूसरा राजा शल्य के साथ भीम का वो

16
00:01:01,280 --> 00:01:05,000
भयंकर रूद्र रूप जहाँ भीम ने सच 
में तबाही मचा दी थी। 

17
00:01:05,160 --> 00:01:08,360
अरे बाप रे वो लड़ाई तो। 
हाँ। 

18
00:01:08,480 --> 00:01:12,600
और अंत में ऐन मौके पर युधिष्ठिर 
को बचाने के लिए अर्जुन की वो 

19
00:01:12,600 --> 00:01:17,280
धमाकेदार वापसी अर्जुन ने आते ही 
द्रोण के पूरे मास्टर प्लान पे 

20
00:01:17,280 --> 00:01:19,200
पानी फेर दिया। 
सही कहा। 

21
00:01:19,200 --> 00:01:23,200
अर्जुन की धमाकेदार वापसी ने 
द्रोणाचार्य को एक बहुत ही कड़वी 

22
00:01:23,200 --> 00:01:27,040
सच्चाई का एहसास करा दिया था। 
वो इतने अनुभवी सेनापति थे। 

23
00:01:27,200 --> 00:01:31,960
वो समझ गए थे कि जब तक अर्जुन ढाल
बनकर युधिष्ठिर के सामने खड़े हैं

24
00:01:32,080 --> 00:01:36,120
तब तक युधिष्ठिर को खरोंच तक 
पहुंचाना तो दूर उनके पास फटकना 

25
00:01:36,120 --> 00:01:39,160
भी नामुमकिन है। 
बिलकुल अर्जुन सिर्फ एक योद्धा 

26
00:01:39,160 --> 00:01:41,760
नहीं थे। 
वो पूरी पांडव सेना का सुरक्षा 

27
00:01:41,760 --> 00:01:45,040
कवच थे। 
तो द्रोण जैसे महान स्टार्टर्स को

28
00:01:45,040 --> 00:01:47,720
ये बात पंच नहीं रही होगी। 
बारहवीं दिन के लिए उन्हें अपनी 

29
00:01:47,720 --> 00:01:50,600
रणनीति बदलनी थी। 
हाँ और उन्होंने बदली भी। 

30
00:01:51,120 --> 00:01:56,120
द्रोण की इस नई चाल को देखकर मुझे
मुझे आधुनिक युद्ध की डीकॉइ 

31
00:01:56,120 --> 00:01:59,120
रणबीती याद आती है। 
हाँ, डीकॉइ स्ट्रेटेजी। 

32
00:01:59,120 --> 00:02:03,760
हाँ, जहाँ असली टारगेट को छुपाकर।
दुश्मन का ध्यान कहीं और भटका 

33
00:02:03,760 --> 00:02:06,360
दिया जाता है। 
क्या द्रोण का भी यही मकसद था कि 

34
00:02:06,360 --> 00:02:08,800
अर्जुन को किसी तरह युधिष्ठिर से 
दूर किया जाए? 

35
00:02:08,840 --> 00:02:13,480
एकदम सटीक बात कही आपने? 
द्रोण का पूरा फोकस इसी वेट एंड 

36
00:02:13,480 --> 00:02:16,400
स्विच रणनीति पर था। 
चेस के खेल में। 

37
00:02:16,520 --> 00:02:21,240
जैसे हम विरोधी की रानी को फंसाने
के लिए कई बार जानबूझकर अपने एक 

38
00:02:21,240 --> 00:02:26,560
मोहरे की बलि देते हैं, ठीक वैसे 
ही द्रोण ने अर्जुन को भटकाने का 

39
00:02:26,680 --> 00:02:30,920
एक बहुत बड़ा जाल बुना। 
और इस जाल को हकीकत में बदलने का 

40
00:02:30,920 --> 00:02:34,480
जिम्मा उठाया सुशर्मा और त्रिगर्थ
देश के योद्धाओं ने। 

41
00:02:34,480 --> 00:02:39,200
त्रिगर्थ देश के योद्धा ओके? 
हाँ, इन योद्धाओं ने मिलकर एक ऐसी

42
00:02:39,200 --> 00:02:43,440
सेना बनाई जिसे महाभारत में 
संशब्दक कहा गया है। 

43
00:02:43,440 --> 00:02:46,760
संशब्दक जहाँ तक मैंने पढ़ा है 
इसका मतलब होता है। 

44
00:02:46,840 --> 00:02:51,520
वो योद्धा जो एक तरह से आत्मघाती 
दस्ते याने सुसाइड स्क्वाड का 

45
00:02:51,520 --> 00:02:53,000
हिस्सा बन जाते हैं। 
बिल्कुल। 

46
00:02:53,080 --> 00:02:57,720
प्राचीन वैदिक काल में ये बहुत ही
गंभीर और खौफनाक परंपरा हुआ करती 

47
00:02:57,720 --> 00:02:58,160
थी। 
ना? 

