1
00:00:02,280 --> 00:00:06,960
फ़िलाडेल्फ़िया शहर में कभी कभी 
अनजान बने रहना ही आपकी जान बचा 

2
00:00:06,960 --> 00:00:10,680
सकता है। 
अगर आप मेरी तरह कैलिफोर्निया में

3
00:00:10,680 --> 00:00:15,440
रहे हैं तो आपको आदत होगी कि जब 
आप सड़क पार करते हैं तो कारें 

4
00:00:15,440 --> 00:00:19,200
आपके लिए रुक जाती हैं। 
आप कभी कभी ड्राइवर की आँखों में 

5
00:00:19,200 --> 00:00:22,120
देखते हैं। 
मैंने तुम्हें देख लिया तुमने 

6
00:00:22,120 --> 00:00:27,320
मुझे देख लिया और आप जानते हैं कि
उसे रुकना ही पड़ेगा, लेकिन 

7
00:00:27,320 --> 00:00:30,400
फ़िलाडेल्फ़िया में ऐसा करने से 
आपकी जान जा सकती है। 

8
00:00:31,360 --> 00:00:35,880
अगर ड्राइवर ने देख लिया कि आपने 
उसे देख लिया है तो वो समझ जाएगा 

9
00:00:36,080 --> 00:00:41,600
कि अब आप सड़क पार नहीं करेंगे। 
क्योंकि इंसान और कार की टक्कर 

10
00:00:41,600 --> 00:00:44,920
में नुकसान हमेशा इंसान का ही 
होता है। 

11
00:00:45,400 --> 00:00:50,480
इसलिए वहाँ सड़क पार करने का सबसे
अच्छा तरीका क्या है कि अपनी 

12
00:00:50,480 --> 00:00:55,200
आँखों को ट्रैफिक से दूर रखें, 
सड़क ऐसे पार करें जैसे आप खो गए 

13
00:00:55,200 --> 00:00:59,000
हों या उलझन में हों, बस एक 
टूरिस्ट की तरह चलें। 

14
00:01:00,840 --> 00:01:03,320
मकसद ये है कि आप बिल्कुल अंजान 
दिखे। 

15
00:01:04,120 --> 00:01:07,840
ड्राइवर उन लोगों के लिए रुक जाते
हैं जिन्हें अपनी जान बचाने का 

16
00:01:07,840 --> 00:01:13,240
कोई मौका नहीं दिखता। 
इसलिए आपका सबसे बड़ा साथी है कुछ

17
00:01:13,240 --> 00:01:18,440
भी ना पता होना जब ड्राइवर को 
लगेगा कि आपको उसके आने की खबर ही

18
00:01:18,440 --> 00:01:21,040
नहीं है। 
तो वो समझ जाएगा कि आप खुद को 

19
00:01:21,040 --> 00:01:27,800
बचाने के लिए पीछे नहीं हटेंगे तब
वो अपनी गाडी धीरे कर लेगा, वैसे 

20
00:01:27,800 --> 00:01:31,720
वो शायद ही धीरे करेगा। 
अगर आप पूरी तरह सेफ रहना चाहते 

21
00:01:31,720 --> 00:01:35,800
हैं तो दूसरे लोगों के साथ सड़क 
पार करें और अगर बहुत ज्यादा 

22
00:01:35,800 --> 00:01:39,160
सुरक्षित रहना है। 
तो अपनी कार के अंदर ही रहें या 

23
00:01:39,360 --> 00:01:44,800
फिलाडल्फिया से दूर रहें। 
फिलाडल्फिया की जिंदगी पुराने 

24
00:01:44,800 --> 00:01:51,000
वीडियो गेम फ्रॉगर जैसी नहीं है। 
उस गेम में आपको एक मेंढक को पांच

25
00:01:51,000 --> 00:01:54,760
लेन के ट्रैफिक से बचाकर ले जाना 
होता था। 

26
00:01:54,880 --> 00:01:59,040
सड़क पार करने के बाद आपको लकड़ी 
के लट्ठों और कछुमों के ऊपर से 

27
00:01:59,040 --> 00:02:04,640
कूदकर दूसरी तरफ जाना होता था। 
फ़िलाडेल्फ़िया के उलट गेम में 

28
00:02:04,640 --> 00:02:07,240
आँखें बंद करने से कोई फायदा नहीं
होता। 

29
00:02:07,960 --> 00:02:12,120
गेम की कारों और ट्रकों को इस बात
से कोई फर्क नहीं पड़ता या आप 

30
00:02:12,120 --> 00:02:15,920
उन्हें देख रहे हैं या नहीं। 
उन्हें बस आपको कुशलने के लिए 

31
00:02:15,920 --> 00:02:22,720
बनाया गया है तो उस गेम में आप 
किसी इंसान से नहीं बल्कि नेचर के

32
00:02:22,720 --> 00:02:26,880
नियमों से लड़ रहे हैं। 
वहाँ सिर्फ सच मायने रखता है। 

33
00:02:27,680 --> 00:02:32,280
वहाँ अनजान या बेवकूफ बनने से कोई
मदद नहीं मिलती लेकिन फिलाडल्फिया

34
00:02:32,280 --> 00:02:35,200
में आप दूसरे लोगों के साथ एक खेल
खेल रहे हैं। 

35
00:02:35,680 --> 00:02:40,560
यह नियम अलग हैं। 
यह अनजान या इग्नोरेंट या बेवकूफ 

36
00:02:40,560 --> 00:02:46,440
बनना आपके काम आ सकता है। 
जब नतीजा सिर्फ नेचर पर टिका हो 

37
00:02:46,560 --> 00:02:48,840
तो बेवकूफ बनने का कोई फायदा 
नहीं। 

38
00:02:49,720 --> 00:02:53,800
अगर आप कार को नहीं देखेंगे तो 
नेचर आपके मेंढक को कुशल देगी और 

39
00:02:53,960 --> 00:03:00,320
खेल खत्म, लेकिन जब आप दूसरे 
लोगों के साथ कोई खेल खेलते हैं 

40
00:03:00,360 --> 00:03:05,280
तो सब कुछ बदल जाता है, जैसे 
फ़िलाडेल्फ़िया में सड़क पार करना

41
00:03:06,520 --> 00:03:08,880
जहाँ आपकी जीत दूसरों पर टिक्की 
है। 

42
00:03:09,720 --> 00:03:13,360
वह अनजान या बेवकूफ दिखना बहुत 
काम की चीज़ हो सकती है। 

43
00:03:14,400 --> 00:03:17,040
मैं दिमाग की पढ़ाई करने वाला एक 
एक्सपर्ट हूँ। 

44
00:03:17,480 --> 00:03:21,920
रिवोल्यूशनरी साइकोलॉजिस्ट हूँ। 
मैं अक्सर सोचता हूँ कि इंसान का 

45
00:03:21,920 --> 00:03:26,560
दिमाग कैसे बना है? 
निशा ने हमें बहुत कमाल का बनाया 

46
00:03:26,560 --> 00:03:29,680
है। 
हमारे दिमाग की वजह से ही हमने इस

47
00:03:29,680 --> 00:03:34,240
पेस में पहुंचने वाले जहाज़ बनाए 
और बेहतरीन कविताएं लिखीं। 

48
00:03:35,920 --> 00:03:40,080
लेकिन हमारे दिमाग की इतनी तारीफ 
के बीच कुछ लोग इसकी बुराइ भी 

49
00:03:40,080 --> 00:03:43,760
करते हैं। 
आजकल ऐसी किताबों और खबरों की 

50
00:03:43,760 --> 00:03:47,160
बाढ़ आई है जो बताती है कि इंसान 
कितने? 

51
00:03:47,280 --> 00:03:51,280
गलत फैसले लेता है। 
कैसे हम बेकार की बातों में आ 

52
00:03:51,280 --> 00:03:56,120
जाते हैं और गाड़ी चलाते वक्त 
कितना बुरा बर्ताव करते हैं। 

53
00:03:57,200 --> 00:04:01,680
मैं ये कह सकता था कि ये किताब सब
कुछ ठीक कर देगी और बताए कि इंसान

54
00:04:01,680 --> 00:04:04,800
बुरा नहीं है, लेकिन ये किताब ऐसा
नहीं करेगी। 

55
00:04:06,080 --> 00:04:10,480
ये किताब स्थल में समझाने की 
कोशिश है कि हम जो करते हैं वो 

56
00:04:10,480 --> 00:04:13,960
क्यों करते हैं? 
मैं ये दिखाना चाहता हूँ कि अगर 

57
00:04:13,960 --> 00:04:17,839
हम बहुत बार गलत होते हैं तो उसके
पीछे भी कोई वजह है। 

58
00:04:18,440 --> 00:04:20,880
हमेशा सही होना ही सब कुछ नहीं 
होता। 

59
00:04:22,400 --> 00:04:25,560
मेरी बात यह है कि हम जो अनजान या
बेवकूफ बनते हैं। 

60
00:04:26,800 --> 00:04:31,560
ये जो हम दोगलापन दिखाते हैं 
हाइपोक्रिटिकल वो इसलिए है 

61
00:04:31,560 --> 00:04:36,080
क्योंकि हमारा दिमाग दूसरों के 
साथ चालाकी भरा खेल खेलने के लिए 

62
00:04:36,080 --> 00:04:39,600
बना है। 
हमारा दिमाग इस बात का फायदा 

63
00:04:39,600 --> 00:04:44,840
उठाता है कि हमेशा सब कुछ जानना। 
यह हमेशा सही होना हमारे लिए 

64
00:04:44,840 --> 00:04:50,760
फायदेमंद नहीं होता। 
इंसान एक सोशल स्पीशीज़ है इसलिए 

65
00:04:50,760 --> 00:04:55,320
सही होने से कहीं ज्यादा जरूरी 
दूसरी चीजें होती हैं। 

66
00:04:56,400 --> 00:05:01,640
सच तो ये है कि अनजान गलत। 
और बेवकूफ बनना आपको बहुत ज्यादा 

67
00:05:01,640 --> 00:05:06,240
फायदा पहुंचा सकता है, बशर्ते आप 
इसे सही तरीके से करें। 

68
00:05:09,280 --> 00:05:13,200
हमारा दिमाग एक नहीं बल्कि बहुत 
सारे अलग अलग हिस्सों से मिलकर 

69
00:05:13,200 --> 00:05:16,200
बना है। 
ये हिस्से अक्सर एक दूसरे से 

70
00:05:16,200 --> 00:05:21,480
बिल्कुल उल्टी बातें मानते हैं। 
कभी कभी तो ये साफ दिखता है जैसे 

71
00:05:21,800 --> 00:05:25,960
जब किसी के दिमाग में चोट लग जाए 
या जब हमारी आँखें हमें धोखा देती

72
00:05:25,960 --> 00:05:31,240
हैं लेकिन कुछ बातें ऐसी होती हैं
जो आसानी से नहीं दिखती पर होती 

73
00:05:31,240 --> 00:05:37,120
बहुत मजेदार है। 
एक फेमस कवि ने कहा था। 

74
00:05:37,360 --> 00:05:41,440
क्या मैं अपने ही बात काटता हूँ? 
हाँ बिलकुल, क्योंकि मैं बहुत 

75
00:05:41,440 --> 00:05:44,840
बड़ा हूँ और मेरे अंदर बहुत सारे 
लोग बसते हैं। 

76
00:05:46,120 --> 00:05:50,880
हमारे दिमाग की बनावट ही ऐसी है 
कि हम एक ही समय पर दो अलग बातें 

77
00:05:50,880 --> 00:05:55,000
सोच सकते हैं। 
इस किताब में मैं आपको ये समझाना 

78
00:05:55,000 --> 00:05:58,280
चाहता हूँ। 
ये हमारा दिमाग बहुत सारी छोटी 

79
00:05:58,280 --> 00:06:01,080
छोटी मशीनों या प्रोसेसर से बना 
है। 

80
00:06:01,480 --> 00:06:05,720
इन्हें आप अपने मोबाइल के अलग अलग
ऐप्स की तरह समझ सकते हैं। 

81
00:06:06,760 --> 00:06:12,480
हर ऐप का अपना काम होता है और इसे
नेशन ने एक खास गोल के लिए बनाया 

82
00:06:12,480 --> 00:06:14,760
है। 
आप। 

83
00:06:15,080 --> 00:06:19,240
कब क्या करते हैं ये इस पर डिपेंड
करता है कि उस वक्त आपके दिमाग का

84
00:06:19,240 --> 00:06:25,840
कौन सा ऐप चल रहा है, क्योंकि अलग
अलग समय पर अलग अलग हिस्सा राज़ 

85
00:06:25,840 --> 00:06:29,240
करते हैं। 
इसलिए इंसान का बिहेव्यर थोड़ा 

86
00:06:29,520 --> 00:06:33,360
उलझा हुआ होता है। 
इसमें हैरान होने वाली कोई बात 

87
00:06:33,360 --> 00:06:38,120
नहीं है। 
सबसे बड़ी मुश्किल ये है कि हमारे

88
00:06:38,120 --> 00:06:42,200
दिमाग के अंदर क्या चल रहा है ये 
हमें खुद भी पता नहीं होता। 

89
00:06:43,080 --> 00:06:46,520
हम अक्सर ये नहीं बता पाते कि 
हमने कोई काम क्यों किया? 

90
00:06:47,360 --> 00:06:52,120
अगर आप मेरी तरह हैं तो आपने भी 
कई बार इस सवाल कहा किए। 

91
00:06:52,360 --> 00:06:55,800
तुमने ऐसा क्यों किया? 
जवाब दिया होगा कि मुझे सच में 

92
00:06:55,800 --> 00:06:59,400
नहीं पता। 
अच्छी खबर ये है कि दिमाग की 

93
00:06:59,400 --> 00:07:03,760
पढ़ाई यानी साइकोलॉजी हमें ये 
समझने में मदद करती है कि ये 

94
00:07:03,760 --> 00:07:08,880
हिस्से कैसे काम करते हैं। 
मेरा काम एवोल्यूशनरी साइकोलॉजी। 

95
00:07:08,880 --> 00:07:12,160
है। 
जिसका मतलब है यह समझना कि नेचर 

96
00:07:12,160 --> 00:07:18,120
ने हमारे दिमाग के हिस्सों को 
क्या काम सौंपा है, जैसे दिमाग का

97
00:07:18,120 --> 00:07:23,680
एक हिस्सा देखने के लिए है, एक 
भाषा समझने के लिए और एक शरीर को 

98
00:07:23,680 --> 00:07:27,520
चलाने के लिए, वैसे ही बाकी 
हिस्सों के भी काम। 

99
00:07:27,520 --> 00:07:31,600
है जैसे। 
साथ ही चुनना, दोस्त बनाना या 

100
00:07:31,600 --> 00:07:37,000
दूसरों की बुराइ करना, ये किताब 
सिर्फ इस बारे में नहीं है कि हम 

101
00:07:37,280 --> 00:07:39,600
बेवकूफी भरे फैसले क्यों लेते 
हैं। 

102
00:07:40,160 --> 00:07:43,520
ये इस बारे में भी नहीं है कि 
हमारे अंदर एक दिल है और एक 

103
00:07:43,520 --> 00:07:48,520
दिमाग। 
हम दिमाग को सिर्फ दो तीन हिस्सों

104
00:07:48,520 --> 00:07:52,960
में नहीं बांट सकते क्योंकि मामला
उससे कहीं ज्यादा उलझा हुआ है। 

105
00:07:53,840 --> 00:07:57,760
यह किताब उन बातों के बारे में है
जो आपस में मेल नहीं खाती 

106
00:07:58,000 --> 00:08:02,520
कॉन्ट्रेडिक्शन्स है। 
जैसे आपका एक मन करता है कि सुबह 

107
00:08:02,520 --> 00:08:06,000
दौड़ पर जाएं। 
लेकिन दूसरा मन कहता है कि रजाई 

108
00:08:06,000 --> 00:08:10,680
में सोए रहे। 
जब पैसे की तंगी हो, इकोनॉमिक 

109
00:08:10,680 --> 00:08:14,840
क्राइसिस हो, तब आप ये जानना भी 
चाहते हैं कि आपके बैंक में कितने

110
00:08:14,840 --> 00:08:19,080
पैसे बचे हैं और साथ ही डर के 
मारे चेक भी नहीं करना चाहते। 

111
00:08:20,000 --> 00:08:23,160
आप चाहते हैं कि सरकार लोगों के 
काम में दखल न दे। 

112
00:08:23,520 --> 00:08:27,480
लेकिन फिर भी आप चाहते हैं कि 
सरकार उन लोगों को रोके जो आपकी 

113
00:08:27,480 --> 00:08:33,280
पसंद का काम नहीं कर रहे हैं। 
सबसे मजेदार बात ये है कि हमारे 

114
00:08:33,280 --> 00:08:37,400
दिमाग में इतनी सारी उल्टी बातें 
चलती हैं पर हमें पता तक नहीं 

115
00:08:37,400 --> 00:08:40,679
चलता। 
हम ऐसे समय पर अलग अलग बातें 

116
00:08:40,679 --> 00:08:42,000
क्यों सोचते? 
हैं। 

117
00:08:42,360 --> 00:08:46,160
इसका जवाब यही है कि नेचर ने 
दिमाग को बहुत सारे हिस्सों में 

118
00:08:46,160 --> 00:08:50,400
बांटा है। 
बहुत सारे मॉड्यूल्स में यही से 

119
00:08:50,400 --> 00:08:56,680
हमेशा मिलजुल कर काम नहीं करते। 
दिमाग के इन हिस्सों को आप अलग 

120
00:08:56,680 --> 00:09:01,480
अलग इंसान की तरह समझ सकते हैं। 
कोई हिस्सा आपको मेहनती बनाता है,

121
00:09:01,560 --> 00:09:04,960
कोई आलसी। 
कोई समझदार तो कोई बिलकुल बुद्ध 

122
00:09:04,960 --> 00:09:07,760
हो। 
आपको इनके बारे में पता भी नहीं 

123
00:09:07,760 --> 00:09:11,080
चलता। 
ये बस अपना काम करते रहते हैं। 

124
00:09:13,440 --> 00:09:18,000
अब मैं आपको ये साबित करूँगा की 
आप एक ही समय पर दो ऐसी बातों पर 

125
00:09:18,000 --> 00:09:21,000
यकीन करते हैं जो एक दूसरे से 
बिलकुल अलग। 

126
00:09:21,000 --> 00:09:24,680
है। 
हमारा दिमाग दो आधे हिस्सों में 

127
00:09:24,680 --> 00:09:31,280
बंटा होता है लेफ्ट और राइट। 
आमतौर पर ये दोनों हिस्से एक तार 

128
00:09:31,640 --> 00:09:36,680
कॉरपस कैलोसम के जरिए एक दूसरे से
बात करते हैं और जानकारी बांटते। 

129
00:09:36,680 --> 00:09:41,240
हैं। 
लेकिन कुछ मरीजों की बिमारी ठीक 

130
00:09:41,240 --> 00:09:44,880
करने के लिए डॉक्टर इस तार को काट
देते हैं। 

131
00:09:45,680 --> 00:09:49,440
ऐसे में बाएं हिस्से को नहीं पता 
होता कि दायें हिस्सा क्या कर रहा

