1
00:00:00,880 --> 00:00:13,080
फजल और सच्चाई की रूह के अधीन 
मोहब्बत क्योंकि खुदा ने दुनिया 

2
00:00:13,080 --> 00:00:19,680
से ऐसी मोहब्बत रखी कि उसने अपना 
इकलौता बेटा। 

3
00:00:20,600 --> 00:00:27,760
बख्श दिया ताकि जो कोई उस पर इमाम
लाए हलक न हो, बल्कि हमेशा की 

4
00:00:27,760 --> 00:00:34,520
ज़िन्दगी पाए खुदाबद मेरे लिए सब 
कुछ करेगा और मैं दाऊद के घराने 

5
00:00:34,520 --> 00:00:43,880
और येरूसलम के बाशिंदों पर फजल। 
और मुनाजत की रूह नाज़िल करूँगा 

6
00:00:44,160 --> 00:00:51,960
और वो उस पर जीसको उन्होंने छेदा 
है नजर करेंगे और उसके लिए मातम 

7
00:00:51,960 --> 00:00:58,280
करेंगे जैसा कोई अपने इकलौते के 
लिए करता है और उसके लिए। 

8
00:00:59,720 --> 00:01:04,280
तलख्वाम होंगे जैसे कोई अपने 
पलौठे के लिए होता है। 

9
00:01:04,760 --> 00:01:11,440
उसकी मामूरी में से हम सबने पाया।
यानी फजल पर फजल, मगर फजल और 

10
00:01:11,440 --> 00:01:17,280
सच्चाई ये सुमसी की इमारत पहुंची।
जो मोहब्बत खुदा को हमसे है। 

11
00:01:17,400 --> 00:01:22,640
वो इससे ज़ाहिर हुई कि खुदा ने 
अपने इकलौते बेटे को दुनिया में 

12
00:01:22,640 --> 00:01:28,480
भेजा है ताकि हम उसके सबब से 
जिंदा रहे। 

13
00:01:28,840 --> 00:01:33,760
मोहब्बत इसमें नहीं कि हमने खुदा 
से मोहब्बत की। 

14
00:01:33,760 --> 00:01:42,040
मूसा के 10 हुक्मों के अधीन शरियत
के अधीन बल्कि इसमें है कि उसने 

15
00:01:42,040 --> 00:01:47,880
हमसे मोहब्बत की फजल और सच्चाई के
रुके अधीन और हमारे गुनाहों के 

16
00:01:47,880 --> 00:01:55,040
कफारे के लिए अपने बेटे को भेजा। 
ए अज़ीज़ो जब खुदा ने हमसे ऐसी 

17
00:01:55,040 --> 00:02:00,240
मोहब्बत की। 
तो हम पर भी एक दूसरे से मोहब्बत 

18
00:02:00,240 --> 00:02:04,520
करने का फर्ज है। 
खुदा को कभी किसी ने नहीं देखा। 

19
00:02:04,520 --> 00:02:10,360
अगर हम एक दूसरे से मोहब्बत करते 
हैं तो खुदा हम में रहता है और 

20
00:02:10,360 --> 00:02:15,200
उसकी मोहब्बत हमारे दिल में शामिल
हो गई है क्योंकि उसने। 

21
00:02:15,480 --> 00:02:21,520
अपनी रूह में से हमें दिया है। 
इसे हम जानते हैं कि हम उसमें 

22
00:02:21,520 --> 00:02:27,720
कायम रहते हैं और वो हम में जो 
कोई इकरार करता है कि यीस्सु खुदा

23
00:02:27,720 --> 00:02:31,920
का बेटा है। 
हुदा उसमें रहता है और वो खुदा 

24
00:02:31,920 --> 00:02:35,440
में। 
जो मोहब्बत खुदा को हमसे है, उसको

25
00:02:35,640 --> 00:02:42,480
हम जान गए और हमें उसका यकीन है। 
खुदा मोहब्बत है और जो मोहब्बत 