48
00:02:58,200 --> 00:03:03,800
जी हाँ, संश्पतक बनने का सीधा सा 
मतलब था अपनी मौत को पूरी तरह से 

49
00:03:03,800 --> 00:03:07,480
गले लगा लेना। 
इन त्रिगर्त योद्धाओं ने युद्ध के

50
00:03:07,480 --> 00:03:11,200
मैदान में एक बहुत बड़ा और खौफनाक
अनुष्ठान किया। 

51
00:03:11,240 --> 00:03:15,240
रणभूमि के बीच में। 
हाँ उन्होंने अग्नि जलाई और उस 

52
00:03:15,240 --> 00:03:17,960
धधकती हुई अग्नि के सामने कस्में 
खाई। 

53
00:03:18,040 --> 00:03:20,160
उन्होंने अपने शरीर पर लाल कपड़े 
धारण किए। 

54
00:03:20,160 --> 00:03:24,880
लाल कपड़े मतलब खतरे का निशान ये 
लाल रंग इस बात का प्रतीक था। 

55
00:03:24,960 --> 00:03:27,760
कि उन्होंने मृत्यु को स्वीकार कर
लिया है। 

56
00:03:28,040 --> 00:03:33,160
वो अपनी जान की बाजी लगा चूके हैं
और अब उनके मन में जीवन की कोई 

57
00:03:33,160 --> 00:03:36,760
लालसा नहीं बची है। 
हे भगवान मतलब उन्होंने सोच लिया 

58
00:03:36,760 --> 00:03:39,520
था कि आज या तो हम रहेंगे या फिर 
अर्जुन। 

59
00:03:39,520 --> 00:03:44,160
बिल्कुल यही उनकी प्रतिज्ञा थी 
उन्होंने अग्नि को साक्षी मानकर 

60
00:03:44,160 --> 00:03:47,400
कहा। 
कि या तो हम अर्जुन का वध करेंगे 

61
00:03:47,480 --> 00:03:51,920
या खुद इस रणभूमि में वीर गति को 
प्राप्त होंगे, लेकिन किसी भी 

62
00:03:51,920 --> 00:03:54,680
कीमत पर मैदान छोड़कर पीठ नहीं 
दिखाएंगे। 

63
00:03:54,680 --> 00:03:59,720
बाप रे इस खौफनाक इरादे के साथ 
उन्होंने अर्जुन को खुले आम युद्ध

64
00:03:59,720 --> 00:04:02,040
के लिए ललकारा। 
यहाँ पर अर्जुन का जो रिएक्शन है 

65
00:04:02,040 --> 00:04:04,880
वो बहुत ही सोचने वाला है। 
अर्जुन को पता था कि द्रोण 

66
00:04:04,880 --> 00:04:08,520
युधिष्ठिर को पकड़ना चाहते हैं। 
वो कौरवों की इस डीकोय रणनीति को 

67
00:04:08,520 --> 00:04:11,520
कहीं ना कहीं समझ रहे थे। 
वो कोई ना समझ तो थे नहीं। 

68
00:04:11,520 --> 00:04:16,320
हाँ, लेकिन एक क्षत्रिय होने के 
नाते और वो भी अर्जुन जैसा 

69
00:04:16,320 --> 00:04:19,560
शूरवीर। 
वो किसी की खुली चुनौती को कभी 

70
00:04:19,560 --> 00:04:22,640
ठुकरा नहीं सकते थे। 
ये उनके धर्म के खिलाफ़ था। 

71
00:04:22,760 --> 00:04:24,880
ये अर्जुन के लिए एक बहुत बड़ी 
दुविधा थी। 

72
00:04:25,080 --> 00:04:28,680
एक तरफ भाई की सुरक्षा और दूसरी 
तरफ क्षत्रिय धर्म की पुकार। 

73
00:04:29,400 --> 00:04:31,880
अंत में अर्जुन इस चुनौती को मान 
लेते हैं। 

74
00:04:32,040 --> 00:04:35,920
वो श्री कृष्ण से कहते हैं कि 
उनके रथ को उन संशप्तकों की तरफ 

75
00:04:35,920 --> 00:04:38,240
ले चले। 
अर्जुन ने सोचा होगा कि वो अपनी 

76
00:04:38,240 --> 00:04:42,480
पूरी शक्ति लगाकर बहुत ही जल्दी 
इन संशप्तकों का सफाया कर देंगे। 

77
00:04:42,680 --> 00:04:44,760
और वापस युधिष्ठिर के पास लौट 
आएँगे। 

78
00:04:44,760 --> 00:04:49,560
हाँ, प्लान तो यही था लेकिन असल 
में ऐसा होना इतना आसान नहीं था। 

79
00:04:49,560 --> 00:04:51,720
बिल्कुल नहीं। 
जैसे ही अर्जुन का रथ 

80
00:04:51,760 --> 00:04:55,160
संक्षिप्तकों की तरफ मुड़ा और वो 
युधिष्ठिर से दूर हुए, 