132
00:09:49,440 --> 00:09:52,920
है। 
वैज्ञानिक ने ऐसे ही एक मरीज पर 

133
00:09:52,920 --> 00:09:56,960
टेस्ट किया। 
नियम ये है कि आपकी दाईं आँख जो 

134
00:09:56,960 --> 00:10:02,200
देखती है वो दिमाग के। 
बाएं हिस्से में जाता है और बाएं 

135
00:10:02,200 --> 00:10:05,880
के जानकारी यानी लेफ्ट आई की 
जानकारी। 

136
00:10:06,160 --> 00:10:11,680
दायें हिस्से में राइट ब्रेन में 
वैज्ञानिक ने उस आदमी को 172 फोटो

137
00:10:11,680 --> 00:10:16,240
दिखाई, लेफ्ट दिमाग को मुर्गी का 
पंजा दिखाया। 

138
00:10:16,920 --> 00:10:20,400
राइट दिमाग को बर्फ़ का सीन 
दिखाया, फिर उसे बहुत सारे 

139
00:10:20,400 --> 00:10:24,960
कार्ड्स दिखा कर कहा गया कि जो 
देखा है उससे जुड़ी चीजें चुनो। 

140
00:10:26,080 --> 00:10:32,360
उसके दायें हाथ ने राइट हैंड ने, 
जिसे लेफ्ट ब्रेन चलाता है, 

141
00:10:32,400 --> 00:10:35,040
मुर्गी चुनी। 
यह सही था। 

142
00:10:35,800 --> 00:10:40,720
उसके लेफ्ट हाथ में जिसे राइट 
ब्रेन चलाता है बर्फ़ हटाने वाला 

143
00:10:40,720 --> 00:10:45,680
फावड़ा चूना यह भी सही था लेकिन 
जब उससे पूछा गया कि उसने ये 

144
00:10:45,680 --> 00:10:48,720
चीजें क्यों चुनी तो असली खेल 
शुरू होगा। 

145
00:10:49,760 --> 00:10:53,120
बोलने का काम लेफ्ट ब्रेन का होता
है। 

146
00:10:54,240 --> 00:10:58,080
लेफ्ट ब्रेन ने मुर्गी तो देखी थी
पर उसने बर्फ़ नहीं देखी थी। 

147
00:10:58,200 --> 00:11:04,080
उसने देखा कि उसका लेफ्ट हैंड 
फावड़े पर टिका है। 

148
00:11:04,280 --> 00:11:08,000
अब उसे कारण बताना था। 
उसने झट से झूठ बोल दिया। 

149
00:11:08,040 --> 00:11:11,600
यह कहानी बना ली। 
यह फावड़ा मुर्गी का दरबा साफ 

150
00:11:11,600 --> 00:11:17,360
करने के लिए है। 
सोचिए उसे सच नहीं पता था, फिर भी

151
00:11:17,360 --> 00:11:21,520
उसके दिमाग ने एक झूठी कहानी बना 
ली ताकि वह सही दिख सके। 

152
00:11:22,320 --> 00:11:26,520
असल में उस मरीज का कोई एक सच 
नहीं था क्योंकि उसके दिमाग के दो

153
00:11:26,520 --> 00:11:32,360
हिस्से अलग अलग बातें देख रहे थे।
हम सबके साथ भी ऐसा ही होता है। 

154
00:11:32,440 --> 00:11:36,480
बस हमारे दिमाग के तार कटे हुए 
नहीं है, फिर भी अलग अलग हिस्से 

155
00:11:36,480 --> 00:11:42,280
अपनी मनमानी करते हैं। 
सिर्फ कटे हुए दिमाग वाले लोग ही 

156
00:11:42,280 --> 00:11:47,080
नहीं बल्कि आम लोगों के साथ भी 
ऐसा होता है कि उनके दिमाग के दो 

157
00:11:47,080 --> 00:11:51,040
हिस्से। 
अलग अलग बातों पर यकीन करते हैं। 

158
00:11:51,160 --> 00:11:53,880
इसके कुछ बहुत मजेदार 
एग्ज़ैम्पल्स हैं। 

159
00:11:55,680 --> 00:11:59,680
कई बार जिन लोगों का हाथ या पैर 
किसी वजह से काट दिया जाता है 

160
00:11:59,880 --> 00:12:02,800
उन्हें फिर भी उस जगह पर दर्द 
महसूस होता है। 

161
00:12:03,280 --> 00:12:07,520
अगर आप मुझसे पूछे तो वो कहेंगे 
की हाँ मेरा हाथ कट चूका है। 

162
00:12:07,880 --> 00:12:11,960
लेकिन उनके दिमाग का एक हिस्सा अब
भी यही मानता है कि हाथ वहीं है। 

163
00:12:13,120 --> 00:12:18,040
एक बार एक डॉक्टर ने ऐसे ही एक 
मरीज को अपने गायब हाथ से कॉफी का

164
00:12:18,040 --> 00:12:21,600
कप पकड़ने को कहा। 
जैसे ही मरीज ने हाथ आगे बढ़ाया, 

165
00:12:21,760 --> 00:12:26,880
डॉक्टर ने कप खींच लिया। 
मरीज दर्द से चिल्ला उठा। 

166
00:12:27,000 --> 00:12:31,800
उसके दिमाग के एक हिस्से को पक्का
यकीन था कि उसका हाथ वहाँ है और 

167
00:12:31,960 --> 00:12:39,120
कब से टकरा गया है। 
फिर एक और है एलियन एंड सिंड्रोम 

168
00:12:40,120 --> 00:12:43,000
जिद्दी हाथ ये एक बहुत अजीब 
बिमारी है। 

169
00:12:43,680 --> 00:12:46,520
इसमें मरीज का एक हाथ उसकी बात 
नहीं मानता। 

170
00:12:47,400 --> 00:12:52,480
वो हाथ अपनी मर्जी से काम करता है
जैसे बटन खोल देना, खाना छीन लेना

171
00:12:52,600 --> 00:12:56,680
या कपड़े खींचना। 
मरीज को ऐसा लगता है जैसे उस हाथ 

172
00:12:56,680 --> 00:13:01,440
का अपना अलग दिमाग है। 
कई बार तो मरीज अपने ही हाथ को तू

173
00:13:01,440 --> 00:13:05,960
कहकर डांटते हैं और दूसरा हाथ उसे
रोकने की कोशिश करता है। 

174
00:13:06,400 --> 00:13:11,240
ऐसा लगता है जैसे शरीर के अंदर ही
दो लोग आपस में लड़ रहे हों। 

175
00:13:14,000 --> 00:13:17,640
कुछ लोग ऐसे होते हैं जो कहते हैं
कि उन्हें कुछ भी दिखाई नहीं दे 

176
00:13:17,640 --> 00:13:20,960
रहा। 
वे पूरी तरह अंधे हैं लेकिन अगर 

177
00:13:20,960 --> 00:13:25,880
आप उनके सामने एक्स या वो लिखकर 
पूछ रहे हैं कि क्या लिखा है? 

178
00:13:25,960 --> 00:13:30,840
तो वे सही अंदाजा लगा लेते हैं। 
यहाँ दिमाग का एक हिस्सा जानता है

179
00:13:30,840 --> 00:13:35,920
कि सामने क्या है पर वो हिस्सा जो
बोलता है उसे नहीं पता कि आंखें 

180
00:13:35,920 --> 00:13:39,760
क्या देख रही हैं। 
इसलिए वो बार बार यही कहता है कि 

181
00:13:40,040 --> 00:13:44,680
मैं तो अंधा हूँ पर असल में दिमाग
का दूसरा हिस्सा सब देख रहा होता 

182
00:13:44,680 --> 00:13:52,680
है। 
हमारा दिमाग अलग अलग डिब्बों यानी

183
00:13:52,680 --> 00:13:57,280
मॉडल्स की तरह काम करता है। 
कुछ डिब्बे एक दूसरे से बात करते 

184
00:13:57,280 --> 00:14:01,520
हैं और जानकारी शेयर करते हैं। 
कुछ डिब्बे बिल्कुल अलग रहते हैं।

185
00:14:01,680 --> 00:14:05,160
उन्हें दूसरे डिब्बों की बात से 
कोई फर्क नहीं पड़ता। 

186
00:14:06,000 --> 00:14:08,920
इससे वैज्ञानिक ने इनके अब सलूशन 
कहा है। 

187
00:14:09,040 --> 00:14:13,040
इसका मतलब है एक डिब्बे की बात 
दूसरे तक नहीं पहुंचती। 

188
00:14:14,200 --> 00:14:18,400
अगर दिमाग की ये गड़बड़ियां सिर्फ
आँखों के धोखे तक ही सीमित रहती। 

189
00:14:18,800 --> 00:14:23,040
तो शायद हमें इतनी चिंता करने की 
जरूरत नहीं थी, लेकिन कुछ 

190
00:14:23,080 --> 00:14:27,840
गड़बड़ियां ऐसी होती हैं जिनसे 
लोग काफी परेशान हो जाते हैं। 

191
00:14:28,920 --> 00:14:32,880
एक बड़े विद्वान ने एक बार कहा था
कि दुनिया के दो सबसे बड़े 

192
00:14:33,080 --> 00:14:37,000
मिस्ट्रीज़ हैं। 
पहला ये कि ये दुनिया बनी ही 

193
00:14:37,000 --> 00:14:40,720
क्यों और दूसरा ये। 
जो लोग रात को अपने फ्रिज पर ताला

194
00:14:40,720 --> 00:14:45,280
क्यों लगाते हैं? 
अब फ्रिज पर ताला लगाने वाली बात 

195
00:14:45,280 --> 00:14:49,080
को गॉड से समझिए। 
जो लोग डाइटिंग कर रहे होते हैं 

196
00:14:49,080 --> 00:14:54,480
उन्हें अक्सर सलाह दी जाती है कि 
खाने को खुद से दूर रखें या फ्रिज

197
00:14:54,480 --> 00:14:58,640
लॉक कर दें ताकि जब रात को अचानक 
कुछ खाने का मन करें। 

198
00:14:58,840 --> 00:15:03,880
तो आलस की वजह से आप उठ कर न जाए,
लेकिन यहाँ एक बहुत बड़ी उलझन है।

199
00:15:04,560 --> 00:15:07,920
अगर आप रात को खाना नहीं चाहते तो
बस मत खाइए। 

200
00:15:08,000 --> 00:15:14,360
ताला लगाने की नौबत ही क्यों आई? 
बहुत से लोग और पैसे का मामला 

201
00:15:14,360 --> 00:15:16,880
समझने वाले एक्सपर्ट्स से मानते 
हैं। 

202
00:15:17,000 --> 00:15:19,160
कि इंसान का दिमाग एक ही टुकड़ा 
है। 

203
00:15:20,440 --> 00:15:23,960
उनके हिसाब से दिमाग एक जादुई 
गेंद की तरह है। 

204
00:15:24,560 --> 00:15:29,920
आप उससे कोई भी सवाल पूछें वो 
सारी जानकारी को इकट्ठा करेगा और 

205
00:15:29,920 --> 00:15:33,920
एक सही जवाब दे देगा। 
अगर ये सच होता। 

206
00:15:34,040 --> 00:15:38,200
तो चाहे रात के 12:00 बज रहे हो 
या सुबह के आठ, आपका जवाब ही 

207
00:15:38,200 --> 00:15:42,560
चाहिए होता कि मुझे खाना नहीं 
खाना है, फिर ताले की जरूरत ही 

208
00:15:42,560 --> 00:15:46,200
नहीं पड़ती। 
लेकिन मेरा मानना है कि दिमाग एक 

209
00:15:46,200 --> 00:15:49,160
नहीं है बल्कि इसके अलग अलग 
हिस्से हैं। 

210
00:15:49,280 --> 00:15:53,800
अलग अलग मॉड्यूल्स हैं। 
इस किताब को पढ़ते पढ़ते आप समझ 

211
00:15:53,800 --> 00:15:58,440
जाएंगे कि फ्रिज पर ताला लगाना 
कोई रहस्य नहीं बल्कि दिमाग के 

212
00:15:58,440 --> 00:16:04,360
अलग अलग हिस्सों की लड़ाई है। 
एक तरह की गड़बड़ी होती है 

213
00:16:04,680 --> 00:16:09,880
दोगलापन यह हिपोक्रिसी इसका मतलब 
है दूसरों को। 

214
00:16:10,160 --> 00:16:16,080
किसी काम के लिए बुरा भला कहना और
खुद वही काम छिप कर करना, इसे 

215
00:16:16,080 --> 00:16:18,680
समझने के लिए एक और रोबोट की 
कल्पना करें। 

216
00:16:18,840 --> 00:16:23,640
मान लीजिए उस रोबोट के पास एक 
डायरी है जिसमें सारे नियम लिखें 

217
00:16:23,640 --> 00:16:29,000
हैं कि क्या सही है और क्या गलत। 
जब वो किसी दूसरे को देखता है तो 

218
00:16:29,000 --> 00:16:33,920
अपनी डायरी देखता है और कहता है 
ये गलत है और जब वो खुद खुश करने 

219
00:16:33,920 --> 00:16:36,840
जाता है तब भी वही डायरी देखता 
है। 

220
00:16:37,520 --> 00:16:42,080
ऐसा रोबोट कभी हाइपोक्रिक नहीं हो
सकता, कभी दोगला नहीं हो सकता, 

221
00:16:42,440 --> 00:16:45,240
क्योंकि उसके पास नियमों की एक ही
लिस्ट है। 

222
00:16:47,120 --> 00:16:51,680
पर हम इंसान ऐसे नहीं हैं। 
हमारे दिमाग में नियमों की कोई एक

223
00:16:51,680 --> 00:16:55,280
लिस्ट नहीं है। 
हमारे दिमाग में अलग अलग हिस्से 

224
00:16:55,280 --> 00:16:58,880
हैं और हर हिस्से की अपनी अलग सोच
है। 

225
00:16:59,440 --> 00:17:03,480
इसी वजह से हम वो काम कर बैठते 
हैं जिन्हें हम दूसरों के लिए गलत

226
00:17:03,480 --> 00:17:07,160
बताते हैं। 
इंसान की बनावट ही ऐसी है कि 

227
00:17:07,160 --> 00:17:16,480
उसमें दोगलापन होना आम बात है। 
भले ही आपको लगता हो कि आप एक ही 

228
00:17:16,480 --> 00:17:21,640
इंसान हैं और सब कुछ आपके कंट्रोल
में है, लेकिन सच ये है कि आपके 

229
00:17:21,640 --> 00:17:28,000
अंदर बहुत सारे आप बसते हैं। 
ये सब मिलकर काम तो करते हैं पर 

230
00:17:28,000 --> 00:17:30,120
अक्सर एक दूसरे की बात नहीं 
मानते। 

231
00:17:30,640 --> 00:17:35,160
यही वजह है कि दुनिया में हर कोई 
सिर्फ आपको छोड़कर थोड़ा 

232
00:17:35,240 --> 00:17:42,360
हिपोक्रिट नजर आता है। 
मशीनों में अगर हम कुछ आदतें डाल 

233
00:17:42,360 --> 00:17:45,920
दें कुछ इंस्टिंक्ट। 
तो वे और भी समझदार लगने लगती 

234
00:17:45,920 --> 00:17:49,400
हैं। 
इंसान भी एक तरह की नेचुरल मशीन 

235
00:17:49,400 --> 00:17:53,640
ही है। 
जैसे जैसे एवोल्यूशन हुआ हमारे 

236
00:17:53,640 --> 00:17:56,280
अंदर छोटे छोटे कई हिस्से जुड़ते 
गए। 

237
00:17:57,400 --> 00:18:02,320
इससे हम समझदार तो बन गए पर हमारे
अंदर ही अंदर झगड़े भी शुरू हो 

238
00:18:02,320 --> 00:18:06,560
गए। 
एक बहुत ही दिलचस्प किताब है 

239
00:18:06,600 --> 00:18:08,840
जिसमें सोचने वाली मशीनों का 
जिक्र है। 

240
00:18:08,920 --> 00:18:14,280
मान लीजिए आपके पास माचिस के 
डिब्बी के बराबर एक छोटी खिलौना 

241
00:18:14,280 --> 00:18:17,600
कार है। 
इसके आगे एक सेंसर लगा है जो 

242
00:18:17,600 --> 00:18:21,520
गर्मी को पहचानना है। 
हमने इसे ऐसे बनाया है। 

243
00:18:21,600 --> 00:18:25,600
कि जितनी ज्यादा गर्मी होगी, इसके
पहले उतने ही तेजी से उलटे 

244
00:18:25,600 --> 00:18:30,920
घूमेंगे। 
अगर आप इस कार को देखे तो आप 

245
00:18:30,920 --> 00:18:33,240
कहेंगे कि इसे गर्मी पसंद नहीं 
है। 

246
00:18:33,360 --> 00:18:37,560
आप सोचिए अगर हम इसमें और भी 
सेंसर लगा दे, एक लाइट के लिए एक 

247
00:18:37,560 --> 00:18:44,280
हिट के लिए एक फुड के लिए एक। 
ऑक्सीजन के लिए अविष्कार की अपनी 

248
00:18:44,280 --> 00:18:48,280
पसंद ना पसंद होगी। 
हो सकता है इसे खाना तो पसंद हो 

249
00:18:48,400 --> 00:18:52,640
पर गर्मी से नफरत हो। 
अगर खाना बहुत गर्म हो तो कार 

250
00:18:52,640 --> 00:18:56,360
कॅफ्यूज हो जाएगी। 
उसका एक हिस्सा उसे खाने की तरफ 

251
00:18:56,400 --> 00:19:02,480
खींचेगा और दूसरा हिस्सा उसे 
गर्मी से दूर भगाएगा यही हमारे 

252
00:19:02,520 --> 00:19:09,080
दिमाग के साथ भी होता है। 
जब मैं मॉड्यूल कहता हूँ तो मेरा 

253
00:19:09,080 --> 00:19:11,280
मतलब किसी इंट या ब्लॉक से नहीं 
है। 

254
00:19:11,520 --> 00:19:16,760
ये एक छोटे कंप्यूटर प्रोग्राम 
जैसा है जिसका एक खास काम होता 

255
00:19:16,760 --> 00:19:20,200
है। 
जैसे आपके फ़ोन में अलग अलग काम 

256
00:19:20,200 --> 00:19:25,160
के लिए अलग अलग एप्प्स होते हैं, 
एक फोटो खींचने के लिए एक मैसेज 

257
00:19:25,160 --> 00:19:29,600
भेजने के लिए वैसे ही दिमाग में 
भी अलग अलग एप्प्स या मॉड्यूल 

258
00:19:29,600 --> 00:19:34,800
होते हैं एक मॉड्यूल का काम है 
खतरा देखना दूसरे का काम है दोस्त

259
00:19:34,800 --> 00:19:38,200
बनाना और तीसरे का काम है खाना 
ढूंढना। 

260
00:19:39,560 --> 00:19:44,440
जब हम बहुत सारे छोटे, छोटे और कम
समझदार ऐप्स को एक साथ जोड़ देते 

261
00:19:44,440 --> 00:19:51,680
हैं तो एक बड़ी और बहुत स्मार्ट 
मशीन बन जाती है क्योंकि हमारे 

262
00:19:51,680 --> 00:19:57,120
अंदर बहुत सारे मॉड्यूल हैं इसलिए
उनमें झगड़ा होना पक्का है। 

263
00:19:57,200 --> 00:20:01,440
जैसे वो खिलौना का उसे खाना चाहिए
पर गर्मी नहीं चाहिए। 

264
00:20:01,680 --> 00:20:04,120
अगर खाना गर्म है तो वो क्या 
करेगी? 