26
00:02:42,480 --> 00:02:48,680
में कायम रहता है वो खुदा में 
कायम रहता है और खुदा उसमें कायम 

27
00:02:48,680 --> 00:02:51,200
रहता है। 
इसी सब से। 

28
00:02:51,720 --> 00:02:56,400
मोहब्बत हम में कामिल हो गई है। 
मोहब्बत में खौफ नहीं होता बल्कि 

29
00:02:56,400 --> 00:03:02,280
कामिल मोहब्बत खौफ को दूर कर देती
है क्योंकि खौफ से अजब होता है और

30
00:03:02,280 --> 00:03:05,600
कोई खौफ करने वाला मोहब्बत में 
कामिल नहीं हुआ। 

31
00:03:05,840 --> 00:03:11,040
हम और शरियत क्या करती है, गज़ब 
पैदा करती है घबराह। 

32
00:03:11,760 --> 00:03:15,840
खौफ पैदा करती है। 
हम इसलिए मोहब्बत करते हैं कि 

33
00:03:15,840 --> 00:03:22,960
पहले उसने हमसे मोहब्बत की 
क्योंकि खुदा ने हमें दहशत की रू 

34
00:03:22,960 --> 00:03:29,080
नहीं क्योंकि खुदा ने हमें दहशत 
की रू नहीं, दहशत की रू शरीयत के 

35
00:03:29,080 --> 00:03:31,880
अधीन। 
पैदा होती है। 

36
00:03:32,440 --> 00:03:37,720
मुसा के 10 बल्कि कुदरत और 
मोहब्बत और तरबियत की रू दी है। 

37
00:03:37,920 --> 00:03:42,000
क्योंकि रूल कुछ जो हम को बक्सा 
गया है उसके मसले से खुदा की 

38
00:03:42,000 --> 00:03:44,600
मोहब्बत हमारे दिलों में डाली गई 
है। 

39
00:03:44,960 --> 00:03:49,240
मोहब्बत सबिर है और मेहरबान 
मोहब्बत हसद नहीं करती, मोहब्बत 

40
00:03:49,240 --> 00:03:52,840
शेख ही नहीं मारती। 
और फूलती नहीं नजीबा काम नहीं 

41
00:03:52,840 --> 00:03:58,120
करती, अपनी बेहतरीन नहीं चाहती 
झुंझुलाती नहीं बदगुमानी नहीं 

42
00:03:58,120 --> 00:04:03,280
करती बदकारी से खुश नहीं होती 
बल्कि रास्ते से खुश होती है। 

43
00:04:03,400 --> 00:04:08,640
सब कुछ सह लेती है, सब कुछ यकीन 
करती है, सब बातों की उम्मीद रखती

44
00:04:08,640 --> 00:04:11,480
है। 
सब बातों की बर्दाश्त करती है। 

45
00:04:11,680 --> 00:04:18,079
देखो बाप ने हमसे कैसी मोहब्बत की
है कि हम खुदा के सृजंद कहलाए और 

46
00:04:18,079 --> 00:04:21,839
हम हैं भी। 
दुनिया हमें इसलिए नहीं जानती की 

47
00:04:21,839 --> 00:04:27,600
उसने उसे भी नहीं जाना। 
हमने मोहब्बत को इसी से जाना है 

48
00:04:27,600 --> 00:04:34,040
कि उसने हमारे वास्ते अपनी जान दे
दी और हम पर भी भाइयों के वास्ते 

49
00:04:34,080 --> 00:04:42,960
जान देनी फंस, क्योंकि जब हम 
कमजोर ही थे तो ऐन वक्त पर मसी 

50
00:04:42,960 --> 00:04:48,680
बेदिनियों। 
की खातिर मोया लेकिन खुदा अपनी 

51
00:04:49,040 --> 00:04:56,640
मोहब्बत की खूबी हम पर यूं ज़ाहिर
करता है कि जब हम गुनहगार ही थे 