81
00:04:55,360 --> 00:04:58,080
द्रोणाचार्य तो बस इसी पल की तलाश
में थे। 

82
00:04:58,080 --> 00:05:01,120
हाँ। 
अर्जुन के जाते ही द्रोणाचार्य 

83
00:05:01,120 --> 00:05:04,080
पांडव सेना पर एक भूखे शेर की तरह
टूट पड़ते हैं। 

84
00:05:04,160 --> 00:05:06,120
द्रोण उस दिन एक अलग ही ज़ोन में 
थे। 

85
00:05:06,560 --> 00:05:10,840
उनकी रफ्तार, उनके तीरों की बौछार
और उनका गुस्सा देखने लायक था। 

86
00:05:11,240 --> 00:05:14,480
वो जहाँ से गुजरते बस विनाश ही 
विनाश नजर आता। 

87
00:05:14,560 --> 00:05:17,120
एकदम अनस्टोपबल हो गए थे वो। 
बिल्कुल। 

88
00:05:17,520 --> 00:05:22,160
उनके बाणों की गति इतनी तेज थी कि
किसी को कुछ समझ ही नहीं आ रहा 

89
00:05:22,160 --> 00:05:26,640
था। 
रथ, घोड़े, हाथी, पैडल सैनिक सब 

90
00:05:26,640 --> 00:05:29,120
गाजर मूली की तरह कटकर गिर रहे 
थे। 

91
00:05:29,480 --> 00:05:34,160
द्रोण का रथ पूरे युद्ध के मैदान 
में एक साक्षात तूफान की तरह घूम 

92
00:05:34,160 --> 00:05:35,760
रहा। 
था और उनका टारगेट सिर्फ और सिर्फ

93
00:05:35,760 --> 00:05:39,920
एक था युद्ध। 
पूरी सेना में हाहाकार मच गया और 

94
00:05:39,920 --> 00:05:43,360
तभी इस तूफान को रोकने के लिए 
पंचाला देश का एक बहुत वीर 

95
00:05:43,360 --> 00:05:44,480
राजकुमार सामने आता। 
है। 

96
00:05:44,480 --> 00:05:48,280
सत्यजीत। 
हाँ, सत्यजीत युधिष्ठिर को बचाने 

97
00:05:48,280 --> 00:05:52,040
के लिए वो अपनी जान की परवाह किए 
बिना द्रोण के सामने चट्टान की 

98
00:05:52,040 --> 00:05:52,760
तरह खड़ा हो जाता। 
है। 

99
00:05:52,760 --> 00:05:55,120
सत्यजीत कोई मामूली योद्धा नहीं 
था। 

100
00:05:55,200 --> 00:05:58,360
पांचाल और द्रोण की दुश्मनी तो 
वैसे भी बहुत पुरानी थी। 

101
00:05:58,680 --> 00:06:01,720
सत्यजीत ने बड़ी बहादुरी से द्रोण
का सामना किया। 

102
00:06:01,960 --> 00:06:05,920
यहाँ तक कि उसने अपने सटीक तीरों 
से द्रोण के कई धनुष भी काट दिए। 

103
00:06:05,920 --> 00:06:09,080
कमाल है। 
द्रोण जैसे महारथी के धनुष काटना 

104
00:06:09,080 --> 00:06:12,160
कोई छोटी बात नहीं है। 
कुछ पलों के लिए तो पूरी कौरव 

105
00:06:12,160 --> 00:06:15,960
सेना सन्न रह गई। 
कि शायद सत्यजीत द्रोण को रोक ही 

106
00:06:15,960 --> 00:06:18,760
लेगा। 
लेकिन द्रोण तो आखिर द्रोण थे। 

107
00:06:19,200 --> 00:06:21,920
उनका हिस्सा सातवें आसमान पर 
पहुँच गया। 

108
00:06:22,160 --> 00:06:25,360
उन्होंने गुस्से में एक 
अर्धचंद्राकार यानी क्रेसेंट 

109
00:06:25,360 --> 00:06:29,920
शेप्ड तीर अपने तरकश से निकाला। 
बहुत ही घातक तीर होता है। 

110
00:06:29,920 --> 00:06:32,360
वो। 
और उन्होंने इसे सीधा सत्यजीत की 

111
00:06:32,360 --> 00:06:36,120
तरफ छोड़ दिया। 
हे भगवान क्या खौफनाक और दिल दहला

112
00:06:36,120 --> 00:06:40,040
देने वाला मंजर रहा होगा? 
वो वो तीर सीधा जाकर सत्यजीत की 

113
00:06:40,040 --> 00:06:44,320
गर्दन पर लगा और पलक झपकते ही 
उसका सिर धड़ से अलग हो गया। 

114
00:06:44,320 --> 00:06:47,840
सच में बहुत ही दुखद युद्ध की यही
सच्चाई है। 

115
00:06:47,880 --> 00:06:51,760
एक बहुत ही महान और वीर योद्धा का
पल भर में अंत हो गया। 

116
00:06:52,080 --> 00:06:55,960
सत्यजीत ने अपने राजा युधिष्ठिर 
की रक्षा के लिए अपनी जान की 

117
00:06:55,960 --> 00:06:58,680
कुर्बानी दे दी। 
सत्यजीत के इस तरह गिरते ही 

118
00:06:58,880 --> 00:07:02,360
युधिष्ठिर को समझ आ गया कि अब 
उनका वहाँ एक सेकंड भी रुकना 