265
00:20:05,720 --> 00:20:07,960
यहाँ दो तरीके हो सकते। 
हैं। 

266
00:20:09,240 --> 00:20:13,960
दोनों मॉड्यूल ज़ोर लगाएं और जो 
ज्यादा ताकतवर होगा कार उस तरफ 

267
00:20:13,960 --> 00:20:18,040
जाएगी। 
एक नया कनेक्शन बनाया जाए जो कहे 

268
00:20:18,040 --> 00:20:22,080
कि अगर खाना दिख जाए तो गर्मी 
वाले डर को कुछ देर के लिए भूल 

269
00:20:22,080 --> 00:20:27,200
जाओ। 
पर जैसे जैसे दिमाग बड़ा होता 

270
00:20:27,200 --> 00:20:30,720
गया, इतने सारे कनेक्शन बनाना 
मुश्किल होता गया। 

271
00:20:31,280 --> 00:20:33,960
इसलिए अक्सर हमारे दिमाग के 
हिस्से आपस में बस। 

272
00:20:34,360 --> 00:20:38,800
लड़ कर फैसला करते हैं। 
हमारा दिमाग आज की दुनिया के 

273
00:20:38,800 --> 00:20:43,280
हिसाब से नहीं बना है। 
इसे हजारों साल पहले के जंगलों और

274
00:20:43,280 --> 00:20:46,040
गुफाओं वाले माहौल के हिसाब से 
बनाया गया। 

275
00:20:47,080 --> 00:20:52,480
नहीं सर बहुत धीरे धीरे बदलती है 
हमारे पूर्वजों को जो मुश्किलें 

276
00:20:52,480 --> 00:20:55,920
आती थीं। 
हमारा दिमाग भी आज भी उन्हीं को 

277
00:20:55,920 --> 00:21:02,800
सुलझाने के लिए तैयार है। 
मछली के दिमाग में एक मॉड्यूल है।

278
00:21:04,000 --> 00:21:06,360
जो भी चीज़ पानी में हिले उसे खा 
लो। 

279
00:21:07,160 --> 00:21:09,480
शिकारी इसी बात का फायदा उठाते 
हैं। 

280
00:21:09,800 --> 00:21:14,160
वे कांटे में कीड़ा फंसाते हैं। 
मछली का पुराना मॉडल उसे खाने को 

281
00:21:14,160 --> 00:21:16,360
कहता है और वो फंस जाती। 
है। 

282
00:21:18,200 --> 00:21:22,280
पुराने समय में मीठा फल मिलना 
बहुत बड़ी बात थी क्योंकि उसमें 

283
00:21:22,280 --> 00:21:27,680
कैलोरीज उसमें ताकत होती थी इसलिए
हमारा दिमाग मीठा देखते ही पागल 

284
00:21:27,680 --> 00:21:30,880
हो जाता है। 
आज हमारे पास मिठाई और कोल्ड 

285
00:21:30,880 --> 00:21:36,080
ड्रिंक की कमी नहीं है, पर दिमाग 
का वो पुराना ऍप आज भी कहता है बस

286
00:21:36,080 --> 00:21:39,440
खाते जाओ। 
इसी वजह से आज लोग बीमार पड़ रहे 

287
00:21:39,440 --> 00:21:43,400
हैं। 
भले ही दुनिया बदल गई है पर जमीन 

288
00:21:43,400 --> 00:21:48,120
और नेचर के कुछ नियम नहीं बदले। 
जैसे ग्रेविटी आज भी वैसे ही काम 

289
00:21:48,120 --> 00:21:51,200
करती है। 
हम आज भी बीमार पड़ते हैं। 

290
00:21:51,440 --> 00:21:54,920
हमारे आज भी दोस्त और दुश्मन होते
हैं। 

291
00:21:58,280 --> 00:22:03,720
इंसान और बाकी जो जंतु असल में 
नेचर की बनाई हुई मशीनें हैं पर 

292
00:22:03,720 --> 00:22:07,040
हमारी मशीनों और नेचर की मशीनों 
में एक फर्क है। 

293
00:22:07,960 --> 00:22:12,080
हम मशीनें अपने फायदे के लिए 
बनाते हैं, लेकिन नेचर ने हमें 

294
00:22:12,080 --> 00:22:16,040
सिर्फ एक मकसद एक गोल्ड के लिए 
बनाया है। 

295
00:22:16,480 --> 00:22:22,120
रिप्रोडक्शन अपनी नसल को आगे 
बढ़ाने के लिए हजारों सालों से 

296
00:22:22,120 --> 00:22:28,760
नेचर ने हमें इस तरह तराशा है। 
ये हमारे शरीर का हर हिस्सा बन 

297
00:22:28,760 --> 00:22:33,640
गया है। 
मेरे पास एक पत्ती वाला कीड़ा है।

298
00:22:33,680 --> 00:22:38,120
इसे देखकर कोई भी धोखा खा जाए। 
ये असली पत्ती है या कीड़ा है? 

299
00:22:38,640 --> 00:22:41,640
नेचर ने इसे ऐसा रंग और डिज़ैन 
दिया है। 

300
00:22:41,880 --> 00:22:45,000
ये बिलकुल एक स्टडी हुई पत्ती 
जैसा दिखता है। 

301
00:22:46,840 --> 00:22:51,240
इसकी ऐसी बनावट इस बात का सबूत है
कि इसका काम क्या है? 

302
00:22:51,840 --> 00:22:57,520
इसका काम है दुश्मनों से छिपना 
जैसे हमारी आँखें देखने के लिए 

303
00:22:57,520 --> 00:23:01,560
बनी हैं, वैसे ही इस कीड़े का 
शरीर छिपने के लिए बना है। 

304
00:23:02,080 --> 00:23:05,800
हमारा दिमाग भी इसी तरह। 
काम के हिसाब से बना है। 

305
00:23:07,520 --> 00:23:12,440
इंजीनियरिंग का एक पक्का नियम है 
जो मशीन एक ही काम करती है वो उस 

306
00:23:12,440 --> 00:23:15,640
काम को सबसे बेहतर तरीके से करती 
है। 

307
00:23:16,280 --> 00:23:20,720
एग्ज़ैम्पल के तौर पर एक टोस्टर 
को ले लीजिए टोस्टर में ब्रेड के 

308
00:23:20,720 --> 00:23:24,560
लिए खास जगह होती है? 
गर्म करने के लिए तार होते हैं और

309
00:23:24,560 --> 00:23:28,520
एक टाइमर होता है। 
इसे देखकर आप तुरंत समझ जाएंगे कि

310
00:23:28,520 --> 00:23:33,720
ये ब्रेड सेकने के लिए बना है। 
मगर आप चाहे तो टोस्टर को कागज़ 

311
00:23:33,720 --> 00:23:38,440
दबाने के लिए या शीशे की तरह भी 
इस्तेमाल कर सकते हैं, पर वो इन 

312
00:23:38,440 --> 00:23:42,000
कामों में बहुत बेकार साबित होगा।
टोस्टर सिर्फ। 

313
00:23:42,400 --> 00:23:46,160
टोस्ट बनाने में एक्स्पर्ट है 
क्योंकि वो उसी के लिए बनाया गया 

314
00:23:46,160 --> 00:23:49,400
है। 
हमारा दिमाग भी ऐसे ही टोस्टर 

315
00:23:49,400 --> 00:23:53,000
जैसे बहुत सारे छोटे छोटे हिस्सों
से बना है। 

316
00:23:54,520 --> 00:23:56,760
कंप्यूटर की दुनिया में भी यही 
होता है। 

317
00:23:57,240 --> 00:24:01,280
सॉफ्टवेयर बनाने वाले जानते हैं 
कि एक ही बड़ा प्रोग्राम बनाने से

318
00:24:01,280 --> 00:24:04,120
अच्छा है। 
कि छोटे छोटे बहुत सारे मॉडल्स 

319
00:24:04,120 --> 00:24:08,800
बनाए जाए। 
ढेर सारे प्रोग्राम इसका सबसे 

320
00:24:08,800 --> 00:24:12,400
अच्छा एग्ज़ैम्पल है। 
आई फ़ोन आई फ़ोन इतना काम का 

321
00:24:12,400 --> 00:24:14,960
क्यों है? 
क्योंकि इसमें हर काम के लिए एक 

322
00:24:15,040 --> 00:24:19,160
अलग ऍप है। 
मौसम देखने के लिए अलग ऍप मैप्स 

323
00:24:19,160 --> 00:24:24,440
के लिए अलग ऍप टॉर्च के लिए अलग 
ऍप अगर आप इन सबको मिलाकर एक ही 

324
00:24:24,440 --> 00:24:28,200
ऐप बना देते तो वो बहुत धीमा और 
बेकार होता। 

325
00:24:29,000 --> 00:24:31,360
हमारा दिमाग भी बिल्कुल फ़ोन जैसा
है। 

326
00:24:31,360 --> 00:24:36,320
इसमें हजारों छोटे छोटे दिमागी 
एप्प्स है या मॉडल्स है? 

327
00:24:37,880 --> 00:24:40,640
कोई ऐप हमें लैंगुएज सीखाता है 
कोई ऐप हमें? 

328
00:24:40,760 --> 00:24:45,360
दोस्त बनाने में मदद करता है और 
कोई ऐप हमें खतरे से बचाता है। 

329
00:24:45,840 --> 00:24:50,800
इन हजारों स्पेशलाइज़्ड ऐप्स की 
वजह से ही हम इंसान इतने समझदार 

330
00:24:50,800 --> 00:24:56,200
बन पाए हैं। 
कुल मिलाकर बात ये है कि अगर आप 

331
00:24:56,200 --> 00:24:58,560
किसी एक काम में स्पेशलाइज़्ड बन 
जाते। 

332
00:24:58,560 --> 00:25:01,400
हैं। 
तो आप उस काम को ज्यादा अच्छे से 

333
00:25:01,560 --> 00:25:06,080
और तेजी से कर पाते हैं। 
नेचर भी इसी नियम पर चलती है। 

334
00:25:06,640 --> 00:25:11,800
इसीलिए हमारे शरीर और दिमाग के 
हिस्से अलग अलग कामों के लिए बंटे

335
00:25:11,800 --> 00:25:17,000
हुए हैं। 
चिड़ियों को ही देख लीजिए, गलपगोस

336
00:25:17,120 --> 00:25:19,800
आइलैंड पर। 
अलग अलग तरह की चिड़िया मिलती 

337
00:25:19,800 --> 00:25:22,960
हैं। 
किसी की चोंच सख्त बीज तोड़ने के 

338
00:25:22,960 --> 00:25:28,200
लिए है, तो किसी के कीड़े पकड़ने 
के लिए जिसकी जैसी जरूरत वैसे 

339
00:25:28,200 --> 00:25:32,160
उसकी चोंच जानवरों की दुनिया में 
भी। 

340
00:25:32,160 --> 00:25:38,080
यही होता है मकड़ियां इनके। 
नन्हे से दिमाग में जला बुनने का 

341
00:25:38,080 --> 00:25:44,200
एक खास प्रोग्राम फिट होता है। 
चमगादड़ ये आवाज की मदद से अंधेरे

342
00:25:44,200 --> 00:25:49,600
में भी शिकार ढूंढ लेते हैं। 
मधुमक्खियां ये नाचकर अपनी 

343
00:25:49,600 --> 00:25:52,320
सहेलियों को बताती हैं कि खाना 
कहाँ है? 

344
00:25:53,880 --> 00:25:56,560
यही बात हमारे शरीर पर भी लागू 
होती है। 

345
00:25:57,160 --> 00:26:02,000
हमारा दिल खून को पंप करने में 
एक्स्पर्ट है पर वो खून को साफ 

346
00:26:02,000 --> 00:26:06,000
नहीं कर सकता। 
खून साफ करने का काम लिवर और 

347
00:26:06,040 --> 00:26:07,040
किडनीस का। 
है। 

348
00:26:07,880 --> 00:26:12,160
हर ऑर्गन, हर अंग अपना अपना काम 
बखूबी जानता है। 

349
00:26:13,200 --> 00:26:17,640
यहाँ तक कि पैसे का मामला समझने 
वाले भी यही कहते हैं कि हर देश 

350
00:26:17,640 --> 00:26:21,640
को वही चीज़ बनानी चाहिए जिसमें 
वो सबसे अच्छा है। 

351
00:26:22,080 --> 00:26:25,880
इसे काम का बंटवारा या डिवीज़न ऑफ
लेबर कहते। 

352
00:26:25,880 --> 00:26:30,080
हैं। 
हमारी आँखें भी इसी तरह काम करती 

353
00:26:30,080 --> 00:26:33,200
हैं। 
आँखों का सिस्टम सिर्फ देखने के 

354
00:26:33,200 --> 00:26:36,360
लिए माना है। 
इसमें भी अलग अलग हिस्से हैं। 

355
00:26:36,680 --> 00:26:41,800
कोई हिस्सा सिर्फ कोनों को 
पहचानना है तो कोई रंगों को यही 

356
00:26:41,800 --> 00:26:45,520
लॉजिक हमारे दूसरों के साथ बर्ताव
पर भी लागू होता है। 

357
00:26:45,920 --> 00:26:50,600
दोस्त चुनना, जीवन साथी ढूंढना या
दूसरों की बुराइ करना। 

358
00:26:51,320 --> 00:26:55,960
इन सबके लिए दिमाग में अलग अलग 
हिस्से या ऐप्स बने हुए हैं। 

359
00:26:57,400 --> 00:27:02,560
अक्सर चीजों पर लिखा होता है जनरल
पर्पस यानी हर काम में आने वाली। 

360
00:27:03,040 --> 00:27:08,040
पर सच तो ये है कि ऐसी कोई चीज़ 
नहीं होती जो सब कुछ कर सके। 

361
00:27:08,720 --> 00:27:12,000
गूगल भी सिर्फ। 
जानकारी सर्च करने के लिए 

362
00:27:12,000 --> 00:27:15,000
स्पेशलाइज़्ड है। 
आपका इम्युन सिस्टम सिर्फ 

363
00:27:15,000 --> 00:27:21,200
बीमारियों से लड़ने के लिए जैसे 
एक टोस्टर सिर्फ ब्रेड सेकने के 

364
00:27:21,200 --> 00:27:25,960
लिए बना है, भले ही उसमें आप कोई 
और चीज़ भी गर्म कर ले पर वो बना 

365
00:27:25,960 --> 00:27:29,880
तो ब्रेड के लिए ही है। 
एथलीट। 

366
00:27:30,040 --> 00:27:32,760
ऑस्कर पिस्टोरियस की एग्ज़ैम्पल 
लीजिए। 

367
00:27:33,320 --> 00:27:38,080
उनके दोनों पैर नहीं थे इसलिए वे 
नकली पैरों का इस्तेमाल करते थे। 

368
00:27:38,400 --> 00:27:43,080
मज़े की बात ये है कि उनके पास 
भागने के लिए अलग पैर थे और चलने 

369
00:27:43,080 --> 00:27:47,160
के लिए अलग। 
जो पैर उन्हें तेजी से भगाते थे 

370
00:27:47,320 --> 00:27:51,960
उनसे वो ठीक से चल नहीं पाते थे। 
हमारा दिमाग भी ऐसा ही है। 

371
00:27:52,320 --> 00:27:55,360
वो बहुत सारी खास चीजों का एक 
बंडल है। 

372
00:27:56,880 --> 00:28:02,040
दिमाग के ये अलग अलग हिस्से ये 
अलग अलग मॉड्यूल्स हमेशा एक दूसरे

373
00:28:02,040 --> 00:28:06,400
से बात नहीं करते कभी कभी इनके 
बीच एक दीवार होती। 

374
00:28:06,400 --> 00:28:10,640
है। 
दिमाग के एक हिस्से को कुछ पता हो

375
00:28:10,640 --> 00:28:13,320
सकता है जो दूसरे हिस्सों को नहीं
पता। 

376
00:28:13,880 --> 00:28:17,840
इसी वजह से हमारे अंदर इतनी सारी 
उलटी पुलटी बातें यानी 

377
00:28:18,000 --> 00:28:22,440
कॉन्ट्रेडिक्शन्स चलती रहती हैं। 
कभी कभी तो दिमाग जानबूझकर कुछ 

378
00:28:22,440 --> 00:28:27,680
जानकारी छिपा लेता है क्योंकि कम 
जान नहीं हमारे लिए फायदेमंद होता

379
00:28:27,680 --> 00:28:34,400
है। 
डिज़्नीवर्ल्ड में एक बहुत मजेदार

380
00:28:34,400 --> 00:28:38,120
शो हुआ करता था, जिसका नाम था 
क्रेनियम कमांड। 

381
00:28:38,960 --> 00:28:41,600
इसमें एक बहुत ही इंटरेस्टिंग 
कहानी दिखाई गई थी। 

382
00:28:42,320 --> 00:28:46,920
कहानी ये थी कि हर इंसान के दिमाग
के अंदर एक छोटा सा पायलट बैठा 

383
00:28:46,920 --> 00:28:50,040
होता है। 
जोश इंसान को चलाता है। 

384
00:28:50,600 --> 00:28:56,840
इस शो में बजी नाम का एक छोटा सा 
रोबोट 112 साल के लड़के बॉबी के 

385
00:28:56,840 --> 00:29:01,760
दिमाग को कंट्रोल करता है। 
बजी के पास बहुत सारे बटन और 

386
00:29:01,760 --> 00:29:05,680
स्क्रीन है। 
उसे दिल, पेट और दिमाग के अलग अलग

387
00:29:05,680 --> 00:29:10,800
हिस्सों से खबरें मिलती रहती हैं।
जैसे ही बजी कोई बटन दबाता है। 

388
00:29:11,040 --> 00:29:16,960
बॉबी वैसे ही काम करने लगता है। 
ये शो देखने में तो बहुत मजेदार 

389
00:29:16,960 --> 00:29:20,200
है पर असीयत में हमारा दिमाग ऐसे 
काम नहीं करता। 

390
00:29:20,280 --> 00:29:24,120
क्यों? 
ज़रा सोचिये अगर बजी बॉबी को चला 

391
00:29:24,120 --> 00:29:29,120
रहा है तो बजी को कौन चला रहा है?
क्या बजी के दिमाग के अंदर भी कोई

392
00:29:29,240 --> 00:29:32,760
उससे भी छोटा पायलट बैठा है और उस
छोटे पायलट। 

393
00:29:32,760 --> 00:29:37,360
के अंदर कौन है ये बात कभी खत्म 
ही नहीं होगी। 

394
00:29:37,840 --> 00:29:44,160
सच तो ये है कि दिमाग के अंदर कोई
छोटा आदमी या बॉस नहीं बैठा होता।

395
00:29:44,280 --> 00:29:48,960
हमारा दिमाग बहुत सारे छोटे छोटे 
टुकड़ों से मिलकर बना है और यही 

396
00:29:48,960 --> 00:29:52,120
टुकड़े मिलकर हमें समझदार बनाते। 
हैं। 

397
00:29:53,680 --> 00:29:58,480
जैसा कि हमने पहले बात की थी, 
दिमाग बहुत सारे हिस्सों से बना 

398
00:29:58,480 --> 00:30:01,600
है। 
बहुत सारे मॉड्यूल्स से हर हिस्से

399
00:30:01,600 --> 00:30:07,760
का अपना एक खास फंक्शन होता है। 
ये खास काम इसे आप अपने फ़ोन के 

400
00:30:07,760 --> 00:30:12,040
ऐप्स की तरह समझिए। 
अगर आप अपने फ़ोन में एक छेद कर 

401
00:30:12,040 --> 00:30:16,480
दें तो आप किसी एक खास ऐप को बाहर
नहीं निकाल सकते क्योंकि वे 

402
00:30:16,480 --> 00:30:21,160
सॉफ्टवेयर हैं, वैसे ही दिमाग के 
मॉड्यूल्स, दिमाग के हिस्से भी 

403
00:30:21,440 --> 00:30:26,560
पूरे दिमाग में फैले हो सकते हैं।
पर उनका काम तय होता है। 

404
00:30:28,520 --> 00:30:32,560
शो में बॉबी को पता ही नहीं चलता 
कि बजी उसके लिए डिसीजन ले रहा 

405
00:30:32,560 --> 00:30:35,480
है। 
हमारे साथ भी बिल्कुल ऐसा ही होता

406
00:30:35,480 --> 00:30:38,080
है। 
हमारे दिमाग के बहुत सारे हिस्से 

407
00:30:38,080 --> 00:30:41,640
ऐसे काम करते हैं जिनकी हमें भनक 
तक नहीं लगती। 

408
00:30:42,800 --> 00:30:47,040
जैसे जब आप किसी से बात करते हैं 
तो आपका बोलने वाला हिस्सा शब्द 

409
00:30:47,080 --> 00:30:52,520
चुनता है पर उसे ये नहीं पता होता
कि दिमाग के दूसरे हिस्सों ने वो 

410
00:30:52,520 --> 00:30:56,360
बात क्यों चुनी। 
एक बहुत ही फेमस एक्स्पेरमेन्ट 

411
00:30:56,360 --> 00:30:59,280
हुई थी। 
इसमें वैज्ञानिक ने देखा कि जब 

412
00:30:59,280 --> 00:31:02,600
कोई इंसान अपना हाथ हिलाने का 
फैसला लेता है। 

413
00:31:02,720 --> 00:31:07,560
तो उसके दिमाग में हलचल यानी 
ब्रेन अक्टिविटीज फैसले का महसूस 

414
00:31:07,560 --> 00:31:11,760
होने से पहले ही शुरू हो जाती है।
इसका मतलब क्या है? 

