1
00:00:03,080 --> 00:00:14,520
हम इंसान पारिवारिक तौर पर शरीर 
सांसारिक तौर पर रिश्ते तो रखते 

2
00:00:14,520 --> 00:00:19,840
हैं, रिश्तों में तो हैं क्या हम 
इंसान? 

3
00:00:21,000 --> 00:00:29,160
रिश्ते के मुताबिक यानी हक यानी 
सच्चाई की रू से और सच्चाई की रू 

4
00:00:29,160 --> 00:00:39,240
के मुताबिक कलामे मुकद्दस के 
मुताबिक रुइल कुच के मुताबिक। 

5
00:00:40,960 --> 00:00:54,440
समझ भी रखते हैं, एहसास भी रखते 
हैं, जज्बात रखते हैं और अगर 

6
00:00:54,760 --> 00:01:06,360
सिर्फ रिश्ते ही रखते हैं मगर। 
रूहे हक यानी वो रिश्ते पाक दिल 

7
00:01:07,120 --> 00:01:18,880
नेकनीयत बैरिया इमाम से उस रिश्ते
में मोहब्बत नहीं रखते तो वो। 

8
00:01:19,600 --> 00:01:35,080
रिश्ते मुर्दा हैं क्योंकि खुदा 
पाक मोहब्बत है वो दुनिया का कोई 

9
00:01:35,080 --> 00:01:40,760
भी रिश्ता क्यों न हो? 
एक कलाम में लिखा है कि बिराद 

10
00:01:40,760 --> 00:01:50,360
राना मोहब्बत कायम रहे। 
अगर किसी को दूसरों की शिकायत हो 

11
00:01:50,640 --> 00:01:55,720
यानी गिला शिकवा हो तो एक दूसरे 
की। 

12
00:01:56,240 --> 00:02:08,039
बर्दाश्त करे और एक दूसरे के कसूर
मुआफ करे मुआफ कबूल करनी है जैसे 

13
00:02:08,039 --> 00:02:15,160
खुदावन ने तुम्हारे कसूर मुआफ 
किए, वैसे ही तुम भी करो। 

14
00:02:15,720 --> 00:02:23,800
और इन सब के ऊपर मोहब्बत को जो 
कमाल का पटका है बांधो आज का जो 

15
00:02:23,800 --> 00:02:34,720
प्रकाशन है मुखशपा है वो हमारे जो
फैम्ली रिलेशनशिप है, रिश्ते हैं 

16
00:02:34,880 --> 00:02:36,920
उसके। 
बारे में है। 

17
00:02:37,880 --> 00:02:47,440
ये खुदा का फज़ल है कि हम मसीह 
में मसीह की देह में एक परिवार है

18
00:02:48,880 --> 00:02:55,240
आसमान परिवार है, रूहानी परिवार 
है फैमिली है बा शर्ते कि हम। 

19
00:02:55,760 --> 00:03:00,520
मस्सी की रूह से कलाम के मुताबिक 
समझती हूँ। 

20
00:03:01,360 --> 00:03:12,160
यानी कोई भी रिश्ता, बाप, बेटा, 
माँ, भाई, बहन, दोस्त, वाइफ। 

21
00:03:13,920 --> 00:03:22,200
यानी शौहर, बीवी, शौहर इनसे एक 
परिवार बनता है इन रिश्तों की वजह

22
00:03:22,200 --> 00:03:31,360
से और ये रिश्ते खुदा की बख्शिश 
है खुदा की बख्शिश। 

23
00:03:33,760 --> 00:03:42,000
ये खुद की ओर से मगर सवाल ये है 
क्या हम उन रिश्तों को, खुदा के 

24
00:03:42,000 --> 00:03:50,320
नज़रिए से यानी रूहे खुदा रूहे हक
के मुताबिक समझते हैं? 

25
00:03:50,720 --> 00:03:57,040
जानते हैं? 
और खुदा का फजल समझकर बख्शिश 

26
00:03:57,360 --> 00:04:06,720
समझकर तोहफा समझकर गिफ्ट समझकर 
रिश्ते की कदर करते हैं, उस तरह 

27
00:04:07,120 --> 00:04:10,880
जलाल देते हैं। 
जीस तरह खुदा को जलाल। 

28
00:04:12,040 --> 00:04:18,320
देना चाहिए। 
जीस तरह हम खुदा को जलाल देते है,

29
00:04:18,320 --> 00:04:24,280
उसी तरह जो खुदा का गिफ्ट है, 
बक्शी है हमारी ज़िन्दगी में यानी

30
00:04:24,640 --> 00:04:28,960
रिश्ते हैं, खुदा का जलाल इससे है
की हम। 

31
00:04:29,560 --> 00:04:39,120
जो उसकी बख्शिश है यानी जो रिश्ते
हैं, अगर उसको खुदा के बराबर, 

32
00:04:40,640 --> 00:04:48,280
उसको जलाल इज्जत कदर ना करे तो 
खुदा को जलाल देना भी बेफायदा है।

33
00:04:50,440 --> 00:04:56,560
अगर हम रिश्ते को और रिश्ते में 
जो कोई भी हमारा परिवार का मेंबर 

34
00:04:56,560 --> 00:05:03,720
है, खुदा के तुल्य खुदा में नहीं 
समझते यानी कहने का मतलब क्या है 

35
00:05:05,000 --> 00:05:10,640
कि? 
हम सब यशव के लहू के खरीदे हुए 

36
00:05:10,640 --> 00:05:16,080
हैं तो हमें किसी को किसी के 
कैरेक्टर के हिसाब से नहीं देखना,

37
00:05:16,080 --> 00:05:20,920
जिससे मान्य तौर पर क्योंकि लिखा 
है कि अगर हम मसीह को भी जिस्म के

38
00:05:20,920 --> 00:05:23,360
तौर पर जानते हैं तो अब से नहीं 
जायेंगे। 

39
00:05:23,800 --> 00:05:28,200
क्योंकि हम कर्जदार तो हैं, मगर 
जिस्म के नहीं, मगर रोके तो हमें 

40
00:05:28,200 --> 00:05:34,720
एक दूसरे को रूह में देखना है लहू
में देखना है लहू किसका है ऐशमसी 

41
00:05:34,720 --> 00:05:39,800
का रूह में देखना है अगर हम 
रिश्ते को। 

42
00:05:40,120 --> 00:05:45,040
और रिश्ते में जो कोई भी हमारा 
पारिवारिक मेंबर है, जिसके साथ हम

43
00:05:45,040 --> 00:05:53,200
रिश्ते में हैं, खुदा के तुल्य 
खुदा में नहीं समझते तो हम जो 

44
00:05:53,200 --> 00:05:59,000
मसीह में हैं और जो कलाम को सुनते
हैं, समझते हैं, चाहे पढ़ते हैं। 

45
00:05:59,920 --> 00:06:09,320
तो अगर रिश्ते या उस रिश्ते को जो
कोई पारिवारिक मेंबर कोई भी उसका 

46
00:06:10,320 --> 00:06:19,200
आदर नहीं करते तो हम किसका निराधर
करते हैं खुदा? 