119
00:07:02,360 --> 00:07:04,560
बिल्कुल सुरक्षित नहीं है। 
बिल्कुल नहीं। 

120
00:07:04,600 --> 00:07:07,840
अपनी जान बचाने के लिए। 
वो बहुत तेज दौड़ने वाले घोड़ों 

121
00:07:07,840 --> 00:07:11,720
के एक रथ पर बैठते हैं और तुरंत 
युद्ध के मैदान से पीछे हट जाते 

122
00:07:11,720 --> 00:07:14,240
हैं। 
यहाँ ये समझना बहुत जरूरी है कि 

123
00:07:14,240 --> 00:07:16,760
युधिष्ठिर का भागना कोई कायरता 
नहीं थी। 

124
00:07:17,120 --> 00:07:19,680
इसे हम एक स्ट्रैटेजिक रिट्रीट 
कहेंगे। 

125
00:07:19,760 --> 00:07:23,640
सही कहा चेस के खेल में जैसे राजा
को बचाना सबसे अहम होता है, वैसे 

126
00:07:23,640 --> 00:07:26,920
ही अगर युधिष्ठिर पकड़े जाते। 
तो पूरी पांडव सेना वहीं हार 

127
00:07:26,920 --> 00:07:29,440
जाती। 
हाँ, सत्यजीत का वो बलिदान पूरी 

128
00:07:29,440 --> 00:07:32,560
तरह बेकार हो जाता। 
अब मैदान में एक तरफ द्रूण का 

129
00:07:32,560 --> 00:07:35,960
आतंक तो चल ही रहा था लेकिन तभी 
मैदान के दूसरे हिस्से में एक और 

130
00:07:35,960 --> 00:07:39,320
बहुत बड़ी तबाही मचती है। 
युद्ध में एक नई एंट्री होती है 

131
00:07:39,480 --> 00:07:43,240
राजा भगदड़ की। 
राजा भगदड़ प्रागज्योतिषपुर का 

132
00:07:43,240 --> 00:07:46,080
राजा हाँ। 
भगत का बैकग्राउंड बहुत ही 

133
00:07:46,080 --> 00:07:49,680
दिलचस्प है। 
वो नरकासुर का बेटा था और देवराज 

134
00:07:49,680 --> 00:07:54,880
इंद्र का बहुत पुराना दोस्त भी। 
इंद्र का दोस्त मतलब वो काफी उम्र

135
00:07:54,880 --> 00:07:57,800
दराज रहा होगा। 
हाँ, उसकी उम्र बहुत ज्यादा थी, 

136
00:07:58,040 --> 00:08:02,640
वो इतना बूढ़ा था कि उसकी आँखों 
की पलकें झूलकर आँखों को ढक लेती 

137
00:08:02,640 --> 00:08:04,520
थी। 
जिन्हें वो एक रेशमी पट्टी से 

138
00:08:04,520 --> 00:08:08,920
बांधकर रखता था ताकि वो देख सके। 
क्या बात कर रहे हैं रेशमी पट्टी 

139
00:08:08,920 --> 00:08:13,280
से पलकें बांधकर लड़ना। 
जी लेकिन इस उम्र के बावजूद उसकी 

140
00:08:13,280 --> 00:08:16,000
ताकत और उसका युद्ध कौशल कमाल का 
था। 

141
00:08:16,040 --> 00:08:20,840
और उसकी सबसे बड़ी ताकत खुद भगत 
नहीं बल्कि उसका विशाल और खूंखार 

142
00:08:20,840 --> 00:08:23,720
हाथी था। 
जिसका नाम था सुप्रतीक। 

143
00:08:23,720 --> 00:08:26,520
सुप्रतीक? 
अगर इस सुप्रतीक को हम आज के 

144
00:08:26,520 --> 00:08:29,080
जमाने के किसी कॉन्सेप्ट से कंपेर
करें तो? 

145
00:08:29,080 --> 00:08:33,679
ये हाथी किसी भारी बख्तरबंद टैंक 
यानी आमद टैंक की तरह था। 

146
00:08:33,760 --> 00:08:38,799
बिल्कुल सटीक एनालॉजी है। 
एक ऐसा हेवी आमर टैंक जो 

147
00:08:38,799 --> 00:08:42,400
इन्फेंट्री लाइन्स को बुरी तरह 
कुचलता हुआ गाड़ियों और रथों को 

148
00:08:42,400 --> 00:08:45,360
चकनाचूर करता हुआ बस आगे बढ़ता 
जाता है। 

149
00:08:45,360 --> 00:08:49,440
बाप रे सो, प्रतीक ने आते ही 
पांडव सेना में बुरी तरह भगदड़ 

150
00:08:49,440 --> 00:08:52,200
मचा दी। 
सैनिक उसके पैरों तले कुचले जा 

151
00:08:52,200 --> 00:08:54,160
रहे थे। 
और इस खूंखार टैंक को रोकने के 

152
00:08:54,160 --> 00:08:55,600
लिए कौन आगे आता है? 
भीम? 