415
00:31:12,840 --> 00:31:17,200
इसका मतलब ये है कि आपके दिमाग के
किसी हिस्से ने हाथ हिलाने का 

416
00:31:17,200 --> 00:31:21,840
फैसला पहले ही ले लिया था और आपको
उसका पत्थर। 

417
00:31:22,080 --> 00:31:26,320
थोड़ी देर बाद चला। 
आपको लगा कि मैंने अभी फैसला लिया

418
00:31:26,480 --> 00:31:33,000
पर सच ये है कि काम पहले ही शुरू 
हो चुका था तो फिर मैं कौन हूँ? 

419
00:31:34,400 --> 00:31:38,840
अगर दिमाग में हजारों छोटे छोटे 
हिस्से हैं, हजारों छोटे छोटे 

420
00:31:38,840 --> 00:31:41,840
मॉडल्स हैं। 
और वे अपना अपना काम कर रहे हैं 

421
00:31:41,840 --> 00:31:49,280
तो फिर मैं यानी ये सेल्फ कौन है?
अक्सर हमें लगता है कि जो हिस्सा 

422
00:31:49,280 --> 00:31:53,400
बोल रहा है वही मैं हूँ। 
हमें लगता है कि हम ही सब कुछ 

423
00:31:53,400 --> 00:31:57,640
कंट्रोल कर रहे हैं पर ये बस एक 
एहसास है। 

424
00:31:57,720 --> 00:32:02,280
सच तो ये है कि दिमाग के हजारों 
हिस्सों में से किसी एक को मैं 

425
00:32:02,280 --> 00:32:07,640
कहना गलत होगा। 
दिमाग में कोई एक खास बॉस नहीं 

426
00:32:07,640 --> 00:32:11,080
है। 
वहाँ बस बहुत सारे छोटे छोटे 

427
00:32:11,080 --> 00:32:14,480
समझदार पुर्जे हैं जो मिलजुल कर 
काम कर रहे। 

428
00:32:14,480 --> 00:32:18,640
हैं। 
दिमाग का एक हिस्सा प्रेस 

429
00:32:18,640 --> 00:32:22,920
सेक्रेटरी की तरह काम करता है। 
इसका काम है दुनिया को यह बताना 

430
00:32:22,920 --> 00:32:27,560
कि आप कितने सही हैं और इसके लिए 
वह अक्सर चालाकी का सहारा लेता 

431
00:32:27,560 --> 00:32:32,360
है। 
एक फेमस टीवी शो दी वेस्ट विंग 

432
00:32:32,360 --> 00:32:34,440
था। 
इसमें अमेरिका के राष्ट्रपति को 

433
00:32:34,440 --> 00:32:38,280
एक बड़ी बिमारी थी। 
पर उन्होंने यह बात जनता से छिपा 

434
00:32:38,280 --> 00:32:42,760
कर रखी थी। 
उनकी प्रेस सेक्रेटरी सी जे क्रेग

435
00:32:42,760 --> 00:32:45,040
को भी इस बारे में कुछ नहीं पता 
था। 

436
00:32:45,560 --> 00:32:49,200
सी जे ने राष्ट्रपति से बहुत 
चालाकी से पूछा था, क्या कोई ऐसी 

437
00:32:49,200 --> 00:32:53,800
बात है जो मुझे जाननी चाहिए? 
राष्ट्रपति ने कहा, नहीं, यह एक 

438
00:32:53,800 --> 00:32:58,520
बड़ा पिच है। 
सीजे ने जानबूझकर राष्ट्रपति से 

439
00:32:58,520 --> 00:33:02,720
यह नहीं पूछा कि क्या ऐसी कोई बात
है जो मुझे पता होनी चाहिए 

440
00:33:03,440 --> 00:33:07,240
क्योंकि अगर वह ऐसा पूछती और 
राष्ट्रपति सच बोल देते तो सीजे 

441
00:33:07,240 --> 00:33:11,240
को जनता को सच बताना। 
पड़ता पर क्योंकि वह अनजान बनी 

442
00:33:11,240 --> 00:33:15,560
रही, इसलिए वह पूरी ईमानदारी। 
और भरोसे के साथ मीडिया के सामने 

443
00:33:15,560 --> 00:33:21,760
कह सके कि राष्ट्रपति बिल्कुल 
हेल्ती है तो इस कहानी से क्या 

444
00:33:21,760 --> 00:33:25,120
पता चलता है? 
कभी कभी कम जानना ही आपके लिए 

445
00:33:25,120 --> 00:33:28,920
सबसे अच्छा होता है। 
अगर आपको सच नहीं पता तो आप बिना 

446
00:33:28,920 --> 00:33:32,560
झूठ बोले दूसरों को यकीन दिला 
सकते हैं कि सब ठीक है। 

447
00:33:34,120 --> 00:33:38,200
प्रेस सेक्रेटरी का काम सिर्फ 
खबरें देना नहीं होता, उसका असली 

448
00:33:38,200 --> 00:33:42,480
काम है बातों को घूमा, फिरा कर इस
तरह पेश करना कि सरकार अच्छी 

449
00:33:42,480 --> 00:33:50,280
दिखे, जैसे किसी हार को नई 
स्ट्रैटेजिक है ना हमारे दिमाग का

450
00:33:50,280 --> 00:33:54,680
एक हिस्सा भी बिल्कुल ऐसा ही है। 
वह दुनिया को वही बातें बताता है 

451
00:33:54,680 --> 00:33:59,520
जिससे हमारी इज्जत बनी रहे। 
इसे कार वाले खेल से समझिए। 

452
00:34:01,160 --> 00:34:05,880
दो कारें तेजी से एक दूसरे की तरफ
आ रही हैं जो पहले मुड़ेगा वो हार

453
00:34:05,880 --> 00:34:10,440
जाएगा अगर आप अपने स्टीयरिंग 
व्हील खिड़की से बाहर फेंक दे और 

454
00:34:10,440 --> 00:34:14,600
सामने वाला ड्राइवर ये देख ले। 
तो उसे मुड़ना ही पड़ेगा क्योंकि 

455
00:34:14,600 --> 00:34:17,080
वो जानता है कि अब आप के हाथ में।
कुछ नहीं है। 

456
00:34:18,440 --> 00:34:22,159
लेकिन अगर सामने वाला ड्राइवर 
अपनी आँखों पर पट्टी बांध ले तो 

457
00:34:22,159 --> 00:34:29,080
आपकी सारी छलाकी फैल हो जाएगी। 
यह अंधापन, ये अनजान बनना एक बड़ी

458
00:34:29,080 --> 00:34:35,040
ताकत है। 
हम सबको लगता है कि हम अपने दिमाग

459
00:34:35,040 --> 00:34:38,800
के मालिक हैं, पर सच तो ये है कि 
हम सिर्फ अपने दिमाग के 

460
00:34:38,800 --> 00:34:43,679
प्रीसेक्रेटरी या खबरें हैं। 
हमारा काम भी समाज के सामने अपने 

461
00:34:43,840 --> 00:34:49,760
दिमाग की सफाई पेश करना है। 
जैसे किसी कंपनी का पीआर यानी 

462
00:34:49,760 --> 00:34:55,159
पब्लिक रिलेशन्स ऑफिसर सिर्फ वही 
बोलता है जो उसे बताया जाता है, 

463
00:34:55,719 --> 00:34:59,120
वैसे ही आप भी सिर्फ अपने दिमाग 
के एक छोटे से हिस्से का 

464
00:34:59,120 --> 00:35:04,000
रिप्रजेंटेशन कर रहे हैं। 
आपको खुद नहीं पता कि आपके दिमाग 

465
00:35:04,000 --> 00:35:06,280
के बाकी हिस्से क्या खिचड़ी पका 
रहे हैं? 

466
00:35:08,160 --> 00:35:11,280
दिमाग के हिस्से एक दूसरे से बात 
क्यों नहीं कर पाते? 

467
00:35:11,720 --> 00:35:17,560
इसे कंप्यूटर की फाइलें से समझिए।
जैसे एक फोटो डॉट जेपीजी को आप 

468
00:35:17,720 --> 00:35:22,840
गाना बजाने वाले ऐप में नहीं खोल 
सकते, वैसे ही दिमाग का देखने 

469
00:35:22,840 --> 00:35:25,840
वाला हिस्सा। 
अपनी जानकारी को ऐसे तरीके में 

470
00:35:25,840 --> 00:35:29,520
रखता है जिसे बोलने वाला हिस्सा 
नहीं पढ़ पाता। 

471
00:35:29,840 --> 00:35:34,400
इसीलिए आपके अंदर हजारों 
कॉन्ट्रेडिक्शन्स हजारों उलटी 

472
00:35:34,400 --> 00:35:39,920
पुलटी बातें एक साथ रह सकती हैं 
और आपको उनका पता भी नहीं चलता। 

473
00:35:42,800 --> 00:35:46,560
दिमाग के अंदर बहुत सारी उलटी 
पुलटी बातें चलती रहती हैं। 

474
00:35:46,560 --> 00:35:49,960
पर क्या ये कोई बहुत बड़ी चिंता 
की बात है? 

475
00:35:50,520 --> 00:35:54,760
क्या इस बात से फर्क पड़ता है की 
हम ये नहीं बता पाते की हमें कुछ 

476
00:35:54,760 --> 00:35:58,320
चीजें गलत क्यों लगती हैं? 
शायद हाँ। 

477
00:35:59,520 --> 00:36:03,920
दिमाग के इन अलग अलग हिस्सों को 
समझने से हमारी सोच बदल जाती है। 

478
00:36:04,360 --> 00:36:08,640
अब हमें ये नहीं सोचना चाहिए कि 
हमारे दिमाग का कोई एक बॉस है। 

479
00:36:08,640 --> 00:36:13,440
इसके बजाय हमें ये समझना चाहिए कि
अलग अलग समय पर दिमाग के अलग अलग 

480
00:36:13,440 --> 00:36:17,240
हिस्से राज़ करते हैं। 
हम उस वक्त क्या करेंगे? 

481
00:36:17,360 --> 00:36:24,240
ये इस बात पर डिपेंड करता है कि 
हम किस हालत में हैं, जैसे जंगल 

482
00:36:24,240 --> 00:36:28,520
में भालू को देखकर हमारे अंदर 
बचने वाला हिस्सा तुरंत चालू हो 

483
00:36:28,520 --> 00:36:32,840
जाता है और हमें वहाँ से भागने पर
मजबूर कर देता है। 

484
00:36:33,520 --> 00:36:37,800
हमारे दिमाती हिस्से जरूरत के 
हिसाब से चालू और बंद होते रहते 

485
00:36:37,800 --> 00:36:42,280
हैं। 
कभी कभी बाहर की छोटी छोटी चीजें 

486
00:36:42,280 --> 00:36:47,200
भी हमारे दिमाग के हिस्सों को जगा
देती हैं और हमें पता तक नहीं 

487
00:36:47,200 --> 00:36:50,920
चलता। 
एक स्टडी में लोगों को पैसे वाला 

488
00:36:50,920 --> 00:36:54,960
एक खेल खिलाया गया। 
उन्हें चुनना था कि वे सेल्फिश 

489
00:36:54,960 --> 00:36:57,640
बनेंगे। 
ये सबके साथ मिलकर चलेंगे। 

490
00:36:58,600 --> 00:37:02,480
जब उन लोगों ने बस एक पल के लिए 
एक दूसरे की आँखों में झाँका तो 

491
00:37:02,480 --> 00:37:05,320
वे दूसरों की मदद करने के लिए 
ज्यादा तैयार हो गए। 

492
00:37:06,400 --> 00:37:10,680
बस एक छोटी सी नजर ने उनके 
मिलजुलकर रहने वाले हिस्से। 

493
00:37:10,760 --> 00:37:13,440
यानी प्रो सोशल मॉड्यूल को जगा 
दिया। 

494
00:37:15,160 --> 00:37:19,280
एक बहुत फेमस एक्स्पेरमेन्ट में 
एक सुंदर लड़की ने कुछ लड़कों से 

495
00:37:19,280 --> 00:37:23,240
बात की। 
पहली हालत में बात एक ऊंची और 

496
00:37:23,240 --> 00:37:28,320
हिलते हुए खतरनाक पुल पर हुई। 
दूसरी हालत में बात एक सेफ और 

497
00:37:28,360 --> 00:37:32,600
मजबूत पुल पर हुई। 
हिलते हुए पुल पर मिलने वाले करीब

498
00:37:32,880 --> 00:37:38,280
50% लड़कों ने बाद में उस लड़की 
को फ़ोन किया जबकि सुरक्षित पुल 

499
00:37:38,280 --> 00:37:43,560
वाले बहुत कम लड़कों ने ऐसा किया 
यहाँ हुआ जी कि पुल के डर से 

500
00:37:43,800 --> 00:37:48,440
लड़कों का दिल तेज धड़का पर उनके 
दिमाग के खिस्से ने उसे प्यार या 

501
00:37:48,520 --> 00:37:52,320
पसंद समझ लिया। 
उनके दिमाग को बेवकूफ बनाना कितना

502
00:37:52,320 --> 00:37:56,120
आसान था? 
दिमाग के हिस्से सिर्फ बाहर की 

503
00:37:56,120 --> 00:37:59,200
चीजों से नहीं बल्कि अंदर की 
चीजों से भी बदलते हैं। 

504
00:37:59,920 --> 00:38:04,840
जब आपको बहुत तेज भूख लगती है तो 
खाना ढोने वाला हिस्सा दिमाग पर 

505
00:38:04,840 --> 00:38:08,640
कब्जा कर लेता है। 
इसीलिए कहते हैं। 

506
00:38:08,800 --> 00:38:12,680
की भूखे पेट बाजार नहीं जाना 
चाहिए, वरना आप ऐसी चीजें खरीद 

507
00:38:12,680 --> 00:38:17,080
लेंगे जिन्हें बाद में आपका दूसरा
हिस्सा पसंद नहीं करेगा। 

508
00:38:19,200 --> 00:38:23,160
18 साल के लड़कों में अक्सर लड़की
ढूंढने वाला हिस्सा ही सबसे 

509
00:38:23,160 --> 00:38:27,280
ज्यादा अक्टिव रहता है। 
वहीं जब कोई नया माता पिता बनता 

510
00:38:27,280 --> 00:38:30,960
है तो उनके अंदर। 
बच्चे का ख्याल रखने वाला हिस्सा 

511
00:38:31,120 --> 00:38:34,960
अचानक जाग जाता है और बाकी सब 
पीछे छूट जाते हैं। 

512
00:38:37,560 --> 00:38:42,760
अब समझते हैं कि डर क्या है? 
असल में डर और कुछ नहीं बल्कि 

513
00:38:42,760 --> 00:38:46,120
दिमाग का एक तरीका है जब आप भालू 
देखते हैं। 

514
00:38:46,200 --> 00:38:50,440
तो डर आपके खाने, पीने या रोमांस 
वाले ऐप्लिकेशंस को बंद कर देता 

515
00:38:50,440 --> 00:38:55,120
है और सिर्फ जान बचाने वाला 
ऐप्लिकेशॅन जान बचाने वाला ऍप को 

516
00:38:55,160 --> 00:39:00,520
चालू कर देता है। 
बहुत से पढ़े लिखे लोग और 

517
00:39:00,760 --> 00:39:04,320
फिलोसोफर्स मानते हैं कि इंसान का
दिमाग एक ही है। 

518
00:39:04,720 --> 00:39:09,160
इस बात से परेशान हो जाते हैं कि 
एक ही इंसान दो अलग बातें कैसे 

519
00:39:09,160 --> 00:39:13,240
सोच सकता है? 
वह कहते हैं, एक आदमी एक ही समय 

520
00:39:13,240 --> 00:39:16,040
पर दो अलग बातें कैसे मान सकता 
है? 