47
00:06:20,000 --> 00:06:29,880
बाप की बक्शिश का, खुदा बाप की 
मिराज का तो हम बाप का ही निरादर 

48
00:06:29,880 --> 00:06:36,080
कर रहे हैं क्योंकि रिश्ते और 
रिश्तों का होना और रिश्ते में 

49
00:06:36,080 --> 00:06:41,800
होना। 
समझना और निभाना ये एक दूसरे को 

50
00:06:41,800 --> 00:06:51,680
समझना है और ये रिश्ते जो हैं वो 
वो बलिदान से चलते हैं। 

51
00:06:51,680 --> 00:06:58,360
एहसास से चलते हैं। 
देखिए खुदा ने। 

52
00:06:59,840 --> 00:07:04,680
नेत नीयत पाकदिल बेरिया ईमान से 
चलते हैं। 

53
00:07:04,960 --> 00:07:09,800
देखिए खुदा ने दुनिया से ऐसी 
मोहब्बत की कि अपना कहौता बेटा 

54
00:07:09,800 --> 00:07:13,480
बख्श लिया। 
खुदा ने दुनिया से ऐसी मोहब्बत 

55
00:07:13,480 --> 00:07:17,520
रखी। 
कि उसने अपना इकलौता बेटा बक्शी 

56
00:07:17,520 --> 00:07:22,640
दिया था कि जो कोई उस पर इमाल है 
हलक न हो, बल्कि हमेशा की जिंदगी 

57
00:07:22,640 --> 00:07:26,280
पर बाप का दुनिया के साथ रिश्ता 
कैसा है? 

58
00:07:26,280 --> 00:07:32,960
जीस तरह बेटे का बाप, दुनिया से 
उतनी मोहब्बत। 

59
00:07:33,520 --> 00:07:38,480
रखता है। 
जीस तरह एक बाप अपने बेटे से रखता

60
00:07:38,480 --> 00:07:46,120
है और रखी जो शब्द है वो इस बात 
को ज़ाहिर करता है की शुरू से ही 

61
00:07:46,560 --> 00:07:56,240
इब्तेदा से ही पैदाइश से ही। 
वो दुनिया को बेटे के साथ बेटे की

62
00:07:56,240 --> 00:08:05,680
मानद मोहब्बत रखता है इसलिए उसने 
जिससे वो बहुत मोहब्बत रखता है 

63
00:08:05,720 --> 00:08:10,320
उसको कुर्बान कर दिया सैक्रिफ़ाइस
कर दिया। 

64
00:08:10,400 --> 00:08:17,360
बलिदान कर दिया। 
यानी रिश्ते में बलिदान करना किस 

65
00:08:17,960 --> 00:08:28,440
बेटे के लिए जो न फरमान है, जो अण
आज्ञाकारी है, न फरमान है। 

66
00:08:28,680 --> 00:08:36,720
जो बाप के कहने पर कभी नहीं चला, 
जिसने कभी बाप का हुक्म नहीं माना

67
00:08:36,720 --> 00:08:45,880
बल्कि बाप के साथ हमेशा बगावत की 
मुखालफत की तो उसके लिए कौन सा 

68
00:08:45,880 --> 00:08:48,760
बेटा? 
कुर्बान कर दिया। 

69
00:08:48,840 --> 00:08:54,360
उसके गुनाहों की मुनाफी के लिए 
कफारे के लिए कौन सा बेटा कुर्बान

70
00:08:54,360 --> 00:09:02,240
कर दिया, जो बाप का प्यारा है? 
ये मेरा प्यारा बेटा है जिससे मैं

71
00:09:02,560 --> 00:09:11,040
खुश हूँ वो किसके लिए? 
कुर्बान कर दिया फरमान बरदार बेटा

72
00:09:12,160 --> 00:09:19,400
हुक्म को मानने वाला बेटा मर्जी 
को पूरा करने वाला बेटा बाप की 

73
00:09:19,400 --> 00:09:25,440
अधीनताई में चलने वाला बेटा यानी 
मासी यसु बाप की मर्ज़ी को पूरा 

74
00:09:25,440 --> 00:09:28,400
करने वाला बेटा। 
हुक्म को पूरा करने वाला बेटा है।

75
00:09:28,960 --> 00:09:35,880
पाप मुझ से इसलिए मोहब्बत रखता है
की मैं अपनी जान देता हूँ ताकि 

76
00:09:35,880 --> 00:09:43,280
उसे फिर ले लूँ कोई उसे मुझसे 
छीनता नहीं बल्कि मैं उसे आप ही 

77
00:09:43,280 --> 00:09:49,280
देता हूँ मुझे उसके। 
देने का भी इंतजार है और उसके फिर

78
00:09:49,280 --> 00:09:54,320
लेने का भी इंतजार है। 
ये हुक्म मेरे बाप से मुझे मिला 

79
00:09:55,720 --> 00:10:02,320
यानी भाई ने भाई के लिए जान दी। 
बाप के हुक्म पर यहाँ एक रिश्ता 

80
00:10:02,880 --> 00:10:04,880
रोशन होता है। 
ज़ाहिर होता है। 

81
00:10:06,880 --> 00:10:15,400
जिसमें मोहब्बत है सबसे पहले और 
इमान है और रूहानियत है और 

82
00:10:15,400 --> 00:10:23,760
पाकीज़गी है बाप अब्बा का मतलब 
है। 

83
00:10:24,400 --> 00:10:31,320
पाक मोहब्बत रूहानी मोहब्बत येसु 
रूहानी बेटा है यानी फज़ल और 

84
00:10:31,320 --> 00:10:37,920
सच्चाई की रूप आसमानी बेटा है 
यानी दूसरा आदम फरमाबरदार बेटा है

85
00:10:38,960 --> 00:10:43,800
हुक्म को पूरा करने वाला और बाप 
की मर्जी को पूरा करने वाला। 

86
00:10:44,920 --> 00:10:52,200
आज्ञाकारी बेटा और जमीनी जिस्मानी
आदम यानी दुनिया है जमीनी 

87
00:10:52,200 --> 00:11:00,680
जिस्मानी बेटा, जो ना फरमान है, 
जो हुक्म की खिलाफत करता है, 

88
00:11:00,680 --> 00:11:06,600
हुक्म को पूरा नहीं करता। 
बाप की मर्जी पर नहीं चलता बल्कि 

89
00:11:06,600 --> 00:11:18,200
अपनी मर्जी बाप में पूरी करता है,
अपनी ख्वाहिशों के मुताबिक और बाप

90
00:11:18,200 --> 00:11:23,360
से अपनी मर्जी पूरी करवाता है। 
मैं तुम्हें एक नया हुक्म देता 

91
00:11:23,360 --> 00:11:29,080
हूँ कि एक दूसरे से मोहब्बत रखो 
कि जैसे मैंने तुमसे मोहब्बत रखी,

92
00:11:29,560 --> 00:11:34,480
तुम भी एक दूसरे से मोहब्बत रखो, 
अगर आपस में मोहब्बत रखोगे तो 

93
00:11:34,480 --> 00:11:39,240
इससे सब जायेंगे कि तुम मेरे 
शागिर्द हो। 

94
00:11:40,040 --> 00:11:47,240
हुक्म का मकसद ये है ध्यान से सुन
लीजिए कि पाक दिल और नेक नीयत और 