153
00:08:55,920 --> 00:08:57,160
भीम तो हमेशा आगे रहते। 
हैं। 

154
00:08:57,160 --> 00:08:59,840
दोनों के बीच जबरदस्त टक्कर होती 
है। 

155
00:08:59,840 --> 00:09:03,800
एक तरफ इंसानों में सबसे 
शक्तिशाली भीम और दूसरी तरफ 

156
00:09:03,800 --> 00:09:08,720
जानवरों में सबसे विशाल सुप्रतीक।
हाथी ने आते ही अपनी सूंड से भीम 

157
00:09:08,720 --> 00:09:11,000
को बहुत मजबूती से पकड़ लिया। 
बाप रे। 

158
00:09:11,000 --> 00:09:15,040
हाँ और उन्हें घुटनों के बल जमीन 
पर गिराकर कुचलने की कोशिश करने 

159
00:09:15,040 --> 00:09:17,400
लगा। 
सुप्रीती कोई आम हाथी नहीं था, 

160
00:09:17,480 --> 00:09:19,200
उसे युद्ध के लिए ट्रैन किया गया 
था। 

161
00:09:19,200 --> 00:09:22,120
मतलब उसे पता था कि इंसानों को 
कैसे मारना है। 

162
00:09:22,160 --> 00:09:24,880
उसे पता था कि दुश्मनों की 
हड्डियों कैसे तोड़नी है। 

163
00:09:24,920 --> 00:09:29,160
सोचकर ही सांस रुक जाती है। 
लेकिन भीम बिहार का मानने वाले 

164
00:09:29,160 --> 00:09:31,560
थे। 
उन्होंने किसी तरह अपनी पूरी ताकत

165
00:09:31,560 --> 00:09:34,440
लगाकर खुद को सूंड के पकड़ से 
छुड़ाया। 

166
00:09:34,520 --> 00:09:38,480
और बहुत ही फुर्ती से अपनी जान 
बचाकर उस विशाल हाथी के पेट के 

167
00:09:38,480 --> 00:09:41,520
नीचे घुस गए। 
ये भीम का बहुत ही क्लेवर और 

168
00:09:41,520 --> 00:09:43,440
कैल्कुलेटेड मूव था। 
कैसे? 

169
00:09:43,720 --> 00:09:47,560
हाथी के पेट के नीचे जाना मतलब 
उसके ब्लाइंड स्पॉट में जाना जहाँ

170
00:09:47,560 --> 00:09:51,640
से हाथियों ने देख नहीं सकता था 
वहाँ से हाथियों पर सीधा हमला 

171
00:09:51,640 --> 00:09:54,760
नहीं कर सकता था। 
और भीम को थोड़ा सोचने का वक्त 

172
00:09:54,760 --> 00:09:57,600
मिल गया। 
दिमाग का बहुत सही इस्तेमाल किया 

173
00:09:57,600 --> 00:10:01,480
और इसी बीच जब भीम उस हाथी के 
नीचे फंसे हुए थे, उस तरफ 

174
00:10:01,480 --> 00:10:03,320
संक्षिप्तकों के साथ क्या हो रहा 
था? 

175
00:10:03,320 --> 00:10:08,320
अर्जुन ने अपनी रणनीति के हिसाब 
से उन आत्मघाती योद्धाओं को भारी 

176
00:10:08,320 --> 00:10:11,520
नुकसान पहुंचाया। 
सुधनवा जैसे वीर मारे गए। 

177
00:10:11,720 --> 00:10:15,560
अर्जुन अकेले उन हजारों 
संक्षिप्तकों पर भारी पड़ रहे थे।

178
00:10:15,560 --> 00:10:19,760
और जब उन्हें लगा कि युधिष्ठिर 
खतरे में हो सकते हैं तो वो तेजी 

179
00:10:19,760 --> 00:10:23,880
से अपना रथ मोड़ कर वापस लौट आए। 
अर्जुन की वापसी से घबराई हुई 

180
00:10:23,880 --> 00:10:26,320
पांडव सेना में फिर से एक नई जान 
आ गई। 

181
00:10:26,600 --> 00:10:30,480
अब अर्जुन के सामने था राजा भागदत
और उसका वो विशाल हाथी। 

182
00:10:30,480 --> 00:10:34,040
सुप्रतीक। 
अब अर्जुन और भगत का आमना सामना 

183
00:10:34,040 --> 00:10:37,240
होता है। 
हाँ, दोनों के बीच तीरों की भयानक

184
00:10:37,240 --> 00:10:40,640
बारिश शुरू हो जाती है। 
भगदड़ भी कोई कमजोर योद्धा नहीं 

185
00:10:40,640 --> 00:10:44,040
था। 
उसके पास उम्र भर का अनुभव था जब 

186
00:10:44,040 --> 00:10:47,720
भगदड़ को लगा की अर्जुन भारी पड़ 
रहा है और उसे सामान्य तीरों से 

187
00:10:47,720 --> 00:10:51,040
हराना मुश्किल है। 
तो उसने अपने बचाव के लिए एक बहुत