521
00:39:16,680 --> 00:39:19,520
पर सच तो ये है कि इंसान कोई एक 
चीज़ नहीं है। 

522
00:39:19,920 --> 00:39:23,720
आप एक ही समय पर एस वॅन, एस टू और
शायद एस एयठ। 

523
00:39:24,160 --> 00:39:29,240
571 भी हो सकते हैं। 
आपके दिमाग के हजारों हिस्से हो 

524
00:39:29,240 --> 00:39:33,200
सकते हैं और हर हिस्से की अपनी 
अलग बात हो सकती है। 

525
00:39:33,800 --> 00:39:38,160
दिमाग के कोने में लाइनें बराबर 
हो सकती हैं और दूसरे कोने में 

526
00:39:38,280 --> 00:39:43,440
छोटी बड़ी हमारा प्रेस सेक्रेटरी 
यानी बोलने वाला हिस्सा। 

527
00:39:43,560 --> 00:39:48,280
अक्सर सच से अनजान रहता है। 
कभी कभी कम जानना ही उसके लिए 

528
00:39:48,280 --> 00:39:53,040
अच्छा होता है ताकि वह दूसरों को 
पूरे भरोसे के साथ अपनी बात समझा 

529
00:39:53,040 --> 00:39:57,320
सके। 
इसीलिए हमारे अंदर हिपोक्रिसी 

530
00:39:57,400 --> 00:40:01,520
यानी दोगलापन पैदा होता। 
है एक हिस्सा कुछ बोलता है और 

531
00:40:01,520 --> 00:40:04,320
दूसरा हिस्सा। 
कुछ और ही कर रहा होता है। 

532
00:40:07,160 --> 00:40:12,960
अब यकीन के धोखे को देखिये बिलीफ 
के धोखे को मान लीजिये। 

533
00:40:13,720 --> 00:40:18,600
कोई इस बात पर यकीन करता है ये 
कहना गलत है क्योंकि हो सकता है 

534
00:40:18,600 --> 00:40:22,480
कि। 
उसके दिमाग का एक हिस्सा उस बात 

535
00:40:22,480 --> 00:40:27,440
को माने और दूसरा ना माने। 
इसे समझने के लिए एक टेस्ट देखिए 

536
00:40:27,440 --> 00:40:33,160
जिसे आई ए टी कहते हैं। 
इम्प्लिसिट असोसिएशन टेस्ट यह 

537
00:40:33,160 --> 00:40:36,800
लोगों के मन के अंदर छिपे 
स्टीरियोटाइपिंग यानी भेदभाव को 

538
00:40:36,840 --> 00:40:40,560
जांचने के लिए है। 
इस टेस्ट में लोगों को स्क्रीन पर

539
00:40:40,560 --> 00:40:43,000
नाम और अच्छे बुरे शब्द दिखाए 
जाते हैं। 

540
00:40:43,520 --> 00:40:48,680
रिसर्च के आंकड़े बताते हैं कि जब
लोगों को ब्लैक नाम प्लस अच्छे 

541
00:40:48,680 --> 00:40:52,800
शब्द को एक साथ जोड़ना होता है तो
उनका दिमाग थोड़ा स्लो काम करता 

542
00:40:52,800 --> 00:40:55,880
है। 
वहीं व्हाइट नाम और अच्छे शब्द को

543
00:40:55,880 --> 00:41:01,360
जोड़तें वक्त वे तेज होते हैं। 
जब वैज्ञानिक कहते हैं कि इंसान 

544
00:41:01,400 --> 00:41:06,080
खुद को रोकता है तो वे एक बड़े 
बॉस की बात कर रहे होते हैं जो 

545
00:41:06,080 --> 00:41:10,800
अंदर बैठा है पर असल में वहाँ कोई
बॉस नहीं है वहाँ बस एक हिस्सा 

546
00:41:11,080 --> 00:41:16,800
दूसरे हिस्से को दबा रहा होता है 
मैं। 

547
00:41:16,920 --> 00:41:22,000
किसी बात पर बिलीव करता हूँ, मैं 
किसी बात पर यकीन करता हूँ, यह 

548
00:41:22,000 --> 00:41:27,000
कहना बोलचाल में तो ठीक है, पर 
अगर हमें सच में समझना है कि 

549
00:41:27,000 --> 00:41:31,360
हमारा दिमाग कैसे काम करता है तो 
हमें हर मॉड्यूल के बारे में अलग 

550
00:41:31,360 --> 00:41:36,040
से सोचना होगा। 
हमें यह देखना होगा कि बिलीफ या 

551
00:41:36,120 --> 00:41:39,240
यकीन? 
असल में दिमाग के किस डिब्बे, किस

552
00:41:39,240 --> 00:41:45,080
मॉड्यूल या हिस्से के अंदर हैं? 
दिमाग के बारे में गौरजी बात 

553
00:41:45,080 --> 00:41:49,520
सोचिए आपके दिमाग के कुछ हिस्से 
बोलने वाले हिस्से यानी प्रेस 

554
00:41:49,520 --> 00:41:52,440
सेक्रेटरी को खबर भेजते हैं और 
कुछ नहीं भेजते। 

555
00:41:53,360 --> 00:41:57,720
इसका मतलब ये है कि आपके दिमाग के
अंदर बहुत कुछ ऐसा चल रहा है 

556
00:41:57,960 --> 00:42:03,600
जिसके बारे में आपको कभी पता ही 
नहीं चल सकता, जिसे आप कभी यह 

557
00:42:03,600 --> 00:42:08,480
नहीं जान सकते की एक बैट को एक 
चमगादड़ को कैसा महसूस होता है, 

558
00:42:09,080 --> 00:42:13,000
वैसे ही आप यह भी नहीं जान सकते। 
की आपके दिमाग के उन हिस्सों में 

559
00:42:13,000 --> 00:42:15,840
क्या चल रहा है जो आपसे बात नहीं 
करते? 

560
00:42:17,520 --> 00:42:22,080
क्या पता आपके दिमाग के उन खामोश 
हिस्सों को भी सब कुछ महसूस होता 

561
00:42:22,080 --> 00:42:25,680
हो। 
ये सोचना थोड़ा डरावना है की आपके

562
00:42:25,680 --> 00:42:30,320
सिर के अंदर कुछ ऐसे हिस्से हैं 
जो सब देख सुन रहे हैं। 

563
00:42:30,440 --> 00:42:36,680
पर वे किसी को कुछ बता नहीं सकते।
दिमाग के बारे में सबसे अच्छी बात

564
00:42:37,040 --> 00:42:40,280
फेमस वैज्ञानिक मार्टिन मिश्की ने
कही थी। 

565
00:42:41,320 --> 00:42:45,240
उन्होंने कहा था कि दिमाग छोटे 
छोटे एजेंट्स का एक सोसाइटी है। 

566
00:42:45,480 --> 00:42:49,280
एक समाज है हर एजेंट की अपनी छोटी
सी ताकत। 

567
00:42:49,280 --> 00:42:52,240
है। 
कोई जानकारी रखता है, कोई दूसरों 

568
00:42:52,240 --> 00:42:57,000
को काम करने का तरीका सीखाता है 
तो कोई गलत बातें सोचने पर रोक 

569
00:42:57,000 --> 00:43:00,680
लगाता है। 
अकेला कोई भी एजेंट समझदार नहीं 

570
00:43:00,680 --> 00:43:06,000
है, पर जब ये सब मिल जाते हैं तो 
एक बहुत समझदार मशीन एक स्मार्ट 

571
00:43:06,000 --> 00:43:09,600
मशीन बन जाती है। 
कोई एक असली बॉस। 

572
00:43:09,840 --> 00:43:16,880
या मैं जैसी चीज़ असल में होती ही
नहीं है, ज्यादातर लोग और बड़े 

573
00:43:16,880 --> 00:43:21,640
बड़े स्कॉलर्स यही सोचते हैं कि 
हमारा दिमाग सिर्फ इसलिए बना है 

574
00:43:21,640 --> 00:43:26,360
ताकि वह सच को जान सके। 
वे कहते हैं कि अगर हमें सच नहीं 

575
00:43:26,360 --> 00:43:29,200
पता होगा तो हम सही काम कैसे 
करेंगे। 

576
00:43:30,160 --> 00:43:34,440
यह बात सुनने में तो सही लगती है 
पर पूरी तरह सच नहीं है। 

577
00:43:35,280 --> 00:43:37,720
अक्सर सच जानना हमारे लिए नुकसान 
दे। 

578
00:43:37,720 --> 00:43:42,960
यानी डैमेजिंग हो सकता है नेशन ने
हमारा दिमाग सिर्फ स्वच्छ ढूंढने 

579
00:43:42,960 --> 00:43:47,640
के लिए नहीं बल्कि हमें जिंदा 
रखने और अपनी नस्ल को बढ़ाने 

580
00:43:47,640 --> 00:43:51,240
यानी। 
रिप्रोडक्शन के लिए बनाया है और 

581
00:43:51,240 --> 00:43:54,800
इस काम में कभी कभी अनजान रहना ही
सबसे अच्छा होता है। 

582
00:43:56,560 --> 00:44:01,200
सोचिए आप एक दुकान में शैम्पू 
खरीदने गए हैं, वहाँ 50 तरह के 

583
00:44:01,200 --> 00:44:05,440
शैम्पू हैं और सबकी कीमत और 
क्वालिटी लगभग एक जैसी है। 

584
00:44:05,560 --> 00:44:09,680
अगर आप हर एक की गहराई से रिसर्च 
करने बैठेंगे तो आपका पूरा दिन 

585
00:44:09,680 --> 00:44:14,880
बर्बाद हो जाएगा। 
यही बात जीवनसाथी यानी मेट चुनने 

586
00:44:14,880 --> 00:44:19,520
पर भी लागू होती है। 
अगर आप दुनिया के सबसे परफेक्ट 

587
00:44:19,520 --> 00:44:24,600
इंसान को ढूंढने के चक्कर में 
अपनी पूरी उम्र लगा देंगे तो शायद

588
00:44:24,600 --> 00:44:27,120
आप। 
हमेशा अकेले ही रह जाएंगे। 

589
00:44:27,880 --> 00:44:32,800
इसलिए हमारा दिमाग एक समय के बाद 
जानकारी जुटाना बंद कर देता है और

590
00:44:32,800 --> 00:44:42,080
कहता है जो मिला है वही काफी है। 
गुड एनफ कभी कभी सच न जानना हमें 

591
00:44:42,240 --> 00:44:46,040
सेल्फिश हमें। 
स्वार्थी बनने की आज़ादी देता है,

592
00:44:46,320 --> 00:44:51,080
वह भी बिना बुरा महसूस किए। 
एक मजेदारी स्टडी में लोगों को दो

593
00:44:51,080 --> 00:44:55,840
ऑप्शन्ज़ दिए गए हैं। 
पहला आपको $5 मिलेंगे और दूसरे 

594
00:44:55,840 --> 00:45:02,280
आदमी को भी $5 दूसरा ऑप्शन आपको 
$6 मिलेंगे और दूसरे आदमी को 

595
00:45:02,320 --> 00:45:06,440
सिर्फ $1। 
ज्यादातर लोगों ने पहला वाला चुना

596
00:45:06,800 --> 00:45:10,800
क्योंकि वे अच्छा लिखना चाहते थे 
लेकिन जब दूसरे ग्रुप को यह मौका 

597
00:45:10,800 --> 00:45:16,280
दिया गया कि वे अपनी मर्जी से $6 
चुन लें और उन्हें यह पता ना चले 

598
00:45:16,360 --> 00:45:21,080
कि दूसरे को क्या मिल रहा है तो 
बहुतों ने जानबूझकर सच जानने वाला

599
00:45:21,080 --> 00:45:25,440
बटन नहीं दबाया। 
उन्होंने $6 लिए और मन में सोचा 

600
00:45:25,840 --> 00:45:28,240
मुझे क्या पता इन दूसरों को क्या 
मिला? 

601
00:45:28,400 --> 00:45:35,880
मैंने तो बस पैसे लिए समाज या लोग
या सोसाइटी हम पर तभी ऊँगली उठाते

602
00:45:35,880 --> 00:45:41,640
हैं जब उन्हें पता हो कि हमें सच 
पता है, मान लीजिए घर में आग लगी 

603
00:45:41,640 --> 00:45:45,560
है, आप बाहर खड़े हैं। 
और आपको बुरा लग रहा है तभी एक 

604
00:45:45,560 --> 00:45:49,040
लड़का आकर चिल्लाता है, देखो 
खिड़की में एक बिल्ली फंसी है। 

605
00:45:49,760 --> 00:45:53,560
अब आप मुसीबत में है, अगर आप 
बिल्ली को नहीं बचाएंगे तो लोग 

606
00:45:53,560 --> 00:45:58,880
कहेंगे कि आप पत्थर दिल है, अगर 
बचाएंगे तो आपकी जान को खतरा है। 

607
00:45:59,200 --> 00:46:02,800
अगर वह लड़का आपको न बताता तो आप 
चैन से घर चले जाते। 

608
00:46:03,440 --> 00:46:06,880
और आपकी रेपुटेशन, आपकी इज्जत पर 
कोई दाग नहीं लगता। 

609
00:46:09,080 --> 00:46:12,920
एक ट्रेन तेजी से आ रही है और 
पांच लोगों को कुचलने वाली है। 

610
00:46:13,280 --> 00:46:18,600
आपके पास एक बाहरी आदमी खड़ा है। 
अगर आप उसे धक्का देकर पटरी पर 

611
00:46:18,600 --> 00:46:22,440
गिरा दें तो ट्रेन रुक जाएगी और 
पांच लोग बच जाएंगे। 

612
00:46:22,560 --> 00:46:26,680
पर वह आदमी मर जाएगा। 
ज्यादातर लोग कहते हैं कि धक्का 

613
00:46:26,680 --> 00:46:32,320
देना गलत है, लेकिन इस सच को 
जानना ही आपको एक ऐसे धर्म संकट 

614
00:46:32,320 --> 00:46:37,320
एक ऐसे डिलेमा में डाल देता है 
जहाँ आप चाहे जो करें रिसाल्ट 

615
00:46:37,320 --> 00:46:42,200
बुरा ही होगा। 
एक फेमस टीवी शो में एक पुलिस 

616
00:46:42,200 --> 00:46:47,760
अफसर बहुत अच्छी बात कहता है। 
शहर में बाहर शराब पीना मना था, 

617
00:46:49,120 --> 00:46:53,520
अब पुलिस हर किसी को तो पकड़ नहीं
सकती थी वरना वे असली अपराधियों। 

618
00:46:53,520 --> 00:46:57,840
को कब पकड़ते तो इसका सलूशन लोगों
ने खो ढूंढ लिया। 

619
00:46:57,920 --> 00:47:01,920
उन्होंने शराब के बोतल को एक कागज
के भूरे लिफाफे में डालना शुरू कर

620
00:47:01,920 --> 00:47:05,200
दिया। 
अब पुलिस को पता तो था कि अंदर 

621
00:47:05,200 --> 00:47:08,800
क्या है? 
पर वे कह सकते थे कि हमने तो बोतल

622
00:47:08,800 --> 00:47:12,640
ठीक ही नहीं। 
इस तरह पुलिस का काम भी आसान हो 

623
00:47:12,640 --> 00:47:15,000
गया और लोगों को भी परेशानी नहीं 
हुई। 

624
00:47:17,280 --> 00:47:20,760
मान लीजिए किसी को लगता है की उसे
कोई इन्फेक्शन हो सकता है? 

625
00:47:20,920 --> 00:47:23,160
इलाज के लिए टेस्ट करवाना अच्छी 
बात है। 

626
00:47:23,480 --> 00:47:27,720
प्रतिमा के कुछ मॉड्यूल्स, कुछ 
हिस्से जानबूझकर इससे बचते हैं। 

627
00:47:27,720 --> 00:47:30,240
क्यों? 
क्योंकि अगर ट्विस्ट पॉज़िटिव आ 

628
00:47:30,240 --> 00:47:35,000
गया तो उस इंसान को अपने साथियों 
को यह बताना पड़ेगा अगर वही नहीं 

629
00:47:35,000 --> 00:47:37,920
बताता। 
तो उस पर जान बूझकर दूसरों की जान

630
00:47:37,920 --> 00:47:42,040
खतरे में डालने का इलज़ाम लग सकता
है लेकिन अगर वो टेस्ट ही ना 

631
00:47:42,040 --> 00:47:45,800
करवाएं तो हम मज़े से कह सकते हैं
कि अरे मुझे तो पता ही नहीं था कि

632
00:47:45,800 --> 00:47:50,480
मैं बीमार हूँ। 
यहाँ अनजान रहने का मकसद अपनी 

633
00:47:50,480 --> 00:47:53,960
सेहत बचाना नहीं बल्कि अपनी इमेज 
बचाना है। 

634
00:47:56,520 --> 00:48:00,240
अभी तक हमने देखा कि दिमाग कुछ 
जानकारीयों से दूर भागता है। 

635
00:48:00,960 --> 00:48:05,720
वह हम एक बहुत बड़ी बात समझेंगे। 
हमारा बोलने वाला हिस्सा। 

636
00:48:05,720 --> 00:48:10,520
हमारा प्रेस सेक्रेटरी कभी कभी 
जानबूझकर गलत जानकारी रखता है 

637
00:48:11,080 --> 00:48:14,400
यानी? 
दिमाग में जान बूझकर झूठ बोलता 

638
00:48:14,400 --> 00:48:18,040
है, ऐसा क्यों है? 
इसके पीछे एक बहुत बड़ा कारण। 

639
00:48:18,040 --> 00:48:22,400
है। 
इंसान एक समाज में रहने वाला जीव।

640
00:48:22,400 --> 00:48:25,840
है। 
बाकी जानवरों के लिए सिर्फ खाना 

641
00:48:25,840 --> 00:48:29,440
और बचना जरूरी है। 
पर इंसानों के लिए सबसे जरूरी 

642
00:48:29,440 --> 00:48:36,840
चीज़ है समाज लोग। 
हमारी तरक्की हमारा सक्सेस इस बात

643
00:48:36,840 --> 00:48:40,160
पर टिक्की है कि हम दोस्त और साथी
कैसे बनाते हैं? 