95
00:11:47,240 --> 00:11:54,840
बेरिया इमाम से मोहब्बत पैदा हो। 
मोहब्बत सबिर है और मेहरबान 

96
00:11:54,840 --> 00:11:59,560
मोहब्बत हसन नहीं करती, मोहब्बत 
शेख ही नहीं मारती। 

97
00:11:59,800 --> 00:12:06,440
और फूलती नहीं नजेबा काम नहीं 
करती, अपनी बेहतरी नहीं चाहती, 

98
00:12:06,680 --> 00:12:10,560
झुंझुलाती नहीं बदगुमानी नहीं 
करती। 

99
00:12:10,800 --> 00:12:15,880
बदकारी से खुश नहीं होती, बल्कि 
रास्ते से खुश होती है। 

100
00:12:16,000 --> 00:12:21,520
सब कुछ सह लेती है। 
सब कुछ यकीन करती है, सब बातों की

101
00:12:21,520 --> 00:12:26,320
उम्मीद रखती है। 
सब बातों की बर्दाश्त करती है गरज

102
00:12:26,320 --> 00:12:31,720
इमान, उम्मीद, मोहब्बत ये तीनों 
दाहिमी है मगर अफज़ल इनमें 

103
00:12:31,720 --> 00:12:37,840
मोहब्बत तुम सुन चूके हो की कहा 
गया था अपने पड़ोसी से। 

104
00:12:38,840 --> 00:12:44,480
मोहब्बत रख और अपने दुश्मन से 
अदावत ये मुसाकी शरियत की तालीम 

105
00:12:44,480 --> 00:12:47,560
है। 
पुराने अहदनामे की तालीम है, 

106
00:12:47,800 --> 00:12:51,720
लेकिन फ़ज़ल की रु। 
सच्चाई की रु। 

107
00:12:51,720 --> 00:12:56,800
यानी ऐशा मसीह की तालीम क्या है? 
लेकिन मैं तुमसे ये कहता हूँ। 

108
00:12:57,520 --> 00:13:03,720
की अपने दुश्मनों से मोहब्बत रखो 
और अपने सताने वालों के लिए दुआ 

109
00:13:03,720 --> 00:13:09,800
मांगो ताकि तुम अपने बाप के जो 
आसमान पर है बेटे ठहरों क्योंकि 

110
00:13:09,800 --> 00:13:20,120
वो अपने सूरज को बड़ो और नेको? 
यानी गुनहगारों बंदकरों और जो 

111
00:13:20,120 --> 00:13:28,840
नेको का रु है दोनों पर चमकाता है
सूरज यानी यशमसी जो रास्तेबाजी का

112
00:13:28,840 --> 00:13:35,080
सूरज है और रास्ते बाजों और 
नाराजों दोनों पर नहीं बरसाता है।

113
00:13:35,200 --> 00:13:40,840
क्योंकि अगर तुम अपने मोहब्बत 
रखने वालों ही से मोहब्बत रखो तो 

114
00:13:40,840 --> 00:13:46,760
तुम्हारे लिए क्या अजहर है? 
क्या मैं सून लेने वाले भी ऐसा 

115
00:13:46,760 --> 00:13:53,040
नहीं करते और अगर तुम फखत अपने 
भाइयों ही को सलाम। 

116
00:13:53,120 --> 00:13:58,840
करो तो क्या ज्यादा करते हो? 
क्या गैर कोमों के लोग भी ऐसा 

117
00:13:58,840 --> 00:14:02,640
नहीं करते? 
बस चाहिए की तुम कामिल हो जैसा 

118
00:14:02,640 --> 00:14:08,160
तुम्हारा आसमानी बाप का मिल है। 
बहुत आसान शब्दों में समझिए की 

119
00:14:08,160 --> 00:14:11,720
खुदा, जिसे हम परमेश्वर कहते हैं 
या। 

120
00:14:11,840 --> 00:14:18,400
जीस भी नामों से आप अब्बा पिता 
पुकारना हैं। 

121
00:14:18,440 --> 00:14:25,280
अब्बा का मतलब है मोहब्बत पिता का
मतलब है मोहब्बत मोहब्बत का मतलब 

122
00:14:25,280 --> 00:14:30,160
है पिता अगर हम खुदा में चलते हैं
मगर मोहब्बत नहीं करते। 

123
00:14:31,240 --> 00:14:39,600
नेक नियत से पाक दिल से किसी 
दूसरे से तो क्या अपने परिवार में

124
00:14:39,600 --> 00:14:45,480
से ही नेक नियत पाक दिल से 
मोहब्बत नहीं रखते अच्छे इरादे से

125
00:14:45,480 --> 00:14:53,160
नेक नियत से फिर जो ये श्व। 
का खुदा हमारे खुदा ऐशमसी खुदा का

126
00:14:53,160 --> 00:15:00,800
बाप खुदाबंद का बाप आप उसके अधीन 
नहीं वो कोई और खुदा हो सकता है 

127
00:15:01,400 --> 00:15:06,320
वो कोई और इस्सू हो सकता है 
अगरमसी में हो? 

128
00:15:06,680 --> 00:15:13,480
आपके पास मोहब्बत का प्रकाशन 
नहीं, आपको मोहब्बत की समझ ही 

129
00:15:13,480 --> 00:15:19,160
नहीं कलाम ए हक के मुताबिक रूहे 
हक के मुताबिक फजल और सच्चाई के 

130
00:15:19,160 --> 00:15:26,200
रूह के मुताबिक अनुग्रह के 
मुताबिक और वो मोहब्बत हमारे दिल।

131
00:15:26,480 --> 00:15:32,520
नीयत, इरादे इच्छा से पाक इरादे 
की हमारी ज़िन्दगी ही उस मोहब्बत 

132
00:15:32,520 --> 00:15:36,680
की गवाही नहीं देती, ना ही हमारी 
जुबान। 

133
00:15:38,640 --> 00:15:44,680
तो फिर आप जीस भी खुदाबंद का दावा
करते हैं येसू नाम में? 

134
00:15:45,480 --> 00:15:51,560
आप भी झूठे हैं, आपका यसु भी 
दुनियाबी है, झूठा है, जिस्मानी 

135
00:15:51,560 --> 00:15:58,640
है जीस तरह के आप हैं, उस तरह का 
आपका यसु है और आपका यसु भी झूठा 

136
00:15:58,640 --> 00:16:05,560
है और आपका खुदा भी झूठा है। 
उग्र मसीह में होकर कलाम को जानते

137
00:16:05,680 --> 00:16:14,800
सुनते समझते हुए भी मोहब्बत का 
प्रकाशन नूर आपके दिल में रोशन 

138
00:16:14,800 --> 00:16:21,600
नहीं है, चमका नहीं है तो आप 
मुर्दा दिल हैं और। 

139
00:16:21,880 --> 00:16:27,640
मुर्दा मसीह हैं तो जो हम गवाही 
देते हैं कि मसीह येशवा तीसरे दिन

140
00:16:27,640 --> 00:16:34,280
मुर्दो में से जिंदा है, वो भी 
झूठी है। 

141
00:16:34,760 --> 00:16:40,720
अगर सच्चे बाप की मोहब्बत ज़ाहिर 
नहीं करते दुनिया में तो। 

142
00:16:41,320 --> 00:16:45,800
सब कुछ झूठ है और झूठी मसी 
ज़िन्दगी है। 

143
00:16:46,200 --> 00:16:53,400
शिवाय श मसीह के और आसमानी खुदा 
बाप के सिवा किसी ने, किसी ने 

144
00:16:53,840 --> 00:17:00,480
मोहब्बत की ही नहीं जो मूसा की 
शरीयत है ना? 