188
00:10:51,040 --> 00:10:53,680
ही भयानक और रहस्यमयी अस्त्र 
निकाल लिया। 

189
00:10:53,760 --> 00:10:56,120
वैष्णवास्त्र। 
हाँ, वैष्णवास्त्र। 

190
00:10:56,200 --> 00:11:01,000
ये ब्रह्मांड के सबसे शक्तिशाली 
और अचूक अस्त्रों में से एक था। 

191
00:11:01,440 --> 00:11:05,960
एक बार अगर ये चल गया तो अपने 
टारगेट को खत्म करके ही मानता था।

192
00:11:05,960 --> 00:11:09,680
तो भगत ने उसे चलाया कैसे? 
भागदौ ने अपने पास रखे एक अंकुश 

193
00:11:09,680 --> 00:11:13,520
को मंत्रों से अभिमंत्रित करके 
वैष्णव अस्त्र में बदल दिया और 

194
00:11:13,520 --> 00:11:16,280
उसे सीधा अर्जुन की छाती की तरफ 
छोड़ दिया। 

195
00:11:16,280 --> 00:11:19,960
वो अस्त्र साक्षात मौत बनकर 
अर्जुन की तरफ बढ़ रहा था और 

196
00:11:19,960 --> 00:11:22,440
अर्जुन के पास इससे बचने का कोई 
रास्ता नहीं था। 

197
00:11:22,960 --> 00:11:26,000
लेकिन तभी ऐन मौके पर श्री कृष्ण?
आगे आ जाते। 

198
00:11:26,000 --> 00:11:28,760
हैं, बिल्कुल। 
वो अर्जुन के आगे खड़े होकर उस 

199
00:11:28,760 --> 00:11:30,760
भयंकर अस्त्र को अपने सीने पर ले 
लेते हैं। 

200
00:11:30,760 --> 00:11:35,240
और इसके बाद जो होता है वो किसी 
चमत्कार से कम नहीं था। 

201
00:11:35,480 --> 00:11:40,600
वो विनाशकारी अस्त्र श्री कृष्ण 
की छाती को छूते ही उनके गले में 

202
00:11:40,600 --> 00:11:45,040
फूलों की एक सुंदर माला यानी 
वैजयंती माला बन जाता है। 

203
00:11:45,120 --> 00:11:47,000
ये बहुत ही हैरान करने वाला पल 
था। 

204
00:11:47,320 --> 00:11:50,360
अर्जुन भी एकदम सन्य रह गए कि 
कृष्ण ने ऐसा क्यों किया? 

205
00:11:50,360 --> 00:11:54,000
हाँ, अर्जुन थोड़े परेशान भी थे। 
क्योंकि कृष्ण ने तो युद्ध से 

206
00:11:54,000 --> 00:11:57,480
पहले कसम खाई थी कि वो उस युद्ध 
में कोई हथियार नहीं उठाएंगे और 

207
00:11:57,480 --> 00:12:00,800
ना ही सीधे तौर पर लड़ाई में 
हिस्सा लेंगे तो फिर बीच में आना।

208
00:12:00,800 --> 00:12:04,000
बिल्कुल। 
और यहीं पर इस पूरी घटना के पीछे 

209
00:12:04,000 --> 00:12:07,720
की बहुत ही गहरी फिलॉसोफिकल बात 
सामने आती है। 

210
00:12:07,840 --> 00:12:10,760
कृष्ण अर्जुन को समझाते हैं। 
क्या समझाते हैं? 

211
00:12:10,840 --> 00:12:15,160
वो अपने चार रूपों यानी फोर 
फॉर्म्स के बारे में समझाते हैं। 

212
00:12:15,480 --> 00:12:20,080
वो बताते हैं कि हिंदू ब्राहमांड 
विज्ञान के अनुसार उनका एक रूप। 

213
00:12:20,320 --> 00:12:25,640
हमेशा धरती पर तपस्या करता है, 
दूसरा रूप दुनिया के अच्छे बुरे 

214
00:12:25,640 --> 00:12:30,320
कर्मों पर नजर रखता है। 
तीसरा रूप इंसान बनकर धरती पर 

215
00:12:30,360 --> 00:12:32,240
अवतार लेता है। 
जो की वो उस वक्त है। 

216
00:12:32,400 --> 00:12:37,000
हाँ और चौथा रूप हजारों सालों तक 
योग निद्रा में सोता है। 

217
00:12:38,480 --> 00:12:42,520
यह तो बहुत ही गहरा जान है, लेकिन
इससे उस अस्त्र का क्या लेना 

218
00:12:42,520 --> 00:12:46,200
देना? 
वो अर्जुन को यह भी समझाते हैं कि

219
00:12:46,200 --> 00:12:49,040
यह अस्त्र फूलों की माला क्यों बन
गया? 