52
00:04:57,040 --> 00:05:02,400
तो मसीह हमारी खातिर मोया पज़ हम 
उसके। 

53
00:05:02,680 --> 00:05:10,680
खून के 22 अब रास्ता बाज ठहरे तो 
खुदा का फज़ल और उसकी जो बख्शिश 

54
00:05:10,680 --> 00:05:15,360
एक ही आदमी यानी सुमसी के फज़ल से
पैदा हुई। 

55
00:05:16,040 --> 00:05:19,280
बहुत से आदमियों पर जरूरी इफ़रत 
से नाज़िर हुई। 

56
00:05:19,760 --> 00:05:27,360
क्योंकि जब एक शख्स के कसूर के सब
मौत ने उस एक के जरिए से बादशाही 

57
00:05:27,360 --> 00:05:34,560
की तो जो लोग फजल और रास्तेबाजी 
की बख्शिश इफ़रत से हासिल करते 

58
00:05:34,560 --> 00:05:38,960
हैं वो एक शख्स यानी यस्सुमसी के 
वसीले से। 

59
00:05:39,160 --> 00:05:43,640
हमेशा की जिंदगी में जरूर ही 
बादशाही करेंगे। 

60
00:05:44,120 --> 00:05:51,680
उसी तरह फजल भी हमारे खुदावन यसु 
मसीह के वशीले से हमेशा की जिंदगी

61
00:05:51,680 --> 00:05:57,160
के लिए राष्ट्रबाजी के जरिए से 
बादशाही करें क्योंकि मसीह की 

62
00:05:57,160 --> 00:06:00,800
मोहब्बत हमको। 
मजबूर कर देती है। 

63
00:06:00,960 --> 00:06:08,600
इसलिए कि हम ये समझते हैं कि जब 
एक सबके वास्ते मोया तो सब मर गए 

64
00:06:09,000 --> 00:06:15,080
और वो इसलिए सबके वास्ते मोया कि 
जो जीते हैं वो आगे को अपने लिए 

65
00:06:15,080 --> 00:06:18,760
ना जिए। 
बल्कि उसके लिए जो उनके वास्ते 

66
00:06:18,760 --> 00:06:26,200
मोया और फिर जी उठा वो आप हमारे 
गुनाहों को अपने बदन पर लिए हुए 

67
00:06:26,440 --> 00:06:32,120
सलीब पर चढ़ गया ताकि हम गुनाहों 
के ऐतबार से, मरकर रस बाजी के 

68
00:06:32,120 --> 00:06:37,160
ऐतबार से जिए। 
और उसी के मार खाने से तुमने सिपा

69
00:06:37,160 --> 00:06:42,520
पाई, मगर खुदा ने अपनी रहम की 
दौलत से उस बड़ी मोहब्बत के सबब 

70
00:06:42,840 --> 00:06:48,320
जो उसने हमसे की जब कसूरों के सबब
मुर्दा ही थे तो हमको मसीह के साथ

71
00:06:48,320 --> 00:06:52,120
जिंदा किया तुमको फजल ही से निजात
मिली है। 

72
00:06:52,200 --> 00:07:00,680
और मसी यसू में शामिल करके उसके 
साथ जलाया और आसमानी मुकामों पर 

73
00:07:00,680 --> 00:07:07,400
उसके साथ बिठाया ताकि वो अपनी उस 
मेहरबानी से जो मसी यसू में हम पर

74
00:07:07,400 --> 00:07:13,720
है आने वाले ज़मानों में। 
अपने फसल की बे निहायत दौलत दिखाई

75
00:07:13,720 --> 00:07:18,160
क्योंकि हमको ईमान के वसीले फसल 
ही से निजात मिली और ये तुम्हारी 

76
00:07:18,160 --> 00:07:24,200
तरफ से नहीं, खुदा की बख्शिश है 
क्योंकि हम उसकी कारीगरी है और 