145
00:17:00,520 --> 00:17:12,319
तो उसके 10 हुकुम है, ना ही उसके 
613 हुकुम है, खुदा एक रु है और 

146
00:17:12,319 --> 00:17:19,240
हुकुम भी एक ही है वो क्या है 
आपस? 

147
00:17:19,560 --> 00:17:24,800
की मोहब्बत के सिवा किसी चीज़ में
किसी के कर्जदार ना हो। 

148
00:17:26,040 --> 00:17:29,200
हमें ये सिखाया जाता है ना कि 10 
हुक्म है। 

149
00:17:29,200 --> 00:17:35,760
शेसु तिराहुक्म ना तो 10 हुक्म है
ना ही शेसु तिराहुक्म एक ही हुक्म

150
00:17:35,760 --> 00:17:39,080
है, एक ही खुदा है, एक ही बेटा 
है। 

151
00:17:40,000 --> 00:17:47,040
एक ही रूह है आपस की मोहब्बत के 
सिवा किसी चीज़ में किसी के 

152
00:17:47,040 --> 00:17:54,360
कर्जदार ना हो क्योंकि जो दूसरे 
से मोहब्बत रखता है उसने शरियत पर

153
00:17:54,440 --> 00:18:03,080
पूरा अमल किया क्योंकि ये बातें 
की जिन्ना न कर, खून न कर चोरी न 

154
00:18:03,080 --> 00:18:09,720
कर लालच न कर और इनके सिवा और जो 
कोई हुक्म हो, उन सबका खुलासा इस 

155
00:18:09,720 --> 00:18:15,160
बात में पाया जाता है कि अपने 
पड़ोसी से अपनी मानद मोहब्बत रख। 

156
00:18:15,920 --> 00:18:18,840
मोहब्बत अपने पड़ोसी से बदी नहीं 
करती। 

157
00:18:19,080 --> 00:18:24,240
इस वास्ते मोहब्बत शरियत की तामील
है और वक्त को पहचान कर ऐसा ही 

158
00:18:24,240 --> 00:18:29,560
करो क्योंकि सारी शरियत पर एक ही 
बात से पूरा अमल हो जाता है। 

159
00:18:29,880 --> 00:18:34,920
यानी इससे। 
कि तू अपने पड़ोसी से अपनी मानद 

160
00:18:34,920 --> 00:18:39,720
मोहब्बत रख, लेकिन अगर तुम एक 
दूसरे को काटते और पाड़े खाते हो 

161
00:18:39,720 --> 00:18:45,920
तो खबरदार रहना की एक दूसरे का 
सत्यानाश ना कर दो क्योंकि जिसने 

162
00:18:46,160 --> 00:18:50,240
सारी शरियत पर अमल किया और एक ही 
बात में खत की। 

163
00:18:50,240 --> 00:18:53,920
यानी। 
मोहब्बत नहीं की वो सारी बातों 

164
00:18:53,920 --> 00:18:58,400
में कसूरबा ठहरा। 
इसलिए कि जिसने ये कहा कि जीना ना

165
00:18:58,400 --> 00:19:06,400
कर उसी ने ये भी कहा कि खून ना कर
बस अगर तू ने जीना तो ना किया मगर

166
00:19:06,400 --> 00:19:12,440
खून किया यानी मोहब्बत ना की। 
तो भी तू शरियत का अदूल करने वाला

167
00:19:12,440 --> 00:19:15,400
ठहरा। 
इब्रानी का पहला ही शब्द है एल 

168
00:19:15,400 --> 00:19:21,560
ऐफ़ यानी खुदा एक है जमीनों आसमान
को पैदा करने वाला बनाने वाला 

169
00:19:21,560 --> 00:19:26,600
यानी अलोही मेदोनाही और वो जलाल 
का बाप नूरों का बाप है। 

170
00:19:26,600 --> 00:19:32,560
मगर खुदा क्या है? 
मोहब्बत आसमानी मोहब्बत रूहानी 

171
00:19:32,560 --> 00:19:41,960
मोहब्बत ए उस्ताद तुरेत में यानी 
ये शमसी तुरेत में कौन सा हुक्म 

172
00:19:41,960 --> 00:19:46,400
बड़ा है? 
उसने उससे कहा कि खुदाबंद अपने 

173
00:19:46,400 --> 00:19:50,000
खुदा से। 
अपने सारे दिल और अपनी सारी जान 

174
00:19:50,000 --> 00:19:54,640
और अपनी सारी अकल से मोहब्बत रख 
बड़ा और पहला हुक्म यही है और 

175
00:19:54,640 --> 00:19:59,960
दूसरा उसकी मानद ये है कि अपने 
पड़ोसी से अपने बराबर मोहब्बत रख 

176
00:19:59,960 --> 00:20:05,560
इन्हीं दो हुक्मों पर तमाम तुरेत 
अरबिया के सहीफों कामदार हैं। 

177
00:20:05,920 --> 00:20:10,560
यानी एल ऐफ़। 
यानी हुकुम यानी पहला हुकुम, 

178
00:20:11,880 --> 00:20:19,400
लेकिन हम इससे भी बेवक्त है। 
अब इस हुकुम को पूरा करने का वक्त

179
00:20:19,400 --> 00:20:24,200
भी गुजर चुका है। 
शरीयत के अधीन ये न समझो। 

180
00:20:24,520 --> 00:20:28,120
कि मैं तुरेत या नभियों की 
किताबों को मनसूख करने आया हूँ, 

181
00:20:28,120 --> 00:20:33,520
मनसूख करने नहीं बल्कि पूरा करने 
आया हूँ कि मैं तुमसे सच कहता हूँ

182
00:20:33,520 --> 00:20:42,240
कि जब तक आसमान और जमीन टल न जाए,
एक नुक्ता या एक शोषा तुरेत से 

183
00:20:42,240 --> 00:20:47,840
हरगिज़ न टलेगा। 
जब तक सब कुछ पूरा ना हो जाए ये 

184
00:20:47,840 --> 00:20:53,240
सूने सलीब पर कहा तमाम हुआ पूरा 
हुआ क्योंकि रुइल कुछ जो हमको 

185
00:20:53,280 --> 00:20:59,960
बख्शा गया है, उसके वशीले से खुदा
की मोहब्बत हमारे दिलों में डाली 

186
00:20:59,960 --> 00:21:02,840
गई है। 
क्योंकि जब हम कमजोर ही थे तो ऐन 

187
00:21:02,840 --> 00:21:07,040
वक्त पर मसी बेदिनियों की खातिर 
मोया किसी रास्ते बाज धर्मी की 

188
00:21:07,040 --> 00:21:09,280
खातिर भी मुश्किल से कोई अपनी जान
देगा। 

189
00:21:09,640 --> 00:21:14,080
मगर शायद किसी ने एक आदमी के लिए 
कोई अपनी जान तक दे देने की जरूरत