644
00:48:41,720 --> 00:48:47,440
दर्द नेचर का तरीका है यह बताने 
का कि कुछ बुरा हो रहा है और खुशी

645
00:48:47,440 --> 00:48:50,000
का मतलब है कि आप सही काम कर रहे 
हैं। 

646
00:48:50,520 --> 00:48:54,960
मज़े की बात ये है। 
कि समाज से बाहर निकाला जाना उतना

647
00:48:54,960 --> 00:48:58,920
ही दर्दनाक होता है जितना की शरीर
में चोट लगना। 

648
00:49:00,160 --> 00:49:03,480
एक स्टडी में देखा गया कि जब 
लोगों को किसी ग्रुप से बाहर कर 

649
00:49:03,480 --> 00:49:07,880
दिया जाता है तो उन्हें उतना ही 
दुख और दर्द होता है जितना कि 

650
00:49:07,880 --> 00:49:12,200
बच्चे पैदा करते समय या पीठ के 
पुराने दर्द में होता है। 

651
00:49:12,880 --> 00:49:17,520
हम सब अच्छे साथी, अच्छे दोस्त और
अच्छे ग्रुप का हिस्सा बनने के 

652
00:49:17,520 --> 00:49:22,800
लिए कॉम्पिटिशन करते हैं। 
लोग दूसरों के बारे में फैसला 

653
00:49:22,800 --> 00:49:26,840
लेने में बहुत तेज होते हैं। 
रिसर्च कहती है कि हम किसी को 

654
00:49:26,840 --> 00:49:29,800
सिर्फ 30 सेकंड देख कर ही बता 
देते हैं। 

655
00:49:29,880 --> 00:49:33,960
की वह कैसा इंसान है? 
इसे थिन स्लाइसिंग कहते हैं। 

656
00:49:34,800 --> 00:49:39,040
हैरानी की बात ये है कि 30 सेकंड 
की जान पहचान उतनी ही सही होती है

657
00:49:39,240 --> 00:49:43,280
जितनी की 5 मिनट की। 
यानी हमारा दिमाग बहुत कम 

658
00:49:43,280 --> 00:49:46,840
इन्फॉर्मेशन में भी बड़े रिजल्ट्स
निकाल लेता है। 

659
00:49:48,520 --> 00:49:52,960
हम जो भी करते हैं या बोलते हैं, 
लोग उससे हमारे बारे में अंदाजा 

660
00:49:52,960 --> 00:49:56,760
लगाते हैं। 
आप इसे लीक होना कह सकते हैं। 

661
00:49:57,480 --> 00:50:01,880
हमारे दिमाग के अंदर जो चल रहा है
वह हमारी बातों और कामों के जरिए 

662
00:50:01,880 --> 00:50:05,840
बाहर लीक हो जाता है। 
इसी से दूसरे लोग हमारे बारे में 

663
00:50:05,840 --> 00:50:12,360
अपनी राय अपनी ओपिनियन बनाते हैं।
इसीलिए हमारे दिमाग का वह हिस्सा 

664
00:50:12,360 --> 00:50:17,200
जो बोलता है उसे इस तरह बनाया गया
है कि वह हमारी सबसे अच्छी फोटो 

665
00:50:17,200 --> 00:50:23,000
दूसरों को दिखाए। 
जो लोग ऊंचे पदों पर पहुंचते हैं,

666
00:50:23,080 --> 00:50:26,360
वे अक्सर पहले से ही यह मानकर 
चलते हैं। 

667
00:50:26,520 --> 00:50:31,280
वे वहाँ पहुंचने के लायक है उनका 
यह पागलपन जैसा भरोसा ही उन्हें 

668
00:50:31,280 --> 00:50:37,320
वहाँ पहुंचा देता है फर्म्स 
यात्री क्रिस्टोफर कोलंबस ने एक 

669
00:50:37,320 --> 00:50:41,400
बार बहुत सलाह दी थी। 
जब वह समुद्र के रास्ते नई दुनिया

670
00:50:41,400 --> 00:50:45,800
की खोज पर निकला तो उसने दो 
रिकॉर्ड्स रखे थे दो। 

671
00:50:45,800 --> 00:50:50,520
लॉक्स? 
पहला दिखावे वाला रिकॉर्ड था। 

672
00:50:51,200 --> 00:50:55,480
इसमें उसने जानबूझकर दिखाया कि 
जहाज बहुत कम दूर चला है ताकि 

673
00:50:55,480 --> 00:51:01,400
उसके साथी डरे नहीं और दूसरा असली
रिकॉर्ड इसमें उसने सही दूरी लिखी

674
00:51:01,400 --> 00:51:04,080
थी ताकि वह खुद राजस्थान में भटक 
जाए। 

675
00:51:05,600 --> 00:51:08,080
हमारा दिमाग भी बिल्कुल ऐसा ही 
करता है। 

676
00:51:08,240 --> 00:51:12,520
वह एक रिकॉर्ड दुनिया को दिखाने 
के लिए रखता है जिसमें हम बहुत 

677
00:51:12,520 --> 00:51:16,920
महान और अच्छे दिखते हैं और दूसरा
असली रिकॉर्ड अंदर कहीं छिपा कर 

678
00:51:16,920 --> 00:51:20,640
रखता है, जिससे वह जरूरत पड़ने पर
ही इस्तेमाल करता है। 

679
00:51:21,680 --> 00:51:25,040
दुनिया में बहुत से लोग ऐसी बातों
पर यकीन करते हैं। 

680
00:51:25,120 --> 00:51:29,320
जिन्हें साइंस या नेचर के नियमों 
से नहीं समझाया जा सकता। 

681
00:51:30,640 --> 00:51:35,640
शायद आपको लगे कि ये सब गलत है, 
पर इसके पीछे भी समाज लोग का एक 

682
00:51:36,000 --> 00:51:41,120
बड़ा कारण है। 
पुराने समय में अगर आप वह नहीं 

683
00:51:41,120 --> 00:51:44,520
मानते थे जो आपके आस पास के लोग 
या राजा मानते थे। 

684
00:51:44,800 --> 00:51:49,920
तो आपको जान से मारा जा सकता था। 
आज भी अगर आप अपने समाज की खास 

685
00:51:49,920 --> 00:51:53,920
बातों को नहीं मानेंगे तो लोग 
आपको अपने ग्रुप से बाहर निकाल 

686
00:51:53,920 --> 00:51:58,400
सकते हैं। 
इसलिए दिमाग के लिए कभी कभी सचे 

687
00:51:58,400 --> 00:52:02,560
जानने से ज्यादा जरूरी यह होता है
कि वह ऐसी बातें मानें। 

688
00:52:02,720 --> 00:52:06,440
जिससे उसके बहुत सारे दोस्त और 
मददगार बन सके। 

689
00:52:08,440 --> 00:52:12,520
अकेले सच जानकर भूखा मरने से 
अच्छा है कि आप सब के साथ मिलकर 

690
00:52:12,520 --> 00:52:20,160
वह माने जो सब मान रहे हैं। 
अब हम खुद को धोखा देने यानी 

691
00:52:20,160 --> 00:52:25,640
सेल्फ डिसेप्शन की बात करेंगे। 
कभी कभी जानबूझकर गलत होना हमारे 

692
00:52:25,640 --> 00:52:29,600
लिए फायदेमंद होता है। 
हमारा दिमाग कुछ बातों को इस तरह 

693
00:52:29,600 --> 00:52:35,200
गलत मानता है कि अगर दूसरे भी उस 
पर यकीन कर लें तो हमें समाज, लोग

694
00:52:35,600 --> 00:52:38,520
या सोसाइटी के बीच एक बढ़त मिल 
जाती है। 

695
00:52:40,680 --> 00:52:44,280
अगर हम मान लें। 
कि दिमाग में बहुत सारे हिस्से 

696
00:52:44,280 --> 00:52:49,360
हैं तो यह समझना आसान हो जाता है 
कि एक इंसान एक ही समय पर किसी 

697
00:52:49,360 --> 00:52:53,400
बात को जान भी सकता है और उससे 
अनजान भी रह सकता है। 

698
00:52:54,520 --> 00:52:59,080
क्या आप जानते हैं कि एक रिसर्च 
में 19 4% कॉलेज टीचरों ने खुद को

699
00:52:59,560 --> 00:53:05,280
एवरेज औसत से बेहतर माना। 
और 68% ने तो खुद को सबसे टॉप 

700
00:53:05,280 --> 00:53:09,680
क्वार्टर में रखा। 
मैथ के हिसाब से यह नामुमकिन है 

701
00:53:10,000 --> 00:53:15,400
कि 19 4% लोग एवरेज से ऊपर हों। 
इसका मतलब है कि बहुत सारे लोग 

702
00:53:15,400 --> 00:53:22,360
शायद मैं भी गलत हों इसे लेख। 
वो बेगन इफेक्ट कहते हैं। 

703
00:53:23,200 --> 00:53:28,240
ये वहम उन चीजों में ज्यादा होता 
है जो साफ साफ नहीं दिखती, जिसे 

704
00:53:28,240 --> 00:53:30,640
ड्राइविंग करना या अच्छा इंसान 
होना। 

705
00:53:31,600 --> 00:53:35,960
एक टेस्ट में करीब 10,00,000 
छात्रों से पूछा गया कि वे दूसरों

706
00:53:35,960 --> 00:53:38,560
के साथ घुलने मिलने में कितने 
अच्छे हैं? 

707
00:53:39,720 --> 00:53:45,440
25% छात्रों ने कहा कि वे इस काम 
में दुनिया के सबसे टॉप 1% लोगों 

708
00:53:45,440 --> 00:53:50,240
में आते हैं। 
क्यों हमारा दिमाग हमें खुद के 

709
00:53:50,240 --> 00:53:53,360
बारे में इतना बढ़ा चढ़ाकर बताता 
है? 

710
00:53:54,680 --> 00:53:58,040
इसे एक भूखे चिड़िया के बच्चे की 
कहानी से समझते हैं। 

711
00:53:58,720 --> 00:54:02,720
घोसले में कई बच्चे होते हैं। 
माँ उसी को खाना खिलाती है जो 

712
00:54:02,720 --> 00:54:07,600
सबसे ज्यादा भूखा होता है। 
इसलिए हर बच्चा अपनी पूरी ताकत 

713
00:54:07,600 --> 00:54:11,080
लगाकर चिल्लाता है ताकि वह सबसे 
ज्यादा भूखा दिखे। 

714
00:54:11,960 --> 00:54:17,520
इंसानों के साथ भी ऐसा ही है अगर 
आप खुद को काबिल या कापबल और बहुत

715
00:54:17,520 --> 00:54:20,480
अच्छा मानेंगे। 
तो आपके बिहेव्यर से यह बात 

716
00:54:20,480 --> 00:54:24,280
दूसरों तक पहुंचेगी। 
अगर आप खुद को एक्स्पर्ट मानेंगे 

717
00:54:24,400 --> 00:54:28,720
तो आप दूसरों को भी आसानी से यकीन
दिला पाएंगे कि आप सच में 

718
00:54:28,720 --> 00:54:32,480
एक्स्पर्ट हैं। 
हमारा दिमाग एक प्रचार करने वाली 

719
00:54:32,480 --> 00:54:36,640
मशीन की तरह एक प्रोपेगेंडा मशीन 
की तरह काम करता है। 

720
00:54:40,400 --> 00:54:44,400
क्या आपको अपनी असली शक्ल पता है 
आपका असली फेस? 

721
00:54:45,440 --> 00:54:50,000
एक मजेदार स्टडी में लोगों को 
उनकी अपनी फोटो दिखाई गई, जिसे 

722
00:54:50,000 --> 00:54:53,600
कंप्यूटर से थोड़ा ज्यादा 
अट्रैक्टिव बना दिया गया था। 

723
00:54:53,760 --> 00:54:57,720
ज्यादातर लोगों ने उसे सुंदर फोटो
को अपनी असली फोटो बताया। 

724
00:54:58,760 --> 00:55:00,760
ड्राइविंग के मामले में भी यही 
हाल है। 

725
00:55:01,400 --> 00:55:04,440
वैज्ञानिक ने उन 50 ड्राइवरों का 
इंटरव्यू लिया। 

726
00:55:04,720 --> 00:55:08,040
जीतने, बुरे अक्सीडेंट के बाद 
हॉस्पिटल में थे कि उनकी गाड़ी 

727
00:55:08,040 --> 00:55:10,920
पलट गई थी। 
पुलिस के हिसाब से उनमें से 

728
00:55:10,920 --> 00:55:14,520
ज्यादातर की ही गलती थी। 
और उन ड्राइवरों ने भी खुद को 

729
00:55:14,520 --> 00:55:18,920
बहुत अच्छा ड्राइवर बताया। 
रियलिटी से टकराने के बाद भी वे 

730
00:55:18,920 --> 00:55:21,920
अपनी एबिलिटी के बारे में गलतफहमी
में थे। 

731
00:55:24,040 --> 00:55:28,480
हमारा दिमाग बहुत छलाक है। 
वो उन बातों को चुन चुन कर यहाँ 

732
00:55:28,480 --> 00:55:30,840
रखता है जो हमें अच्छा महसूस 
कराती। 

733
00:55:30,840 --> 00:55:33,960
हैं। 
और उन बातों को भूल जाता है जिनसे

734
00:55:33,960 --> 00:55:36,960
हमारी इज्जत हमारी रेपुटेशन कम 
होती हो। 

735
00:55:38,080 --> 00:55:43,320
सबसे मजेदार बात तो यह है कि हमें
लगता है कि बाकी सब लोग तो अपनी 

736
00:55:43,320 --> 00:55:48,720
तारीफ के पुल बांधते हैं और 
बायस्ड हैं पर मैं बिल्कुल सच 

737
00:55:48,720 --> 00:55:51,800
देखता हूँ। 
जब स्टूडेंट्स से पूछा गया कि 

738
00:55:51,800 --> 00:55:56,320
क्या उन पर इन दिमागी कमियों का 
असर पड़ता है तो सब ने कहा दूसरों

739
00:55:56,320 --> 00:56:01,880
पर पड़ता होगा मुझ पर नहीं तो 
हमारा दिमाग हमें खुद के बारे में

740
00:56:01,880 --> 00:56:07,360
झूठ इसलिए बोलता है ताकि हम समाज 
लोग इनके सामने अपनी एक बहुत 

741
00:56:07,360 --> 00:56:11,720
अच्छी तस्वीर पेश कर सकें। 
यह झूठ हमें दूसरों को प्रभावित 

742
00:56:11,720 --> 00:56:15,440
करने और अपनी जगह पक्की करने में 
मदद करता है। 

743
00:56:17,120 --> 00:56:21,000
एक एग्ज़ैम्पल फैंटेसी फुटबॉल में
भी ये दिखता है। 

744
00:56:21,200 --> 00:56:24,960
ये एक तरह का खेल है। 
अगर कोई खिलाड़ी सिर्फ किस्मत की 

745
00:56:24,960 --> 00:56:28,040
वजह से जीत रहा हो तो भी वह यही 
कहेगा। 

746
00:56:28,160 --> 00:56:30,720
कि ये मेरी बढ़िया स्ट्रेटेजी का 
नतीजा है। 

747
00:56:31,400 --> 00:56:35,520
यहाँ तक कि नेता भी यही करते हैं।
अगर तेल की कीमतें कम हो जाए तो 

748
00:56:35,520 --> 00:56:39,120
वे कहेंगे मार्केट हमारी बातों की
वजह से सुधर रहा है। 

749
00:56:40,640 --> 00:56:45,360
समाज लोगों के बीच अपनी जगह बनाने
के लिए सिर्फ अच्छा होना काफी 

750
00:56:45,360 --> 00:56:48,440
नहीं है। 
बल्कि दूसरों से बेहतर होना जरूरी

751
00:56:48,440 --> 00:56:51,200
है। 
इसे एक एग्ज़ैम्पल से समझते हैं 

752
00:56:51,200 --> 00:56:57,400
जिसे बैंकर्स पैराडॉक्स कहते हैं।
बैंक उन्हीं को पैसा उधार देता 

753
00:56:57,400 --> 00:57:00,520
है। 
जिनके पास पहले से पैसा हो वैसे 

754
00:57:00,520 --> 00:57:04,560
ही हम उन्हीं से दोस्ती करना 
चाहते हैं, जो हमें फ्यूचर में 

755
00:57:04,560 --> 00:57:08,440
काम आ सके। 
इसलिए हर कोई यह दिखाने की कोशिश 

756
00:57:08,440 --> 00:57:12,360
करता है कि वह सबसे खास और 
वैल्यूएबल है। 

757
00:57:13,520 --> 00:57:20,200
फेमस स्कॉलर विलियम जेम्स ने कहा 
था कि अगर कोई साइकोलॉजिस्ट है तो

758
00:57:20,200 --> 00:57:24,200
उसे इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि
उसे दूसरी भाषाओं का ज्ञान नहीं 

759
00:57:24,200 --> 00:57:26,800
है। 
लेकिन अगर कोई उससे बड़ा 

760
00:57:27,080 --> 00:57:31,320
मनोवैज्ञानिक मिल जाए, उससे बड़ा 
साइकोलॉजिस्ट तो उसे बहुत बुरा 

761
00:57:31,320 --> 00:57:34,560
लगता है। 
हमें दुख तब नहीं होता जब हम 

762
00:57:34,560 --> 00:57:40,080
दुनिया में पीछे होते हैं। 
दुख तब होता है जब हम अपने खास 

763
00:57:40,320 --> 00:57:43,480
मुकाबले में दूसरे नंबर पर आते 
हैं। 

764
00:57:44,680 --> 00:57:48,760
एक और एक्स्पेरमेन्ट में देखा गया
कि हम अपने दोस्तों के साथ कैसा 

765
00:57:48,920 --> 00:57:53,360
बिहेव् करते हैं। 
लोगों को एक शब्दों वाला गेम 

766
00:57:53,360 --> 00:57:57,840
खेलने को कहा गया। 
जब खेल को सिर्फ मज़े के लिए 

767
00:57:57,840 --> 00:58:01,320
बताया गया तो लोगों ने अपने 
दोस्तों को आसान क्लूज दिए। 

768
00:58:01,720 --> 00:58:04,400
आसान सुराग ताकि उनका दोस्त जीत 
सके। 

769
00:58:05,000 --> 00:58:09,800
पर जब खेल को बुद्धिमानी की पहचान
बताया गया इन्टेलिजेन्स टेस्ट तो 

770
00:58:09,800 --> 00:58:12,400
लोगों ने अपने दोस्तों को कठिन 
क्लूज़ दिए। 

771
00:58:12,640 --> 00:58:19,280
कठिन सुराग और अनजान लोगों को 
आसान यहाँ दिमाग का एक हिस्सा 

772
00:58:19,280 --> 00:58:24,160
चाहता है कि दोस्त हमसे आगे ना 
निकल जाए ताकि समाज लोग में। 

773
00:58:24,480 --> 00:58:29,080
हमारी इम्पोर्टेंस कम न हो जाए। 
पर जब उनसे पूछा गया तो उन्होंने 

774
00:58:29,080 --> 00:58:36,560
यही कहा कि वे सबके साथ ईमानदार 
थे, फेयर थे एक और चीज़ जो हमारा 

775
00:58:36,560 --> 00:58:42,880
दिमाग हमें गलत दिखाता है, वह है 
बिना वजह की उम्मीद अनजस्टिफ़ायबल

776
00:58:43,000 --> 00:58:48,200
ऑप्टिमिस्म हमें लगता है कि हमारे
साथ तो सब अच्छा ही होगा जिससे 

777
00:58:48,200 --> 00:58:52,880
करियर में कामयाबी और बुरी चीजें 
जैसे अक्सीडेंट सिर्फ दूसरों के 

778
00:58:52,880 --> 00:58:56,280
साथ होंगी। 
अगर हम स्टेटिस्टिक्स देखें तो यह

779
00:58:56,280 --> 00:59:02,240
बिल्कुल गलत है। 
समाज या लो के बीच रहने के लिए 

780
00:59:02,240 --> 00:59:05,160
ऑप्टिमिज्म रखना एक। 
अच्छी स्ट्रेटेजी है। 

781
00:59:05,640 --> 00:59:09,520
अगर मैं आपको यकीन दिला दूँ कि 
मेरा फ्यूचर बहुत शानदार है, तो 

782
00:59:09,520 --> 00:59:13,520
आप मुझसे दोस्ती करना चाहेंगे। 
फ्यूचर के बारे में झूठ बोलना 

783
00:59:13,520 --> 00:59:16,760
आसान है क्योंकि वो अभी तक हुआ ही
नहीं है। 

784
00:59:17,520 --> 00:59:22,800
दूसरी तरफ जो लोग हमेशा बुरा 
सोचते हैं, जो पेसिमिस्टिक हैं। 

785
00:59:22,960 --> 00:59:27,200
उन्हें लोग कम पसंद करते हैं, 
लेकिन याद रहे अगर आप अकेले कोई 

786
00:59:27,200 --> 00:59:31,880
काम कर रहे हैं जैसे फ्रॉगर गेम 
खेलना तो रियलिटी जानना ही बेहतर 

787
00:59:31,880 --> 00:59:34,680
है। 
ज्यादा उम्मीद के चक्कर में आप 

788
00:59:34,800 --> 00:59:39,120
गलत फैसला ले सकते हैं और अपना 
नुकसान कर सकते हैं। 

789
00:59:40,720 --> 00:59:45,360
आपको लगता होगा कि वैज्ञानिक 
सिर्फ सच की तलाश करते हैं, पर वे

790
00:59:45,360 --> 00:59:48,920
भी इंसान हैं। 
विज्ञान की दुनिया में नई खोज की 

791
00:59:48,920 --> 00:59:53,080
कीमत बहुत हैं। 
अपनी बात को नया दिखाने के लिए कई

792
00:59:53,080 --> 00:59:57,440
वैज्ञानिक दूसरों की बातों को गलत
तरीके से पेश करते हैं। 

793
00:59:58,320 --> 01:00:01,800
वो किसी पुराने वैज्ञानिक की बात 
उठाते हैं, उसे थोड़ा थोड़ा 

794
01:00:01,800 --> 01:00:05,160
मरोड़कर पेश करते हैं। 
जैसे की उस पुराने वैज्ञानिक ने 

795
01:00:05,160 --> 01:00:09,440
कुछ गलत कहा हो और फिर अपनी बात 
को सुधार के रूप में इम्प्रूवमेंट

796
01:00:09,440 --> 01:00:13,920
के रूप में पेश करते हैं, चाहे वो
खुद की तारीफ। 

797
01:00:13,920 --> 01:00:16,920
हो? 
फ्यूचर की उम्मीद हो या बिना काम 

798
01:00:16,920 --> 01:00:20,800
की दवा। 
हमारा दिमाग जानबूझकर हमें गलत 

799
01:00:20,800 --> 01:00:26,600
दिखाता है ताकि हम समाज में बेहतर
दिख सके और हमारा शरीर बेहतर 

800
01:00:26,600 --> 01:00:33,800
तरीके से काम कर सके। 
चलिए आगे बढ़ने से पहले एक बार 

801
01:00:33,800 --> 01:00:37,240
पीछे मुड़कर देख लेते हैं कि हमने
अब तक क्या क्या बातें की? 