220
00:12:49,320 --> 00:12:54,400
कृष्ण कहते हैं कि वैष्णवस्त्र 
असल में उन्हीं का यानी भगवान 

221
00:12:54,400 --> 00:12:56,760
विष्णु का ही अस्त्र है। 
अच्छा। 

222
00:12:56,760 --> 00:13:01,760
पौराणिक नियमों के अनुसार जब कोई 
दिव्य अस्त्र अपने ही असली स्रोत 

223
00:13:01,880 --> 00:13:05,960
यानी अपने सर्वोच्च देवता की तरफ 
आता है तो वो उन्हें नुकसान नहीं 

224
00:13:05,960 --> 00:13:09,040
पहुंचाता बल्कि उनके अधीन हो जाता
है। 

225
00:13:09,160 --> 00:13:11,320
मतलब अस्त्र ने अपने मालिक को 
पहचान लिया। 

226
00:13:11,320 --> 00:13:16,080
हाँ, कृष्ण ने अर्जुन से कहा कि। 
तुम इस अस्त्र को नहीं रोक सकते 

227
00:13:16,080 --> 00:13:20,680
थे और इस महा युद्ध में तुम्हारी 
रक्षा करना मेरा कर्तव्य था। 

228
00:13:20,680 --> 00:13:24,520
क्या बात है मतलब? 
भगवान का अस्त्र वापस भगवान के 

229
00:13:24,520 --> 00:13:28,120
पास ही आ गया और नतमस्तक हो गया। 
इस घटना के बाद अर्जुन का गुस्सा 

230
00:13:28,120 --> 00:13:30,400
और उनका फोकस अपने चरम पर पहुँच 
जाता है। 

231
00:13:30,400 --> 00:13:32,840
अब वो किसी को नहीं छोड़ने वाले 
थे। 

232
00:13:32,840 --> 00:13:36,800
सबसे पहले अर्जुन ने। 
एक बहुत ही तेज और तीखे तीर से उस

233
00:13:36,800 --> 00:13:39,560
विशाल हाथी सुप्रतीत के मरम स्थान
पर वार किया। 

234
00:13:39,960 --> 00:13:44,200
वो पहाड़ जैसा हाथी दर्द से 
चिंघाड़ता हुआ जमीन पर आ गिरा। 

235
00:13:44,240 --> 00:13:47,040
एक टैंक को हमेशा के लिए शांत कर 
दिया गया। 

236
00:13:47,040 --> 00:13:50,840
और फिर अर्जुन ने एक और 
अर्धचंद्राकर तीर निकाला और सीधा 

237
00:13:50,840 --> 00:13:55,560
भगदत्त के सीने को चीर दिया। 
एक बहुत ही पुराने अनुभवी और महान

238
00:13:55,560 --> 00:13:58,560
योद्धा का यहाँ अंत हो जाता। 
है बहुत ही दुखद। 

239
00:13:58,600 --> 00:14:02,400
भगदत की मौत कौरवों के लिए बहुत 
बड़ा झटका थी क्योंकि उन्होंने 

240
00:14:02,400 --> 00:14:05,480
अपना एक बहुत ही मजबूत स्तंभ खो 
दिया था। 

241
00:14:05,480 --> 00:14:09,440
भगदत के गिरते ही गौरव सेना में 
मायूसी और डर छा गया। 

242
00:14:09,520 --> 00:14:11,440
लेकिन शकुनी कहाँ पीछे रहने वाला 
था। 

243
00:14:11,440 --> 00:14:14,920
शकुनी और उसकी चालें। 
सीधे युद्ध में जब बात नहीं बनी 

244
00:14:15,120 --> 00:14:17,720
तो शकुनी अपनी असली चाल बाजी पर 
उतर आया। 

245
00:14:17,800 --> 00:14:21,880
उसने अर्जुन पर अजीबो गरीब माया 
यानी डार्क इल्ल्यूशंस का 

246
00:14:21,880 --> 00:14:25,640
इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। 
शकुनी का यह मायाजाल असल में आज 

247
00:14:25,640 --> 00:14:30,280
के दौर के मनोवैज्ञानिक युद्ध। 
यानी साइकोलॉजिकल वारफेयर की तरह।

248
00:14:30,280 --> 00:14:32,640
था। 
आजकल जिसे हम गैस लाइटिंग या 

249
00:14:32,640 --> 00:14:36,760
मानसिक दबाव कहते हैं, जहाँ 
दुश्मन आपके दिमाग से खेलता है ने

250
00:14:36,760 --> 00:14:40,240
अपनी माया से ऐसा इल्ल्यूशन 
क्रियेट किया की आसमान से भयानक 

251
00:14:40,240 --> 00:14:43,840
चीजें बरसने लगी। 
पत्थर, हथियार, जंगली जानवर और ना

252
00:14:43,840 --> 00:14:46,640
जाने क्या क्या। 
बुरी पांडव से ना बुरी तरह डर गई।

253
00:14:46,720 --> 00:14:50,960
वो सब असली लग रहा था ना? 
देखो शकुनी का ये दांव बाकी लोगों

254
00:14:50,960 --> 00:14:55,280
पर तो चल सकता था लेकिन अर्जुन के
सामने कोई जादू टोना या भ्रम नहीं

255
00:14:55,280 --> 00:14:58,600
टिकने वाला था। 
अर्जुन का फोकस हमें सीखाता है कि

256
00:14:58,600 --> 00:15:01,960
मानसिक स्पष्टता। 
किसी भी भ्रम को आसानी से तोड़ 