77
00:07:24,200 --> 00:07:28,320
मसीयससु में उन्हें एक अमाल के 
वास्ते मखलूक हुए। 

78
00:07:28,560 --> 00:07:33,840
जिनको खुदा ने पहले से हमारे करने
के लिए तैयार किया था। 

79
00:07:34,160 --> 00:07:39,520
बस याद करो की तुम जिस्म के रू से
गैरको वाले हो और वो लोग जो जिस्म

80
00:07:39,520 --> 00:07:44,880
में हाथ से किए हुए खत्मे के सबब 
मक्तून कहलाते हैं। 

81
00:07:45,080 --> 00:07:50,040
तुमको ना मक्तून कहते हैं। 
अगले जमाने में मसीह से जुदा और 

82
00:07:50,040 --> 00:07:55,920
इजरायल की सल्तनत से खारिज और 
वादे के अहदों से नावाकिफ और ना 

83
00:07:55,920 --> 00:07:59,600
उम्मीद और दुनिया में खुदा से 
अलहिदा थे। 

84
00:07:59,960 --> 00:08:04,400
मगर तुम जो पहले दूर थे अब मसीह 
यसु में। 

85
00:08:04,760 --> 00:08:11,520
मसीह के खून के सबब से नजदीक हो 
गए हो क्योंकि वो ही हमारी सुलह 

86
00:08:11,520 --> 00:08:18,440
है जिसने दोनों को एक कर लिया और 
जुदाई की दीवार को जो बीच में थी,

87
00:08:18,440 --> 00:08:22,240
ढा दिया। 
चुनौती उसने अपनी जिस्म के जरिए 

88
00:08:22,240 --> 00:08:27,080
से दुश्मनी यानी वो शरियत। 
जिसके हुक्म जाबी के तौर पर थे, 

89
00:08:27,080 --> 00:08:32,880
मकफ कर दी ताकि दोनों से अपने आप 
में एक नया इंसान पैदा करके सुलाह

90
00:08:32,880 --> 00:08:38,159
करा दे और सलीब पर दुश्मनी को 
मिटाकर और उसके सब से दोनों को एक

91
00:08:38,159 --> 00:08:43,320
तन बनाकर खुदा से मिलाएं और उसने 
आकर तुम्हें जो दूर थे और। 

92
00:08:43,520 --> 00:08:48,480
उन्हें जो नजदीक थे, दोनों को 
सुलह की खुशखबरी दी, क्योंकि उसी 

93
00:08:48,480 --> 00:08:54,400
के वसीले से हम दोनों की एक ही 
रूप में बाप के पास रसाई होती है।

94
00:08:54,440 --> 00:09:00,560
बस अब तुम परदेसी और मुसाफिर नहीं
रहे बल्कि मुकद्दसों के हम वतन और

95
00:09:00,560 --> 00:09:04,560
खुदा के। 
घराने के हो गए और रसूलों और 

96
00:09:04,920 --> 00:09:10,680
नबियों की नींव पर जिसके कोने के 
सिरे का पत्थर कुदमसी यसु है, 

97
00:09:10,880 --> 00:09:15,880
तामीर किये गए हो, उसी में हर एक 
इमारत मिल मिलाकर खुदावन में पाक 

98
00:09:15,880 --> 00:09:20,840
मकदस बनती जाती है और तुम भी 
उसमें बाहम तामीर किये जाते हो? 