190
00:21:14,080 --> 00:21:17,880
करे। 
लेकिन खुदा अपनी मोहब्बत की खूबी 

191
00:21:17,880 --> 00:21:22,960
हम पर यूं ज़ाहिर करता है कि जब। 
हम गुनहगार ही थे तो मसीह हमारी 

192
00:21:22,960 --> 00:21:28,880
खातिर मंया बस जब हम उसके खून के 
बस अब रास्तबा चरे तो उसके फुशीले

193
00:21:28,880 --> 00:21:33,960
से गज्बे इलाही से जरूर ही 
बचेंगे, क्योंकि जब बाजू दुश्मन 

194
00:21:33,960 --> 00:21:38,320
होने के खुदा से उसके बेटे की मौत
के फुशीले से हमारा मेल हो गया 

195
00:21:38,320 --> 00:21:41,520
तो? 
मेल होने के बाद तो हम उसकी 

196
00:21:41,520 --> 00:21:47,200
ज़िन्दगी के सबब से जरूर ही 
बचेंगे और सिर्फ यही नहीं बल्कि 

197
00:21:47,280 --> 00:21:54,280
अपने खुदावन यसुमसी के सबब जिसके 
वशीले से अब हमारा खुदा के साथ 

198
00:21:54,880 --> 00:21:58,880
मेल हो गया खुदा पर फखर भी। 
करते हैं। 

199
00:21:59,240 --> 00:22:05,560
मोहब्बत इसमें नहीं मोहब्बत इसमें
नहीं, शरीयत के अधीन के हमने खुदा

200
00:22:05,560 --> 00:22:11,440
से मोहब्बत की बल्कि इसमें है फसल
और सच्चाई के अधीन कि उसने हमसे 

201
00:22:11,440 --> 00:22:16,720
मोहब्बत की और हमारे गुनाहों के 
कफारे के लिए अपने बेटे को भेजा। 

202
00:22:16,800 --> 00:22:22,840
ए अज़ीज़ ज़ो जब खुदा ने हमसे ऐसी
मोहब्बत की तो हम पर भी एक दूसरे 

203
00:22:22,840 --> 00:22:26,680
से मोहब्बत करनी फर्ज है। 
खुदा को कभी किसी ने नहीं देखा। 

204
00:22:27,000 --> 00:22:33,480
अगर हम एक दूसरे से मोहब्बत करते 
हैं तो खुदा हम में रहता है और 

205
00:22:33,480 --> 00:22:36,640
उसकी मोहब्बत हमारे दिल में शामिल
हो गई है। 

206
00:22:37,400 --> 00:22:41,960
रूल कुछ के वसीले क्योंकि उसने 
अपने रूह में से हमें दिया है। 

207
00:22:42,160 --> 00:22:47,520
इसे हम जानते हैं कि हम उसमें 
कायम रहते हैं और वो हम में और 

208
00:22:47,520 --> 00:22:52,880
हमने देख लिया है और गवाही देते 
हैं कि बाप ने बेटे को दुनिया का 

209
00:22:53,200 --> 00:22:57,960
मुनजी करके भेजा है। 
जो कोई इकरार करता है कि ये सु 

210
00:22:57,960 --> 00:23:03,640
खुदा का बेटा है खुदा उसमें रहता 
है और वो खुदा में जो मोहब्बत 

211
00:23:03,720 --> 00:23:10,840
खुदा को हमसे है उसको हम जान गए 
और हमें उसका यकीन है खुदा 

212
00:23:10,920 --> 00:23:15,160
मोहब्बत है और जो मोहब्बत में 
कायम रहता है वो खुदा में कायम। 

213
00:23:15,280 --> 00:23:17,800
रहता है और खुदा उसमें कायम रहता 
है। 

214
00:23:17,800 --> 00:23:24,920
इसी सबब से हम मोहब्बत हम में 
शामिल हो गई है और क्योंकि तुम 

215
00:23:24,920 --> 00:23:28,960
बेटे हो इसलिए खुदा ने अपने बेटे 
के रूह हमारे दिलों में भेजी जो 

216
00:23:28,960 --> 00:23:31,960
अब्बा यानी ये बात क्या है कहकर 
पुकारना है। 

217
00:23:32,840 --> 00:23:36,840
हम इसलिए मोहब्बत करते हैं की 
पहले उसने हमसे मोहब्बत की अगर 

218
00:23:36,840 --> 00:23:41,280
कोई कहे की मैं खुदा से मोहब्बत 
रखता हूँ और वो अपने भाई से अदावत

219
00:23:41,280 --> 00:23:46,400
रखे तो झूठा है क्योंकि जो अपने 
भाई से जिसे उसने देखा है, 

220
00:23:46,560 --> 00:23:50,960
मोहब्बत नहीं रखता, वो खुदा से भी
जिसे उसने नहीं देखा, मोहब्बत 

221
00:23:50,960 --> 00:23:54,680
नहीं। 
रख सकता और हमको उसकी तरफ से ये 

222
00:23:54,680 --> 00:23:59,680
हुक्म मिला है कि जो कोई खुदा से 
मोहब्बत रखता है वो अपने भाई से 

223
00:23:59,680 --> 00:24:04,120
भी मोहब्बत रखे। 
सबसे बढ़कर ये है कि आपस में बड़ी

224
00:24:04,120 --> 00:24:08,440
मोहब्बत रखो क्योंकि मोहब्बत बहुत
से गुनाहों पर पर्दा डाल देती है।

225
00:24:08,840 --> 00:24:15,960
पसगौर से देखो। 
कि किस तरह चलते हो नादानों की 

226
00:24:15,960 --> 00:24:21,560
तरह नहीं बल्कि दानाओं की माने 
चलो और वक्त को गनीमत जानो 

227
00:24:21,920 --> 00:24:25,680
क्योंकि दिन बुरे हैं। 
इस सब से नादान ना बनो बल्कि 

228
00:24:25,680 --> 00:24:29,360
खुदावंत की मर्जी को समझो कि क्या
है? 

229
00:24:29,520 --> 00:24:35,960
बस अज़ीज़ फर्जन्दों की तरह खुदा 
की मानद बनो और मोहब्बत से चलो 

230
00:24:35,960 --> 00:24:43,320
जैसे मसीह ने तुमसे मोहब्बत की और
हमारे वास्ते अपने आप को खुशबू की

231
00:24:43,320 --> 00:24:47,360
मानद खुदा की नजर करके कुर्बान 
किया। 

232
00:24:47,440 --> 00:24:52,200
इसलिए वो कहता है की ऐश होने वाले
जाग और मुर्दो में से जी उठ तो 

233
00:24:52,520 --> 00:24:58,040
मसीह का नूर तुझ पर चमकेगा बस गौर
से देखो की किस तरह चलते हो 

234
00:24:58,360 --> 00:25:03,000
नादानों की तरह नहीं बल्कि दानाओं
की मानी चलो और वक्त को घनी मत 

235
00:25:03,000 --> 00:25:05,680
जानो क्योंकि। 
दिन बुरे हैं। 

236
00:25:05,680 --> 00:25:09,320
इस सबब से नादान ना बनो बल्कि 
खुदावन की मर्जी को समझो की क्या 