257
00:15:01,960 --> 00:15:04,800
सकती है। 
बिल्कुल मेन्टल क्लैरिटी बहुत 

258
00:15:04,800 --> 00:15:07,000
जरूरी है। 
अर्जुन ने ज़रा भी घबराए बिना 

259
00:15:07,040 --> 00:15:11,280
अपने दिव्य तीरों का इस्तेमाल 
किया और उस सारी माया को उस सारे 

260
00:15:11,280 --> 00:15:13,960
इल्यूश़न को एक ही झटके में काट 
कर रख दिया। 

261
00:15:13,960 --> 00:15:18,400
अर्जुन की एकाग्रता और उनके 
अस्त्र की शक्ति के आगे शकुनी के 

262
00:15:18,400 --> 00:15:22,160
हर चाल नाकाम हो गई। 
उसका कोई भी इल्यूश़न अर्जुन के 

263
00:15:22,160 --> 00:15:25,800
दिमाग पर हावी नहीं हो सका। 
और इसके बाद जो हुआ वो कौरवों के 

264
00:15:25,800 --> 00:15:29,880
लिए बहुत ही भारी पड़ा। 
गंधार सेना और बाकी कौरव योद्धाओं

265
00:15:29,880 --> 00:15:33,600
में बुरी तरह भगदड़ मच गई। 
वो सब अपनी जान बचाकर मैदान 

266
00:15:33,600 --> 00:15:37,560
छोड़कर भागने लगे। 
गौरव सेना का हौसला पूरी तरह टूट 

267
00:15:37,560 --> 00:15:39,560
चुका था। 
द्रोणाचार्य का। 

268
00:15:39,680 --> 00:15:44,440
युधिकिर को पकड़ने का जो मास्टर 
प्लान था, वो बारवें दिन भी पूरी 

269
00:15:44,440 --> 00:15:47,840
तरह से फैल हो गया। 
तो कुल मिलाकर देखा जाए तो बारवें

270
00:15:47,840 --> 00:15:50,600
दिन के अंत तक पांडव इस युद्ध में
हावी हो गए हैं। 

271
00:15:50,800 --> 00:15:52,880
संक्षिप्तकों का बड़ा हिस्सा मारा
गया है। 

272
00:15:52,880 --> 00:15:57,040
भागदत जैसा महारत ही मारा गया। 
शकुनी की माया टूट गई और सबसे 

273
00:15:57,040 --> 00:15:59,120
बड़ी बात युधिष्ठिर बिल्कुल 
सुरक्षित है। 

274
00:15:59,200 --> 00:16:04,480
बिल्कुल आज का दिन पांडवों की जीत
और कौरवों की गहरी निराशा के साथ 

275
00:16:04,480 --> 00:16:08,560
खत्म हुआ द्रोण का प्लान एक बार 
फिर मिट्टी में मिल गया है। 

276
00:16:08,560 --> 00:16:11,360
लेकिन जाते जाते एक विचार जो 
दिमाग में अटक गया है। 

277
00:16:11,400 --> 00:16:15,520
आज हमने देखा कि कृष्ण ने अस्त्र 
अपने ऊपर ले लिया, जबकि उनकी कसम 

278
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थी कि वह युद्ध में सीधा हिस्सा 
नहीं लेंगे। 

279
00:16:17,640 --> 00:16:20,800
हाँ, यह बात तो है। 
सोचने वाली बात ये है कि क्या 

280
00:16:20,800 --> 00:16:24,720
किसी बड़े उद्देश्य के लिए या 
धर्म की रक्षा के लिए अपनी ही खाई

281
00:16:24,720 --> 00:16:28,520
हुई कसम को तोड़ना या उसे घुमाकर 
पेश करना सही है? 

282
00:16:28,880 --> 00:16:30,920
क्या? 
धर्म के नाम पर नियमों से इस तरह 

283
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खेला जा सकता है, इस पर विचार 
कीजिएगा। 

284
00:16:33,520 --> 00:16:37,040
ये सवाल सच में सोचने पर मजबूर कर
देता है। 

285
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और शायद महाभारत हमें यही सिखाती 
है कि धर्म कोई बंधी बंधाई लकीर 

286
00:16:41,720 --> 00:16:42,120
नहीं। 
है। 

287
00:16:42,120 --> 00:16:45,800
बिल्कुल तो अब सवाल ये है कि 
तेरहवें दिन के लिए द्रोणाचार्य 

288
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का प्लान क्या होने वाला है? 
जो भी होगा बहुत भयानक होगा। 

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पांडव बेशक अभी जीत रहे हैं लेकिन
क्या ये शांति किसी से आने वाले 

290
00:16:52,880 --> 00:16:55,080
बहुत बड़े तूफ़ान से पहले का 
सन्नाटा है? 

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एक ऐसा तूफान जो इस युद्ध के सारे
रूल्स को हमेशा के लिए तभा करके 

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रख देगा। 
ये तो हमें अगले दिन के युद्ध में

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00:17:01,400 --> 00:17:04,560
ही पता चलेगा। 
हम आपसे फिर मिलेंगे जल्द ही 

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महाभारत तक कंप्लीट सागा में।