802
01:00:38,280 --> 01:00:44,480
मैंने खास शब्द का इस्तेमाल किया 
है स्ट्रेटेजिकली रॉन्ग इसका आसान

803
01:00:44,480 --> 01:00:46,640
मतलब है कि फायदे के लिए गलत 
होना। 

804
01:00:47,160 --> 01:00:51,840
कुछ लोग इसे पॉज़िटिव इलूशन या 
हसीन सपने भी कहते हैं। 

805
01:00:52,160 --> 01:00:56,160
पर मुझे फायदे के लिए गलत होना 
शब्द ज़्यादा पसंद है। 

806
01:00:56,200 --> 01:00:58,000
क्यों? 
क्योंकि अब बताता है कि हमारा 

807
01:00:58,000 --> 01:01:03,040
दिमाग ऐसा जानबूझकर करता है। 
इसका असली मकसद है दूसरों को अपनी

808
01:01:03,040 --> 01:01:07,960
बातों पर यकीन दिलाना। 
अगर दूसरे लोग आपकी उन बातों को 

809
01:01:07,960 --> 01:01:13,960
सच मान लें जो असल में गलत है तो 
इसमें आपका ही फायदा होता है। 

810
01:01:15,160 --> 01:01:18,200
बहुत से लोग इन बातों को खुद को 
धोखा देना कहते हैं। 

811
01:01:18,200 --> 01:01:23,200
जैसे मेरी टीम पक्का जीतेगी, भले 
ही वो बुरी तरह हार रही हो। 

812
01:01:23,880 --> 01:01:27,680
मैं दुनिया का सबसे अच्छा ड्राइवर
हूँ, भले ही मैंने अभी अभी गाड़ी 

813
01:01:27,680 --> 01:01:31,560
ठोक दी हो। 
अगर मैं पासा ठीक से फेंकू तो 

814
01:01:31,560 --> 01:01:36,160
मेरी मर्जी का नंबर आएगा। 
अगर हम यह सोचेंगे, हमारा दिमाग 

815
01:01:36,160 --> 01:01:39,520
एक ही टुकड़ा है तो यह बात बड़ी 
अजीब लगती है। 

816
01:01:39,840 --> 01:01:44,800
कोई खुद को धोखा कैसे दे सकता है?
पर अगर हम दिमाग को छोटे छोटे 

817
01:01:44,800 --> 01:01:49,520
हिस्सों के रूप में देखें तो यह 
सब बहुत सिंपल हो जाता है। 

818
01:01:51,520 --> 01:01:55,040
दिमाग के कुछ हिस्से सिर्फ 
प्रोपगंडा करने के लिए मने हैं 

819
01:01:55,280 --> 01:02:00,480
जैसे किसी नेता का खबरे झूठ 
फैलाता है वैसे ही ये हिस्से आपके

820
01:02:00,480 --> 01:02:02,680
बारे में अच्छी अच्छी बाते 
फैलातें हैं। 

821
01:02:03,480 --> 01:02:08,040
इनका काम सच बोलना नहीं बल्कि 
आपको महान दिखाना है। 

822
01:02:09,800 --> 01:02:14,760
साइकोलॉजी की किताबों में सेल्फ 
यानी मैं शब्द का बहुत इस्तेमाल 

823
01:02:14,760 --> 01:02:19,840
होता है, पर मेरा मानना है कि जब 
भी आप ये शब्द सुनें तो सावधान हो

824
01:02:19,840 --> 01:02:23,240
जाए। 
हमारे सिर के अंदर कोई एक मैं 

825
01:02:23,240 --> 01:02:27,720
नहीं बैठा है बल्कि बहुत सारे 
छोटे छोटे मॉड्यूल्स अपना अपना 

826
01:02:27,720 --> 01:02:31,080
काम कर रहे हैं। 
यहाँ कोई किसी को धोखा नहीं दे 

827
01:02:31,080 --> 01:02:34,360
रहा, बस अलग अलग हिस्से अपना काम 
कर रहे हैं। 

828
01:02:35,400 --> 01:02:40,560
कभी कभी सच जानना बहुत जरूरी होता
है और कभी कभी गलत होना फायदेमंद 

829
01:02:41,440 --> 01:02:46,440
तो हमारे दिमाग में एक ही समय पर 
दो अलग बातें चल सकती हैं बाहर 

830
01:02:46,520 --> 01:02:49,200
दिखाने के लिए दिमाग का एक 
हिस्सा। 

831
01:02:49,320 --> 01:02:53,040
प्रेस सेक्रेटरी ये दुनिया को 
दिखाने के लिए गलत बात मानेगा 

832
01:02:53,480 --> 01:02:59,200
ताकि लोग आपसे इम्प्रेस हो सके। 
दिमाग का दूसरा हिस्सा असली सच 

833
01:02:59,200 --> 01:03:03,080
जानता होगा ताकि आप सही फैसला ले 
सकें। 

834
01:03:04,640 --> 01:03:08,360
हमारा दिमाग खुश रहने के लिए नहीं
बना है वह। 

835
01:03:08,600 --> 01:03:12,520
काम करने के लिए बना है। 
हम खुद को बढ़ा चाह कर इसलिए 

836
01:03:12,520 --> 01:03:18,840
दिखाते हैं ताकि समाज और लोग हमें
पसंद करें और हम से जुड़े ये 

837
01:03:18,840 --> 01:03:26,880
सिर्फ एक स्ट्रेटेजी है, कोई 
दिमागी बिमारी नहीं, हमारा दिमाग 

838
01:03:26,880 --> 01:03:29,920
इस तरह बना है। 
कि हमें हजारों तरह के फीलिंग्स 

839
01:03:29,920 --> 01:03:34,480
होते हैं, पर ज़रा सोचिये अगर 
हमारा दिमाग ऐसा होता कि दुनिया 

840
01:03:34,480 --> 01:03:39,560
में कुछ भी हो रहा हो, हमें सिर्फ
खुशी ही महसूस होती, हमेशा मज़ा 

841
01:03:39,560 --> 01:03:42,960
आता रहता। 
सुनने में तो अच्छा लगता है पर 

842
01:03:42,960 --> 01:03:46,280
रेवोलुशन के हिसाब से ऐसा दिमाग 
किसी काम का नहीं है। 

843
01:03:46,440 --> 01:03:49,000
क्यों? 
क्योंकि नेचर को इस बात से कोई 

844
01:03:49,000 --> 01:03:52,160
फर्क नहीं पड़ता कि आप कितना 
नाखुश महसूस कर रहे हैं। 

845
01:03:52,600 --> 01:03:58,040
उसे सिर्फ इस बात से मतलब है कि 
आप क्या कर रहे हैं खुशी या दुख 

846
01:03:58,280 --> 01:04:02,560
अपने आप में कोई मायने नहीं रखते 
अगर किसी के पास ऐसा दिमाग हो जो 

847
01:04:02,560 --> 01:04:06,560
उसे हमेशा बहुत खुश रखे। 
पर वह अपनी जान बचाने या परिवार 

848
01:04:06,560 --> 01:04:11,760
बढ़ाने के लिए कुछ न करे तो ऐसा 
इंसान और उसके जीन्स रेस में पीछे

849
01:04:11,760 --> 01:04:16,160
छूट जाएंगे। 
यही वजह है कि दर्द होना बहुत 

850
01:04:16,160 --> 01:04:20,240
जरूरी है। 
दर्द नेचर का तरीका है, आपको काम 

851
01:04:20,240 --> 01:04:26,880
पर लगाने का हाथ से हाथ हटाओ। 
खराब खाना थूको कुदरत को नेचर को 

852
01:04:26,880 --> 01:04:32,840
आपकी खुशी में तभी इंट्रेस्ट है, 
जब वह आपको कोई जरूरी चीज़ यानी 

853
01:04:32,840 --> 01:04:35,440
अडैप्टिव गोल हासिल करने में मदद 
करे। 

854
01:04:37,040 --> 01:04:40,920
अगर किसी के सामने भालू खड़ा हो 
और उसका दिमाग उसे डर के बजाए 

855
01:04:40,920 --> 01:04:45,600
बहुत सुकून और। 
खुशी महसूस कराये तो ये आदमी भालू

856
01:04:45,600 --> 01:04:49,360
से भागेगा नहीं। 
वो भालू को गले लगाने की सोचेगा 

857
01:04:49,360 --> 01:04:52,760
और रिसाल्ट ये होगा कि भालू उसे 
खा जाएगा। 

858
01:04:53,400 --> 01:04:58,160
ऐसे दिमाग को हम कहते हैं भालू का
खाना बनाने वाला दिमाग। 

859
01:05:00,760 --> 01:05:03,200
नेचर खुशी के मामले में बहुत 
लालची है। 

860
01:05:03,200 --> 01:05:08,080
मान लीजिए आपने 15 साल मेहनत की 
और आपको मन चाही, नौकरी मिल गई। 

861
01:05:08,520 --> 01:05:11,920
आपको लगेगा कि अब तो मैं पूरी 
जिंदगी खुश रहूंगा पर ऐसा नहीं 

862
01:05:11,920 --> 01:05:15,040
होता। 
थोड़े समय बाद आप फिर से उतने ही 

863
01:05:15,160 --> 01:05:17,960
खुश या दुखी हो जाएंगे। 
जीतने पहले थे। 

864
01:05:18,560 --> 01:05:21,840
अब आपका दिमाग किसी और बड़ी चीज़ 
के पीछे भागने लगेगा। 

865
01:05:22,040 --> 01:05:25,840
इसे खुशी की दौड़ हेडोनिक ट्रेड 
मिल कहते हैं। 

866
01:05:26,640 --> 01:05:32,040
ये नेचर का तरीका है आपके सामने 
गाजर लटकाए रखने का ताकि आप कभी 

867
01:05:32,040 --> 01:05:34,960
थक कर न बैठें और हमेशा काम करते 
रहें। 

868
01:05:36,440 --> 01:05:40,360
अक्सर लोग कहते हैं कि हमें अपनी 
इज्जत, अपनी सेल्फ स्टीम बढ़ाने 

869
01:05:40,360 --> 01:05:42,600
के लिए खुद को धोखा देना पड़ता 
है। 

870
01:05:42,960 --> 01:05:47,640
पर सच तो ये है कि सेल्फ स्टीम 
अपने आप में कोई मंजिल नहीं है। 

871
01:05:49,680 --> 01:05:54,280
हम खुद को खुश रखने के लिए धोखा 
नहीं देते बल्कि फायदे के लिए ऐसा

872
01:05:54,280 --> 01:05:57,800
करते हैं। 
अनजान रहना या गलत होना कभी कभी 

873
01:05:57,800 --> 01:06:02,720
समाज में अपनी जगह पक्की करने की 
एक स्ट्रेटेजी होती है। 

874
01:06:05,760 --> 01:06:10,800
हमने बात की थी कि एक विद्वान के 
हिसाब से एक स्कॉलर के हिसाब से 

875
01:06:11,000 --> 01:06:15,240
दो सबसे बड़े रहस्य हैं। 
पहला ये कि दुनिया बनी है क्यों? 

876
01:06:15,760 --> 01:06:20,320
और दूसरा ये कि लोग रात को अपने 
फ्रिज पर अपने रेफ्रीजिरेटर पर 

877
01:06:20,440 --> 01:06:25,760
ताला क्यों लगाते हैं? 
अब इस सेक्शन में हम दूसरे रहस्य 

878
01:06:25,760 --> 01:06:30,760
को सुलझाएंगे। 
इकोनॉमिक्स समझने वाले एक्सपर्ट्स

879
01:06:30,760 --> 01:06:34,480
मानते हैं कि हर इंसान की अपनी 
कुछ पसंद होती है। 

880
01:06:34,640 --> 01:06:39,040
जैसे मुझे मीठा स्कीइंग और मेरी 
गर्लफ्रेंड पसंद है। 

881
01:06:39,680 --> 01:06:43,080
अब एक्सपर्ट्स का कहना है कि 
हमारी पसंद एक लिस्ट की तरह जमी 

882
01:06:43,080 --> 01:06:46,320
हुई होती है। 
अगर मुझे सेब के मुकाबले चॉकलेट 

883
01:06:46,320 --> 01:06:49,680
केक ज्यादा पसंद है तो मैं हमेशा 
केक ही चुनूंगा। 

884
01:06:50,560 --> 01:06:55,200
उनके हिसाब से हमारा दिमाग एक। 
मैजिक बॉल जैसा है एक जादुई गेंद 

885
01:06:55,200 --> 01:06:59,360
जैसा चाहे रात के 8:00 बजे हो या 
रात के 12। 

886
01:07:00,040 --> 01:07:04,120
अगर आप उससे पूछेंगे कि क्या मुझे
केक खाना चाहिए तो वो हमेशा एक ही

887
01:07:04,120 --> 01:07:07,240
जवाब देगा। 
अगर आपकी सेहत आपके लिए केक से 

888
01:07:07,240 --> 01:07:11,560
ज्यादा जरूरी है तो आपका जवाब 
हमेशा नहीं होना चाहिए। 

889
01:07:12,920 --> 01:07:15,840
फिर फ्रिज पर ताला लगाने की नौबत 
क्यों आती है? 

890
01:07:16,840 --> 01:07:21,720
अगर आप रात को केक नहीं खाना 
चाहते तो आप उसे नहीं खाएंगे और 

891
01:07:21,720 --> 01:07:25,720
अगर आप खाना चाहते हैं तो ताला 
लगाकर अपना ही रास्ता क्यों रोक 

892
01:07:25,720 --> 01:07:28,480
रहे हैं? 
यह बात एक्सपर्ट्स को बड़ी उलझी 

893
01:07:28,480 --> 01:07:31,480
हुई लगती है, लेकिन मेरा मानना 
अलग है। 

894
01:07:31,600 --> 01:07:36,000
दिमाग कोई जादुई गेंद नहीं है 
बल्कि बहुत सारे छोटे छोटे 

895
01:07:36,000 --> 01:07:39,360
मॉड्यूल्स छोटे छोटे हिस्सों का 
एक ग्रुप है। 

896
01:07:39,840 --> 01:07:47,560
हर हिस्सा अपनी मर्जी चलाता है। 
सोचिए आपको काफी ज्यादा पसंद है 

897
01:07:47,560 --> 01:07:50,720
या रेड वाइन? 
इसका जवाब इस बात पर टिका है कि 

898
01:07:50,720 --> 01:07:54,360
अभी वक्त क्या हुआ है? 
सुबह 8:00 बजे मुझे कॉफ़ी चाहिए 1

899
01:07:54,360 --> 01:07:58,880
नहीं पर रात को 8:00 बजे मुझे 1 
चाहिए कॉफ़ी नहीं तो क्या मेरी 

900
01:07:58,880 --> 01:08:00,600
पसंद बदल गई? 
हाँ। 

901
01:08:01,080 --> 01:08:05,720
हमारी पसंद इस बात पर डिपेंड करती
है कि हम किस एनवायरनमेंट या वक्त

902
01:08:05,720 --> 01:08:11,680
में हैं। 
जैसे हमारी कोई एक रियल बिलीव 

903
01:08:11,680 --> 01:08:15,640
नहीं होती। 
एक असली बात वैसे ही हमारी कोई एक

904
01:08:15,720 --> 01:08:19,399
असली पसंद एक रियल परेफरेंस भी 
नहीं होती। 

905
01:08:19,720 --> 01:08:24,120
हमारा दिमाग हजारों टुकड़ों से 
बना है, कभी कोई हिस्सा जीत जाता 

906
01:08:24,120 --> 01:08:28,920
है तो कभी कोई। 
इसलिए हम कभी खुद पर काबू रख पाते

907
01:08:28,920 --> 01:08:32,439
हैं और कभी फ्रिज का ताला तोड़कर 
केक खा लेते हैं। 

908
01:08:35,479 --> 01:08:38,600
आखिर हमारा दिमाग ऐसा क्यों काम 
करता है? 

909
01:08:39,000 --> 01:08:43,359
क्या एक ऐसा दिमाग बेहतर नहीं 
होता जो हर वक्त एक जैसा रहे? 