99
00:09:21,480 --> 00:09:27,080
ताकि रूह में खुदा का मस्कन बनो। 
सबसे बढ़कर ये है की आपस में बड़ी

100
00:09:27,080 --> 00:09:31,600
मोहब्बत रखो क्योंकि मोहब्बत बहुत
से गुनाहों पर पर्दा डाल देती है।

101
00:09:32,560 --> 00:09:39,600
खुदा रूह है बल्कि खुदा सच्चा 
ठहरे और हर एक आदमी झूठा और 

102
00:09:39,600 --> 00:09:45,400
मोहब्बत इसमें है। 
कि उसने हमसे मोहब्बत की और हमारे

103
00:09:45,400 --> 00:09:51,240
गुनाहों के खफारे के लिए अपने 
बेटे को भेजा, लेकिन जब वक्त पूरा

104
00:09:51,240 --> 00:09:57,240
हो गया तो खुदा ने अपने बेटे को 
भेजा ज़िन्दगी के दमकों। 

105
00:09:57,880 --> 00:10:03,160
जो औरत से पैदा हुआ और शरियत के 
मताहत पैदा हुआ ताकि शरियत के 

106
00:10:03,160 --> 00:10:11,400
मताहतों को मोड़ लेकर छुड़ा ले और
हमको पालक होने का दर्जा मिले। 

107
00:10:11,760 --> 00:10:14,840
बच्चों के तुम बेटे हो इसलिए खुदा
ने अपने। 

108
00:10:15,080 --> 00:10:21,080
बेटे की रूह हमारे दिलों में भेजी
जो अब्बा यानी ए बाप कह कहकर 

109
00:10:21,080 --> 00:10:26,720
पुकारना यानी जिंदगी का दम इसके 
पास बेटा है, उसके पास जिंदगी है,

110
00:10:27,240 --> 00:10:32,000
जिसके पास बेटा नहीं उसके पास 
जिंदगी भी नहीं मस्सी जो हमारे 

111
00:10:32,000 --> 00:10:36,320
लिए लाती बना। 
उसने हमें मोल लेकर शरियत की लालत

112
00:10:36,320 --> 00:10:42,480
से छुड़ाया, क्योंकि लिखा है कि 
जो कोई लकड़ी पर लटकाया गया वो 

113
00:10:42,480 --> 00:10:46,520
लांती है। 
तहकीमसी यसु में इब्राहिम की बरकत

114
00:10:46,520 --> 00:10:52,040
गैरकुमो तक भी पहुंचे और हम ईमान 
के वसीले से उस रूह को हासिल करें

115
00:10:52,040 --> 00:10:56,840
जिसका वादा हुआ है। 
तुम किताबें मुकदस में ढूंढ़ते हो

116
00:10:56,840 --> 00:11:00,760
क्योंकि समझते हो कि उसमें हमेशा 
की जिंदगी तुम्हें मिलती है और ये

117
00:11:00,760 --> 00:11:05,720
वो है जो मेरी गवाही देती है। 
ये ना समझो कि मैं तुरेत यानी 

118
00:11:05,720 --> 00:11:10,440
मूसा की पहली पांच किताबें। 
यह नबियों की, किताबों को मनसूख 

119
00:11:10,440 --> 00:11:16,000
करने आया मनसूख करने नहीं बल्कि 
पूरा करने आया हूँ क्योंकि 

120
00:11:16,480 --> 00:11:19,720
क्योंकि सारे कामकाज किसने पूरे 
किए? 

121
00:11:20,480 --> 00:11:25,280
बाप ने खुदा उन खुदा ने क्योंकि 
मैं तुमसे सच कहता हूँ। 

122
00:11:25,680 --> 00:11:31,360
की जब तक आसमान और जमीन टल ना जाए
एक नुख्ता या एक शोषा तुरे से 

123
00:11:31,360 --> 00:11:34,480
हरगिज ना टलेगा। 
जब तक सब कुछ पूरा ना हो जाए। 

124
00:11:35,360 --> 00:11:42,840
फिर उसने फिर उसने उनसे कहा कि ये
मेरी वो बातें हैं जो मैंने तुमसे

125
00:11:42,840 --> 00:11:48,560
उस वक्त कही थी। 
जब तुम्हारे साथ था की जरूर है की

126
00:11:48,560 --> 00:11:55,600
जितनी बातें मूसा के तुरेत और 
नबियों के शरीफों और ज़बूर में 