237
00:25:09,320 --> 00:25:16,680
है और मसीह के खौफ से एक दूसरे 
किताबे रहो अब बीवी हो अपने 

238
00:25:16,680 --> 00:25:23,480
शोहरों की ऐसी ताबी रहो जैसे 
खुदावन की क्योंकि शौहर बीवी का 

239
00:25:23,480 --> 00:25:27,440
सिर है। 
जैसे की मसी क्लीसिया का सर है अब

240
00:25:27,440 --> 00:25:34,240
बीवी अपने शोहरों की ऐसी ताबी रहो
जैसे खुदाबंद की, क्योंकि शोहर 

241
00:25:34,440 --> 00:25:41,120
बीवी का सर है जैसे की मसी 
क्लीसिया का सर है और वो खुद बदन 

242
00:25:41,120 --> 00:25:47,600
का बचने वाला है, लेकिन जैसे। 
क्लिसिया मसीह के ताबी हैं, वैसे 

243
00:25:47,600 --> 00:25:58,360
ही बीवियां भी हर बात में अपने 
शोहरों के ताबी हूँ ए शोहरू अपनी 

244
00:25:58,400 --> 00:26:05,880
बीवियों से मोहब्बत रखो। 
जैसे की मशीन ने भी ग्लिसिया से 

245
00:26:05,880 --> 00:26:13,360
मोहब्बत करके अपने आप को उसके 
वास्ते मौत के हवाले कर दिया ताकि

246
00:26:13,360 --> 00:26:21,920
उसको कलाम के साथ, पानी से घुसल 
देकर और साफ करके मुकद्दस बनाये। 

247
00:26:22,240 --> 00:26:31,680
और एक ऐसी जलाल वाली कलिसियां बना
के अपने पास हाजिर करें जिसके बदन

248
00:26:31,680 --> 00:26:39,960
में दाग या झुर्रियां कोई और ऐसी 
चीज़ ना हो बल्कि पाक और बेअब हो।

249
00:26:40,480 --> 00:26:46,600
इसी तरह शोहरों को लाजिम है की 
अपनी बीवियों से अपने बदन की 

250
00:26:46,600 --> 00:26:54,400
मानें तो मोहब्बत रखें जो अपनी 
बीवी से मोहब्बत रखता है वो अपने 

251
00:26:54,400 --> 00:27:00,200
से मोहब्बत रखता है ये कभी किसी 
ने अपने जिस्म से? 

252
00:27:00,640 --> 00:27:09,160
दुश्मनी नहीं की बल्कि उसको पालता
और परवरिश करता है। 

253
00:27:10,880 --> 00:27:17,920
जैसे कीमसी क्लीसिया को इसलिए कि 
हम उसके बदन के अज़ू है। 

254
00:27:19,080 --> 00:27:26,040
बा हर हालः तुम में से भी हर एक 
अपनी बीवी से अपनी मन्नद मोहब्बत 

255
00:27:26,040 --> 00:27:34,200
रखे और बीवी इस बात का ख्याल रखे 
कि अपनी शोहर से डरती रहे। 

256
00:27:34,680 --> 00:27:40,480
चुनौती सारा इब्राहिम के। 
हुक्म में रहती और उसे खुदावन 

257
00:27:40,480 --> 00:27:47,240
कहती थी। 
तुम ये जान लो कि हर पुरुष का सिर

258
00:27:47,240 --> 00:27:53,160
मसीह है और स्त्री का सिर पुरुष 
है और मसीह का सिर परमेश्वर है। 

259
00:27:53,760 --> 00:28:00,240
नेकोकार बीवी किसको मिलती है? 
क्योंकि उसकी कदर मरजान से भी 

260
00:28:00,240 --> 00:28:07,600
बहुत ज्यादा है, उसके शोहर के दिल
का उस पर इत्तेमाद है और उससे 

261
00:28:07,600 --> 00:28:13,160
मुनाफा की कमी ना होगी। 
वो अपनी उम्र के तमाम अय्याम में 

262
00:28:13,520 --> 00:28:18,360
उससे नेकी ही करेगी। 
बदी ना करेगी। 

263
00:28:18,920 --> 00:28:27,920
वो ऊन और कतान ढूंढती है और खुशी 
के साथ अपने हाथों से काम करती है

264
00:28:28,560 --> 00:28:35,640
वो सौदागरों के जहाजों की मानंद 
है वो अपनी खुरीश। 

265
00:28:36,400 --> 00:28:43,600
दूर से ले आती है। 
वो रात ही को उठ बैठती है और अपने

266
00:28:43,600 --> 00:28:50,640
घराने को खिलाती है और अपनी 
लौंडियों को काम देती है। 

267
00:28:50,760 --> 00:28:57,960
वो किसी खेत की बाबत सोचती है। 
और उसे खरीद लेती है और अपने 

268
00:28:57,960 --> 00:29:02,160
हाथों के नफा से ताकिस्तान लगाती 
है। 

269
00:29:02,440 --> 00:29:10,240
वो मजबूती से अपनी कमर बांधती है 
और अपने बाजुओं को मजबूत करती है।

270
00:29:10,320 --> 00:29:19,000
वो अपनी सौदागरी को सुदमंद। 
पाती है रात को उसका चिराग नहीं 

271
00:29:19,000 --> 00:29:28,440
बुझता वो तकले पर अपने हाथ चलाती 
है और उसके हाथ अटेरन पकड़ते हैं 

272
00:29:28,680 --> 00:29:34,440
वो मुफुलसिया। 
की तरफ अपना हाथ बढ़ाती है। 

273
00:29:34,440 --> 00:29:39,120
हाँ वो अपने हाथ मोहताजों की तरफ 
बढ़ाती है। 

274
00:29:39,360 --> 00:29:46,400
वो अपने घिरने के लिए बर्फ़ से 
नहीं डरती क्योंकि उसके खानदान 

275
00:29:46,400 --> 00:29:54,520
में हर एक सुर्ख पोष है। 
वो अपने लिए निगारें भालापोश 

276
00:29:54,520 --> 00:29:59,440
बनाती है। 
उसकी पोशाक महीन कतानी और अगवानी 

277
00:29:59,440 --> 00:30:03,320
है। 
उसका शौहर फाटक में मशहूर है। 

278
00:30:03,480 --> 00:30:10,040
जब वो मुल्क के बुजुर्गों के साथ 
बैठता है, वो महीन कतानी कपड़े 

279
00:30:10,160 --> 00:30:15,720
बना कर बेचती है। 
और फट के सौदागरों के हवाले करती 

280
00:30:15,720 --> 00:30:20,440
है। 
इज्जत और हुरमत उसकी पोशाक है और 

281
00:30:20,440 --> 00:30:27,760
वो आइंदा अज्ज़ाम पर हंसती है। 
उसके मुँह से हिकमत की बातें 

282
00:30:27,760 --> 00:30:31,840
निकलती हैं। 
उसकी जबान पर शफाकत की तालीम है। 

283
00:30:31,960 --> 00:30:40,720
वो अपने घराने पर बखूबी निगाह 
रखती है और कहली की रोटी नहीं 