910
01:08:43,520 --> 01:08:47,920
चाहे कॉन्टेक्स्ट कैसा भी हो, 
इकोनॉमिक्स समझने वाले शायद यही 

911
01:08:47,920 --> 01:08:52,960
कहेंगे पर हकीकत हैसी नहीं है। 
हमारे दिमाग के अलग अलग हिस्से 

912
01:08:52,960 --> 01:08:59,319
अलग अलग माहौल में जागते हैं। 
दिमाग के कुछ हिस्से सिर्फ आपकी 

913
01:08:59,319 --> 01:09:02,359
आज की जरूरतों को पूरा करने के 
लिए बने हैं। 

914
01:09:02,479 --> 01:09:05,399
बायोलोजी में इन्हें फोर ऐप्स कहा
जाता है। 

915
01:09:05,600 --> 01:09:10,600
फीडिंग यानी खाना फ्लीइंग यानी 
भागना फाइटिंग यानी लड़ना और 

916
01:09:10,840 --> 01:09:15,040
मिलना यानी सिक्स। 
अगर हमारे पूर्वजों में ये हिस्से

917
01:09:15,040 --> 01:09:18,319
न होते तो वे अपनी नस्ल आगे नहीं 
बढ़ा पाते। 

918
01:09:19,080 --> 01:09:23,359
ये हिस्से हमें तुरंत मिलने वाली 
खुशी यानी इन्स्टंट ग्रेटिफिकेशन 

919
01:09:23,359 --> 01:09:29,120
की तरफ ले जाते हैं, जैसे मीठा और
तला हुआ खाना, सुबह देर तक रजाई 

920
01:09:29,120 --> 01:09:34,279
में सोए रहना, ताकत बचाने के लिए 
बिना सोचे समझे किसी की तरफ खींचे

921
01:09:34,279 --> 01:09:38,960
चले जाना। 
इसे ऐसे समझें कि यहीं से तब राज़

922
01:09:38,960 --> 01:09:42,120
करते हैं जब आपको लगे कि कल। 
हो ना हो। 

923
01:09:43,399 --> 01:09:47,160
दूसरी तरफ हमारे पास कुछ ऐसे 
हिस्से भी हैं जो दूर की सोचते 

924
01:09:47,160 --> 01:09:49,720
हैं। 
ये हिस्से ही हमें सुबह जल्दी 

925
01:09:49,720 --> 01:09:53,960
उठकर दौड़ने पर मजबूर करते हैं 
ताकि हम फ्यूचर में हेल्ती रहे। 

926
01:09:54,800 --> 01:09:59,720
यही हिस्से हमें पैसे बचाने और 
फालतू के कामों से बचने की सलाह 

927
01:09:59,720 --> 01:10:04,160
देते हैं। 
डिस्काउंट रेट नाम का एक शब्द आता

928
01:10:04,160 --> 01:10:07,880
है। 
इसका आसान मतलब है कि आप किसी नाम

929
01:10:07,880 --> 01:10:14,640
के लिए कितना इंतजार कर सकते हैं।
हाई डिस्काउंट रेट यानी आप बहुत 

930
01:10:14,960 --> 01:10:18,400
उतावले हैं। 
इंपेशेंट हैं आपको आज ही सब कुछ 

931
01:10:18,400 --> 01:10:21,160
चाहिए। 
लो डिस्काउंट रेट यानी आप में 

932
01:10:21,160 --> 01:10:25,680
बहुत पेशेंस है, बहुत सब्र है। 
आप कल के बड़े फायदे के लिए आज का

933
01:10:25,680 --> 01:10:30,080
छोटा मज़ा छोड़ सकते हैं। 
मज़े की बात ये है कि इंसान 

934
01:10:30,080 --> 01:10:35,600
हजारों साल तक इंतजार कर सकता है 
पर एक नन्हा बंदर सिर्फ आठ सेकंड 

935
01:10:35,600 --> 01:10:41,120
इंतजार कर पाता है। 
हमारी ज़िन्दगी अक्सर इन दो तरह 

936
01:10:41,120 --> 01:10:45,400
के हिस्सों की लड़ाई बन जाती है। 
आप इसे ऐसे पहचान सकते हैं। 

937
01:10:46,480 --> 01:10:50,320
मुझे आइस क्रीम खानी तो बहुत पसंद
है पर बाद में दुख होता है कि 

938
01:10:50,320 --> 01:10:53,160
क्यों खाये? 
यानी उतावले हिस्से इम्पेशेंट 

939
01:10:53,160 --> 01:10:56,160
वाले नहीं। 
पेशेंट वाले यानी सब्र वाले 

940
01:10:56,160 --> 01:10:59,760
हिस्से में हैं, जो मुझे सुबह 
6:00 बजे उठना तो पसंद नहीं है पर

941
01:10:59,760 --> 01:11:05,560
उठने के बाद बहुत अच्छा लगता है। 
हमारा दिमाग इन दोनों के बीच 

942
01:11:05,640 --> 01:11:09,680
ट्रेड ऑफ करता रहता है। 
अगर आप बहुत भूखे हैं तो खाने 

943
01:11:09,680 --> 01:11:13,880
वाले हिस्सा जी जाएगा अगर आप सेफ 
महसूस कर रहे हैं। 

944
01:11:13,960 --> 01:11:18,720
तो सब्र वाला हिस्सा जी जाएगा 
क्योंकि हमारे सब्र वाले हिस्से 

945
01:11:18,720 --> 01:11:22,680
जानते हैं कि मौका मिलते ही 
उतावले हिस्से गड़बड़ करेंगे। 

946
01:11:22,840 --> 01:11:25,240
इसलिए वे पहले से ही तैयारी कर 
लेते हैं। 

947
01:11:25,240 --> 01:11:30,040
जैसे लोग अलार्म को बिस्तर से दूर
रखते हैं ताकि सुबह उसे बंद करने 

948
01:11:30,040 --> 01:11:34,800
के लिए उठना ही पड़े। 
अपने सैलरी से अपने आप पैसे कटने 

949
01:11:34,800 --> 01:11:38,840
का इंतजाम करते हैं ताकि हाथ में 
पैसे आने पर वे उन्हें खर्च ना 

950
01:11:38,840 --> 01:11:43,800
करते हैं। 
ओडिशस की एक पुरानी कहानी है 

951
01:11:45,440 --> 01:11:49,120
जिसमें राजन ने खुद को जहाज के 
खंभे से मँधवा लिया था ताकि वह 

952
01:11:49,120 --> 01:11:55,160
परियों के जादुई गाने को सुनकर। 
समुद्र में ना कूद जाए हमारा 

953
01:11:55,160 --> 01:11:59,280
दिमाग कोई एक बॉस नहीं चलाता। 
कॉन्टेक्स्ट के हिसाब से कभी 

954
01:11:59,360 --> 01:12:02,760
उतावला हिस्सा जीतता है तो कभी 
सब्र वाला हिस्सा। 

955
01:12:03,240 --> 01:12:07,200
हम कौन सा फैसला लेंगे? 
यह इस बात पर टिका है कि उस वक्त 

956
01:12:07,280 --> 01:12:11,040
हमारे दिमाग का कौन सा ऐप सबसे 
ज्यादा अक्टिव है? 

957
01:12:13,320 --> 01:12:17,400
खुद पर काबू यानी सेल्फ कंट्रोल 
कोई जादुई ताकत नहीं है। 

958
01:12:17,840 --> 01:12:21,680
यह दिमाग के अलग अलग हिस्सों के 
बीच का एक हिसाब किताब है। 

959
01:12:22,160 --> 01:12:27,040
कॉन्टेक्स्ट और इनाम को देखकर 
हमारा दिमाग यह तय करता है कि उसे

960
01:12:27,040 --> 01:12:30,000
अभी मज़ा लेना है या कल के लिए 
रुकना है। 

961
01:12:32,480 --> 01:12:36,720
इकोनॉमिक्स के एक्सपर्ट्स और 
दिमाग के डॉक्टर दोनों ही इंसान 

962
01:12:36,720 --> 01:12:40,600
को समझने की कोशिश कर रहे हैं, पर
दोनों का तरीका अलग है। 

963
01:12:41,200 --> 01:12:44,360
कुछ एक्सपर्ट्स पत्थर की मूर्ति 
की तरह सोचते हैं। 

964
01:12:44,760 --> 01:12:49,080
वे मानते हैं कि इंसान का दिमाग 
पहले से ही परफेक्ट और समझदार है।

965
01:12:49,240 --> 01:12:54,120
बस उसमें कुछ कमियां हैं, बाइसेस 
हैं, जिन्हें पत्थर की तरह तराशकर

966
01:12:54,120 --> 01:12:58,840
हटाना है, पर मेरा मानना है कि 
दिमाग मिट्टी की मूर्ति जैसा है। 

967
01:12:59,120 --> 01:13:03,360
जैसे एक मूर्तिकार मिट्टी के छोटे
छोटे टुकड़े जोड़कर मूर्ति बनाता 

968
01:13:03,360 --> 01:13:07,640
है, वैसे ही नेशन में हजारों 
सालों में एक एक करके। 

969
01:13:07,720 --> 01:13:12,280
नए दिमागी हिस्से यानी मॉडल्स 
जोड़े हैं, तब जाकर आज का इंसान 

970
01:13:12,280 --> 01:13:16,640
बना है। 
हमारा दिमाग कोई ऐसी मशीन नहीं है

971
01:13:16,680 --> 01:13:20,080
जो शुरू से ही बिल्कुल सटीक और 
समझदार बनी हो। 

972
01:13:20,680 --> 01:13:25,240
ये तो छोटे छोटे टुकड़ों का एक 
जोड है जो वक्त के साथ धीरे धीरे 

973
01:13:25,240 --> 01:13:26,840
इवॉल्व्ड हुआ। 
है। 

974
01:13:27,240 --> 01:13:31,680
अगर हम इस बात को मान लें तो हमें
इंसान की उठ पटांग बातें और 

975
01:13:31,680 --> 01:13:34,520
गलतियाँ समझना बहुत आसान हो 
जाएगा। 

976
01:13:36,600 --> 01:13:41,160
हमारा दिमाग हमें दूसरों पर ऊँगली
उठाना तो सीखाता है पर अपनी बारी 

977
01:13:41,160 --> 01:13:44,280
आने पर वह हमें अनजान बना देता 
है। 

978
01:13:44,360 --> 01:13:48,920
यह दोगलापन या हिपोक्रिसी कोई 
बिमारी नहीं बल्कि दिमाग के काम 

979
01:13:48,920 --> 01:13:53,160
करने का तरीका है। 
अमेरिका की आज़ादी इस बात पर शुरू

980
01:13:53,160 --> 01:13:58,040
हुई थी कि हर इंसान के पास कुछ 
ऐसे हक हैं, ऐसे राइट्स हैं 

981
01:13:58,240 --> 01:14:02,920
जिन्हें कोई छीन नहीं सकता। 
जैसे जीने का हक, आजाद रहने का 

982
01:14:02,920 --> 01:14:06,640
हक। 
और खुश रहने का हक जब भी लोग झंडे

983
01:14:06,640 --> 01:14:11,600
को सलाम करते हैं तो वो सबके लिए 
आजादी यानी लिबर्टी का वादा करते 

984
01:14:11,600 --> 01:14:14,560
हैं। 
वहाँ के राष्ट्रगान में भी देश को

985
01:14:14,720 --> 01:14:19,760
1000 लोगों की धरती कहा गया है। 
दुनिया के और भी कई देश आजादी को 

986
01:14:19,760 --> 01:14:23,240
सबसे जरूरी चीज़ मानते हैं। 
आजादी। 

987
01:14:23,800 --> 01:14:27,880
यानी लिबर्टी का सीधा सा मतलब यही
है कि मैं जो चाहूँ वो कर सकूँ 

988
01:14:28,360 --> 01:14:33,440
बशर्ते उससे आपकी आज़ादी में कोई 
खलक न पड़े, ये आपको कोई नुकसान न

989
01:14:33,440 --> 01:14:36,960
पहुंचे पर हमारा दिमाग बहुत चालक 
है। 

990
01:14:37,360 --> 01:14:41,960
हमारे दिमाग का प्रेस सेक्रेटरी 
दुनिया को चिल्ला चिल्लाकर बताता 

991
01:14:41,960 --> 01:14:45,560
रहता है कि। 
हमें आज़ादी बहुत पसंद है पर उसी 

992
01:14:45,560 --> 01:14:50,080
वक्त दिमा के दूसरे बहुत सारे 
हिस्से बिल्कुल उल्टा काम करते 

993
01:14:50,080 --> 01:14:54,360
हैं। 
सही गलत की हमारी ये सोच एक बहुत 

994
01:14:54,360 --> 01:14:58,280
बड़े राक्षस की तरह है। 
साइंस अभी तक ये पूरी तरह नहीं 

995
01:14:58,280 --> 01:14:59,720
समझा पाया है। 
की। 

996
01:14:59,720 --> 01:15:03,480
हम दूसरों को बहुत सारे काम करने 
से क्यों रोकना चाहते हैं? 

997
01:15:04,160 --> 01:15:08,440
दिमाग के ये छोटे छोटे हिस्से 
दूसरों को खास तरह की दवाएं लेने 

998
01:15:08,440 --> 01:15:13,400
से अपने शरीर के साथ कुछ भी करने 
से ये अपनी किडनी बेचने से रोकने 

999
01:15:13,400 --> 01:15:14,800
में लगे रहते। 
हैं। 

1000
01:15:15,440 --> 01:15:19,480
इसमें थोड़ी गलती हम दिमाग के 
डॉक्टरों यानी साइकोलॉजिस्ट की भी

1001
01:15:19,480 --> 01:15:22,080
है। 
हमें अभी तक ये नहीं पता कि 

1002
01:15:22,080 --> 01:15:26,520
दूसरों की बुराइ करने वाली ये सोच
आखिर पैदा कहाँ से होती? 

1003
01:15:26,520 --> 01:15:31,200
है। 
पर एक बात तो साफ है जो मैंने इस 

1004
01:15:31,280 --> 01:15:34,160
पूरी किताब में आपको समझाने की 
कोशिश की है। 

1005
01:15:34,560 --> 01:15:38,680
की आपके सिर के अंदर ये सारे 
हिस्से ये सारे सिस्टम्स अलग अलग 

1006
01:15:38,680 --> 01:15:42,000
काम कर रहे हैं। 
इसका मतलब ये है कि दिमाग का एक 

1007
01:15:42,000 --> 01:15:46,680
हिस्सा आजादी को बढ़ावा देने में 
यकीन रखता है तो दूसरा हिस्सा उसी

1008
01:15:46,680 --> 01:15:52,360
वक्त दूसरों की आजादी छीनने पर 
तुला होता है इस बंटे हुए दिमाग 

1009
01:15:52,360 --> 01:15:54,680
इस। 
मॉडुलर मैएंड के साथ तालमेल 

1010
01:15:54,680 --> 01:16:01,640
बिठाना ही सबसे बड़ी चुनौती है। 
हम इस दोगले पन इस इनकनसिस्टेंसी 

1011
01:16:01,640 --> 01:16:06,280
को चुपचाप मान सकते हैं हम कह 
सकते हैं कि हाँ, मैं आजादी की 

1012
01:16:06,280 --> 01:16:11,640
बातें तो करूँगा पर वो पैसा दूंगा
जिससे दूसरों की आजादी छीन जाए। 

1013
01:16:11,720 --> 01:16:15,080
अगर आपको हाइपोक्राइट कहलाने में 
कोई बुराइ नहीं लगती तो ये रास्ता

1014
01:16:15,080 --> 01:16:20,320
आपके लिए ठीक है। 
पर मेरा मानना ये है कि भले ही 

1015
01:16:20,320 --> 01:16:24,680
दोगलापन इंसान का नेचर है पर ये 
समाज के लिए अच्छा नहीं है। 

1016
01:16:25,840 --> 01:16:29,360
अगर लोग सिर्फ आज़ादी का ढोंग 
करेंगे और दूसरों पर पाबंदियां 

1017
01:16:29,360 --> 01:16:32,240
लगाएंगे। 
तो वे अपने अथॉरिटी का गलत 

1018
01:16:32,240 --> 01:16:37,120
इस्तेमाल करेंगे और रोज़ बनाने का
असली मकसद ही ये है कि हम अपनी 

1019
01:16:37,120 --> 01:16:41,320
ताकत की एक सीमा तय करें। 
अगर हम अपनी मर्जी से नियमों को 

1020
01:16:41,320 --> 01:16:45,720
तोड़ते रहेंगे तो हमारे बीच के 
समझौते खत्म हो जाएंगे। 

1021
01:16:46,600 --> 01:16:50,080
सही और गलत के हमारे फैसले असल 
में डंडे की तरह हैं। 

1022
01:16:50,800 --> 01:16:55,720
एक नियम बनाने का मतलब है ये कहना
कि जो ऐसा करेगा उसे सजा मिलेंगे।

1023
01:16:56,320 --> 01:17:01,440
खासतौर पर डेमोक्रेसी में जब हम 
सब एक ही बात कहते हैं तो हम एक 

1024
01:17:01,440 --> 01:17:06,240
ग्रुप बनकर अपने डंडे से दूसरों 
को रोकने की कोशिश करते हैं। 

1025
01:17:07,760 --> 01:17:10,080
कई बार ये डंडे चलाना सही होता 
है। 

1026
01:17:10,160 --> 01:17:13,920
जो दूसरों को नुकसान पहुंचाते 
हैं, उन्हें सज़ा मिलनी चाहिए। 

1027
01:17:14,560 --> 01:17:18,000
पर अगर हम इन डंडों का इस्तेमाल 
सिर्फ इसलिए करने लगे क्योंकि 

1028
01:17:18,000 --> 01:17:22,600
हमारे दिमाग के किसी हिस्से को 
किसी की कोई बात पसंद नहीं आई, 

1029
01:17:23,120 --> 01:17:27,480
चाहे वो उनके कपड़े हों या उनकी 
पसंद तो ये दूसरों को दबाना होगा।

1030
01:17:27,560 --> 01:17:30,760
मेरे हिसाब से। 
अगर कोई नियम हमारी आजादी के 

1031
01:17:30,760 --> 01:17:34,720
प्रिन्सिपल से मेल नहीं खाता तो 
उसे नहीं होना चाहिए। 

1032
01:17:36,160 --> 01:17:40,720
एक जैसा बने रहना मुश्किल है। 
बहुत से लोगों को सच में लगता है 

1033
01:17:41,400 --> 01:17:44,240
कि समाज में कुछ चीजें बिल्कुल 
नहीं होनी चाहिए। 

1034
01:17:45,000 --> 01:17:49,080
हमें नहीं पता कि हमारे अंदर ये 
हिस्से ये मॉडल्स क्यों हैं? 

1035
01:17:49,280 --> 01:17:55,440
पर ये हैं जैसा कि एक फेमस कवि ने
कहा था हम बहुत बड़े हैं। 

1036
01:17:55,720 --> 01:18:01,720
हमारे अंदर हजारों लोग बसते हैं। 
ये अलग अलग हिस्से हमें उलझन यानी

1037
01:18:01,720 --> 01:18:05,760
कॉनफ्लिक्ट में डालते हैं लेकिन 
ये हिस्से हमें फ्लेक्सबल भी 

1038
01:18:05,760 --> 01:18:09,240
बनाते हैं। 
हमें लचीला बनाते हैं, अलग अलग 

1039
01:18:09,240 --> 01:18:12,280
हालातों में दिमाग के अलग अलग 
हिस्से जीते हैं। 

1040
01:18:12,880 --> 01:18:17,560
अगर हमें इस अंदरूनी लड़ाई का पता
चल जाए तो हमें मौका मिलता है कि 

1041
01:18:17,560 --> 01:18:22,560
हम अपने सोच को बदल सकें। 
अक्सर हमारे अंदर का बुराइ करने 

1042
01:18:22,560 --> 01:18:26,320
वाला हिस्सा आजादी की सोच को हरा 
देता है। 

1043
01:18:26,440 --> 01:18:30,480
हमारी बातों और हमारे काम के बीच 
एक बहुत बड़ी है। 

1044
01:18:30,720 --> 01:18:37,000
मेरे हिसाब से एक ऐसी गड़बड़ी है,
एक ऐसी इनकनसिस्टेन्सी है जिससे 

1045
01:18:37,000 --> 01:18:41,840
अगर हम पीछा छुड़ा लें तो हम सब 
की ज़िन्दगी बेहतर हो जाएगी। 

1046
01:18:49,160 --> 01:18:54,040
इस बुक में बस इतना ही हम फिर 
मिलेंगे आपसे एक नए एपिसोड में एक

1047
01:18:54,040 --> 01:18:58,800
नई किताब के साथ मेरा नाम है 
रोहित और आप सुन रहे थे सिलेबस 

1048
01:18:59,000 --> 01:19:01,280
विथ रोहित धन्यवाद।