127
00:11:55,600 --> 00:12:02,040
मेरी बाबत लिखी है पूरी हों। 
फिर उसने उनका जेहन खोला ताकि 

128
00:12:02,040 --> 00:12:08,560
किताबे मुकद्दस को समझें। 
और उनसे कहा, यूं लिखा है कि 

129
00:12:10,000 --> 00:12:15,120
मस्जिद दुख उठाएगा और तीसरे दिन 
मुर्दो में से जी उठेगा और 

130
00:12:15,120 --> 00:12:23,320
येरुशलम से शुरू करके सारी। 
कौमों में तौबा और गुनाहों की 

131
00:12:23,320 --> 00:12:26,360
मुआफ़े की मनादी उसके नाम से की 
जाएगी। 

132
00:12:26,720 --> 00:12:32,600
तुम इन बातों के गवाह हो। 
उसने उनसे कहा कि ए नादानों और 

133
00:12:32,600 --> 00:12:37,120
नभियों की सारी बातों के। 
मानने में सुस्त इतका दो क्या 

134
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मसीह को ये दुख उठाकर अपने जलाल 
में दाखिल होना जरूर न था? 

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फिर मूसा से और सबनब्बियों से 
शुरू करके सारे नविश्ते में जितनी

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बातें उसके हक में लिखी हुई हैं, 
वो उनको समझा दी। 

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क्योंकि जिंदगी की रूह की शरियत 
ने मसी यसु ने मुझे गुनाह और मौत 

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की शरियत से आजाद कर दिया। 
इसलिए की जो कम शरियत जिस्म के 

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सबब कमजोर होकर ना कर सकी वो खुदा
ने किया। 

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यानी उसने। 
अपने बेटे को गुनाह अलुदा जिस्म 

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की सूरत में और गुनाह की कुर्बानी
के लिए भेज कर जिस्म में गुनाह की

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सजा का हुकुम दिया ना की शरीयत का
तकाजा हमें बुरा हो जो जिस्म के 

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मुताबिक नहीं बल्कि रू के मुताबिक
चलते हैं खुदा की शरीयत। 

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खुदा पूरी करता है खुदा की शरियत 
है फज़ल की शरियत यानी फज़ल और 

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इत्मिनान, जिंदगी और इत्मिनान जो 
इमान से जिंदगी और इत्मिनान की 

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शरियत है रूहानी शरियत, तुम एक 
दूसरे का भार उठाओ और यूं। 

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मसीह की शरियत को पूरा करो। 
इस सब से मैं उस भाब के आगे घुटने

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टेकता हूँ जिससे आसमान और जमीन का
हर एक खानदान नामजद है कि वो अपने

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जलाल की दौलत के मुहाफित में ये 
इनायत करे कि तुम उसकी रूह से? 

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अपनी बातीनी इंसानियत में बहुत ही
जुराव हो जाओ और ईमान के बुशीले 

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से मसी तुम्हारे दिलों में सकून 
करे ताकि तुम मौहब्बत में जड़ 

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पकड़ के और बुनियाद कायम करके सब 
मुकद्दसों समेत बखूबी मालूम कर 

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सको कि उसकी चौड़ाई और लम्बाई और 
उचाई और गहराई कितनी है। 

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परमसीह की उस मोहब्बत को जान सको 
जो जानने से बाहर है ताकि तुम 

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खुदा की सारी ममूरी तक ममूर हो 
जाओ। 

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अब जो ऐसा कादिर है की उस कुदरत 
के मुआफ़िक जो हम में तासीर करती 

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है, हमारी और ख्याल से बहुत 
ज्यादा काम करता है। 

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कलिसिया में और मसीयसू में पुष्प 
दरपुष्क और अब्दुल आबाद उसकी 

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तमजीद होती रहे। 
आमीन मसीयस में आप सबों की सलामती

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हूँ।