284
00:30:40,720 --> 00:30:46,640
खाती। 
उसके बेटे उठते हैं और उसे मुबारक

285
00:30:46,640 --> 00:30:51,040
कहते हैं। 
उसका शौहर भी उसकी तारीफ करता है।

286
00:30:51,240 --> 00:31:01,800
की बहतेरी बेटियों ने फजीलत दिखाई
है लेकिन तू सब पर शबकत ले गई 

287
00:31:02,320 --> 00:31:08,880
हुस्न धोखा और जमाल बे सब बात है 
लेकिन वो औरत जो खुदाबंद से डरती 

288
00:31:08,880 --> 00:31:11,320
है सितुदा। 
होगी। 

289
00:31:11,680 --> 00:31:16,560
उसकी मेहनत का अजहर उसे दो और 
उसके कामों से मजलिस में उसकी 

290
00:31:16,560 --> 00:31:22,680
सिफारिश होगी। 
किसी बड़े उम्र वाले को मुलामत ना

291
00:31:22,680 --> 00:31:28,640
कर बल्कि बाप जानकर नसीहत कर। 
और जवानों को भाई जानकर और बड़ी 

292
00:31:28,640 --> 00:31:34,400
उमर वाली औरतों को माँ जानकर और 
जवान औरतों को कमाल पाकी से बहन 

293
00:31:34,400 --> 00:31:41,600
जानकर उन बेवा औरतों की जो वाकई 
बेवा हैं, इज्जत कर और अगर किसी 

294
00:31:41,600 --> 00:31:49,440
बेवा के बेटे या पोते हों? 
तो वो पहले अपने ही घराने के साथ 

295
00:31:49,440 --> 00:31:56,800
दिनदारी का बर्ताव करना और माँ 
बाप का हक अदा करना सीखें, 

296
00:31:56,800 --> 00:32:03,720
क्योंकि ये खुदा के नजदीक पसंदीदा
है जो वाकई बेवा है और उसका। 

297
00:32:03,760 --> 00:32:09,720
कोई नहीं वो खुदा पर उम्मीद रखती 
है और रात दिन मुनाज़त और दुआओं 

298
00:32:09,720 --> 00:32:14,880
में मशगूल रहती है। 
अगर कोई अपनों और खासकर अपने 

299
00:32:14,880 --> 00:32:21,160
घराने की खबर गिरी ना गिरे तो 
ईमान का मुनकर और बेईमान से बदतर 

300
00:32:21,160 --> 00:32:24,280
है। 
अपने पिता और अपनी माता का आदर 

301
00:32:24,280 --> 00:32:30,120
करना जिसे जो देश तारा परमेश्वर 
यवा तुझे देता है उसमें तू बहुत 

302
00:32:30,120 --> 00:32:37,360
दिन तक रहने पाए बच्चे को उसी 
मार्ग पर चलना सिखाओ जीस पर उसे 

303
00:32:37,360 --> 00:32:41,680
चलना चाहिए वह। 
बूढ़ा होने पर भी उससे नहीं 

304
00:32:41,680 --> 00:32:45,160
हटेगा। 
बुद्धिमान पुत्र अपने पिता को 

305
00:32:45,160 --> 00:32:51,560
अनन्दित करता है, परंतु मूर्ख 
अपनी माता को तुच्छ जानता है। 

306
00:32:51,920 --> 00:32:57,320
ए मेरे पुत्र अपने पिता की शिक्षा
पर कान लगा और अपनी माता की 

307
00:32:57,320 --> 00:33:01,560
शिक्षा को ना त्याग। 
जो अपने घराने को बिगाड़ता है, 

308
00:33:01,560 --> 00:33:08,200
उसका भाग केवल वायु ही होगा और 
मूर्ख बुद्धिमान का दास बनेगा। 

309
00:33:10,560 --> 00:33:15,600
नफा का लालची अपने घराने को 
परेशान करता है, पर वो जीसको 

310
00:33:15,600 --> 00:33:22,200
रिश्वत से नफरत है, जिंदा रहेगा। 
नेक औरत अपने शौहर के लिए ताज है 

311
00:33:22,200 --> 00:33:27,360
परंतु निकम्मी पत्नी उसकी 
हड्डियों में सडन के समान है। 

312
00:33:27,920 --> 00:33:32,840
अब बीवियों जैसा खुदाबंद में 
मुनासिब है अपने शौहरों के ताबी 

313
00:33:32,840 --> 00:33:37,400
रहो ए शौहर अपनी बीवियों से 
मोहब्बत रखो और उनसे। 

314
00:33:37,960 --> 00:33:43,440
तल्ख मिजाज़ी ना करो ए फर्जन्दो 
हर बात में अपने माँ बाप के 

315
00:33:43,440 --> 00:33:47,960
फ़रमान बर्बाद रहो, क्योंकि ये 
खुदाबंद में पसंदीदा है। 

316
00:33:47,960 --> 00:33:53,360
ये बच्चे वालो अपने फर्जन्दो को 
परेशान दुखी ना करो ताकि वो बेदिल

317
00:33:53,360 --> 00:33:56,280
ना हो जाएं। 
ए नो करो। 

318
00:33:56,520 --> 00:33:59,360
जो जिस्म के रू से तुम्हारे मालिक
हैं। 

319
00:33:59,640 --> 00:34:02,480
सब बातों में उनके फ़्रमाबदार 
रहो। 

320
00:34:02,880 --> 00:34:08,600
आदमियों को खुश करने वालों की तरह
दिखावे के लिए नहीं बल्कि साफ 

321
00:34:08,600 --> 00:34:12,920
दिली और खुदा के खौफ से जो काम 
करो जिसे करो। 

322
00:34:13,480 --> 00:34:17,280
ये जानकर की खुदावन के लिए करते 
हो ना आदमियों के लिए? 

323
00:34:17,440 --> 00:34:21,480
क्योंकि तुम जानते हो की खुदावन 
की तरफ से इसके बदले में तुम को 

324
00:34:21,480 --> 00:34:27,679
मिरास मिलेंगे तुम खुदावन मसीह की
खिदमत करते हो क्योंकि जो बुरा 

325
00:34:27,679 --> 00:34:32,600
करता है वो अपनी बुराइ का बदला 
पायेगा वह किसी की तरफ। 

326
00:34:33,360 --> 00:34:37,480
दारी नहीं बच्चे इहवा की ओर से 
विरासत हैं। 

327
00:34:37,480 --> 00:34:43,040
संतान उसकी ओर से प्रतिफल है और 
वो मिरास इमान किस से मिलती है 

328
00:34:43,040 --> 00:34:46,719
ताकि फज़ल के तौर पर हो और फज़ल 
और से चाहे की मरफत पहुंची उसकी 

329
00:34:46,719 --> 00:34:49,120
माँ मुरी में से हम सब नहीं पाई 
यानी फज़ल पर फज़ल। 

330
00:34:49,760 --> 00:34:57,640
ये बात सच है की जो शख्स निगाहबान
का ओहदा चाहता है, वो अच्छे काम 

331
00:34:57,640 --> 00:35:02,480
की ख्वाहिश करता है। 
बस निगाहबान को बेइलज़ाम, एक बीवी

332
00:35:02,480 --> 00:35:08,920
का शोहर पहेज़गार मुक्ता की 
शाइस्ता मुसाफिर परवर। 

333
00:35:09,240 --> 00:35:11,760
और तालीम देने के लायक होना 
चाहिए। 

334
00:35:11,760 --> 00:35:18,600
नशे में गुल मचाने वाला या मारपीट
करने वाला ना हो बल्कि हलीम हो, 

335
00:35:18,600 --> 00:35:27,560
ना तकरारी ना दोस्त अपने घर का 
बखूबी बंदोबस्त करता हो और अपने। 

336
00:35:27,800 --> 00:35:32,040
बच्चों को कमाल संजीदा से ताबी 
रखता है। 

337
00:35:32,040 --> 00:35:38,560
जब कोई अपने घर ही का बंदोबस्त 
करना नहीं जानता तो खुदा की 

338
00:35:38,560 --> 00:35:43,200
कलसिया की क्यों कर खबर गिरी 
करेगा ना? 

339
00:35:43,200 --> 00:35:47,160
मुरीद ना हो ताकि गुरुर करके कहीं
की। 

340
00:35:47,800 --> 00:35:55,920
सी सजा ना पाए और बाहर वालों के 
नजदीक भी नेक नाम होना चाहिए ताकि

341
00:35:55,920 --> 00:35:59,080
मुलाकात में और अब्लिस के फंदे 
में ना फंसे। 

342
00:35:59,560 --> 00:36:03,120
इसी तरह खादिमों को भी संजीदा 
होना चाहिए। 

343
00:36:03,560 --> 00:36:08,840
दो जबान। 
और शराबी और नज़ायज नफ़ा के लालची

344
00:36:08,840 --> 00:36:16,360
ना हो और ईमान के भेद को पाक दिल 
में हीफ़ाद से रखें और ये भी पहले

345
00:36:16,360 --> 00:36:21,120
आजमाए जाएं। 
इसके बाद अगर वे इलज़ाम ठहरें तो 

346
00:36:21,120 --> 00:36:25,720
खिदमत का काम करें। 
इसी तरह औरतों को भी संजीदा होना 

347
00:36:25,720 --> 00:36:32,600
चाहिए, तोमत लगाने वाली ना हो 
बल्कि परहेजगार और सारी बातों में

348
00:36:32,600 --> 00:36:37,240
इमानदार हूँ। 
खादिम एक एक बीवी के शौहर हूँ और 

349
00:36:37,240 --> 00:36:41,040
अपने अपने बच्चों और घरों का 
बखूबी। 

350
00:36:41,280 --> 00:36:46,320
बंदोबस्त करती हूँ कि जो खिदमत का
काम बखूबी अंजाम देते हैं, वो 

351
00:36:46,400 --> 00:36:53,600
अपने लिए अच्छा मर्तबा और उस ईमान
में जो पर है बड़ी दिलेरी हासिल 

352
00:36:53,600 --> 00:36:57,400
करते हैं। 
अब फर्ज़ंडो कुदामन में अपने माँ 

353
00:36:57,400 --> 00:37:02,160
बाप के फरमा बरदार रहो। 
क्योंकि ये वाजिब है अपने बाप की 

354
00:37:02,160 --> 00:37:06,680
और माँ की इज्जत करें। 
ये पहला हुक्म है जिसके साथ वादा 

355
00:37:06,680 --> 00:37:14,160
भी है ताकि तेरा भला हो और तेरी 
उम्र जमीन पर दराज़ हो और ए बच्चे

356
00:37:14,160 --> 00:37:17,760
वालो, तुम अपने फर्जबों को गुस्सा
ना दिलाओ। 

357
00:37:17,800 --> 00:37:23,200
बल्कि खुदाबंद की तरफ से तबियत और
नसीहत दे देकर उनकी परवरिश करो। 

358
00:37:23,640 --> 00:37:29,480
ऐन नौकरो जो जिस्म के रूप से 
तुम्हारे मालिक हैं, अपनी सावदिली

359
00:37:29,480 --> 00:37:34,480
से डरते और कांपते हुए उनके। 
ऐसे फ़रमाबदार रहो जैसे मस्सी के 

360
00:37:34,760 --> 00:37:39,240
और आदमियों को खुश करने वालों की 
तरह दिखावे के लिए खिदमत ना करो 

361
00:37:39,600 --> 00:37:46,520
बल्कि मस्सी के बंदों की तरह दिल 
से खुदा की मर्जी पूरी करो और उस 

362
00:37:46,600 --> 00:37:50,400
खिदमत को आदमियों की नहीं बल्कि 
खुदाबंद की। 

363
00:37:50,680 --> 00:37:56,600
जानकर जी से करो क्योंकि तुम 
जानते हो कि जो कोई जैसा अच्छा 

364
00:37:56,600 --> 00:38:02,840
काम करेगा वह गुलाम हो, वह आजाद 
खुदावन से वैसा ही पाएगा और ए 

365
00:38:02,840 --> 00:38:10,840
मालिक हो तुम भी धमकियों छोड़कर। 
उनके साथ ऐसा ही सलूकर क्योंकि 

366
00:38:10,840 --> 00:38:17,040
तुम जानते हो कि उनका और तुम्हारा
दोनों का मालिक आसमान पर है और वो

367
00:38:17,560 --> 00:38:22,680
किसी का तरफदार नहीं। 
मैं इसी कारण उस पिता के सामने 

368
00:38:22,680 --> 00:38:26,640
घुटने टेकता हूँ। 
जिसे स्वर्ग और पृथ्वी पर हर एक 

369
00:38:26,640 --> 00:38:33,560
घराने का नाम रखा जाता है कि वह 
अपनी महिमा के धन के अनुसार 

370
00:38:33,560 --> 00:38:38,640
तुम्हें ये दान देखी। 
तुम उसके आत्मा से अपने भीतरी 

371
00:38:39,240 --> 00:38:46,960
मनुष्यता में सामर्थ्य पाकर। 
बलवंत हो तेजव और विश्वास के 

372
00:38:46,960 --> 00:38:53,320
द्वार मसीह तुम्हारे हृदय में बसे
के तुम प्रेम में जड़ पकड़कर और 

373
00:38:53,320 --> 00:38:59,720
नींव डालकर सपवित्र लोगों के साथ 
भलीभाँति समझने की शक्ति पाओ के। 

374
00:39:00,160 --> 00:39:05,400
उसकी चौड़ाई और लम्बाई और उचाई और
गहराई कितनी है और मसीह के उस 

375
00:39:05,400 --> 00:39:11,200
प्रेम को जान सको जो ज्ञान से परे
कि तुम परमेश्वर की साड़ी भरपूर 

376
00:39:11,200 --> 00:39:15,720
तक परिपूर्ण हो जाओ। 
अब जो ऐसा सामर्थ्य है कि हमारी 

377
00:39:15,720 --> 00:39:19,960
विनती और समझ से। 
कहीं अधिक काम कर सकता है। 

378
00:39:19,960 --> 00:39:25,480
उस सामर्थ्य के अनुसार जो हम में 
कार्य करता है क्लीसिया में और 

379
00:39:25,480 --> 00:39:31,320
मसीसिया में उसकी महिमा पीढ़ी से 
पीढ़ी तक जुगानों युग होती रहे 

380
00:39:31,480 --> 00:39:34,360
आमीन उसी एशिया में।
