1
00:00:03,400 --> 00:00:06,160
मैंने कई सालों में बहुत सी 
किताबें लिखी हैं। 

2
00:00:07,000 --> 00:00:11,600
इनमे मैंने एक खास बात कही है कि 
दिमाग एक कंप्यूटर की तरह काम 

3
00:00:11,600 --> 00:00:18,280
करता है जिसे हम सीटीएम कहते हैं।
मेरे हिसाब से सोचने का यह सबसे 

4
00:00:18,280 --> 00:00:22,720
अच्छा तरीका है। 
यही एक तरीका है जीस पर बात करना 

5
00:00:22,720 --> 00:00:26,600
जरूरी है। 
दिमाग के बारे में कुछ ऐसी बातें 

6
00:00:26,600 --> 00:00:30,280
हैं जिन्हें इसके बिना समझना 
इम्पॉसिबल है। 

7
00:00:31,360 --> 00:00:37,080
इसका मेन आइडिया बहुत सुंदर है। 
दिमाग में सूचना एक मशीनी काम की 

8
00:00:37,080 --> 00:00:40,520
तरह है। 
यह सच का एक बड़ा हिस्सा है। 

9
00:00:40,640 --> 00:00:44,280
पर मुझे नहीं लगा था कि कोई इसे 
ही पूरा सच मान लेगा। 

10
00:00:45,240 --> 00:00:47,880
कुछ लोग समझते हैं कि दिमाग बस 
इतना ही है। 

11
00:00:48,840 --> 00:00:52,880
मशीनी दिमाग यानी आर्टिफीसियल 
इन्टेलिजेन्स बनाने वाले ऐसा 

12
00:00:52,880 --> 00:00:57,600
सोचते हैं पर मशीनी दिमाग बनाना 
एक इंजीनियरिंग का काम है। 

13
00:00:57,800 --> 00:01:01,680
यह असली साइंस नहीं है। 
जब भी मैंने सीटी एम पर किताबें 

14
00:01:01,680 --> 00:01:04,840
लिखीं तो मैंने हमेशा एक बात साफ 
साफ कही। 

15
00:01:05,600 --> 00:01:08,880
यह पूरी कहानी का बस एक छोटा 
हिस्सा है। 

16
00:01:09,840 --> 00:01:13,240
सोचने के सबसे मुश्किल सवालों का 
जवाब इससे नहीं मिलता। 

17
00:01:13,960 --> 00:01:17,600
मुझे लगा कि हम सब इस बात पर राजी
हैं, एग्री हैं। 

18
00:01:18,200 --> 00:01:22,440
पर मैं गलत था। 
2 साल पहले मैंने दो नई किताबें 

19
00:01:22,440 --> 00:01:25,800
पढ़ीं, एक पिंकर की थी और एक 
प्लाटकिन की। 

20
00:01:26,640 --> 00:01:31,040
वे कहते हैं कि हमारा दिमाग मशीनी
है और हम बहुत सी जानकारी लेकर 

21
00:01:31,040 --> 00:01:35,040
पैदा होते हैं। 
वे इसे पुराने विकास के नियम यानी

22
00:01:35,280 --> 00:01:39,200
रेवोल्यूशन से जोड़तें हैं। 
उन्हें लगता है कि उन्होंने दिमाग

23
00:01:39,200 --> 00:01:44,240
का मैप दिमाग का नक्शा ढूंढ लिया।
मुझे उनकी किताबें अच्छी लगीं, पर

24
00:01:44,240 --> 00:01:49,320
मैं उनकी हर बात से खुश नहीं था। 
पहली बात तो यह है कि उन्होंने यह

25
00:01:49,320 --> 00:01:52,680
नहीं बताया कि सारी बातें आपस में
कैसे जुड़ती हैं। 

26
00:01:53,040 --> 00:01:56,320
दूसरी बात। 
एक और बड़े एक्स्पर्ट हैं 

27
00:01:56,320 --> 00:02:00,960
नोमचोंस्की वह भी इन लेखेकों की 
बातों से सहमत नहीं है। 

28
00:02:01,480 --> 00:02:05,200
तीसरी बात उन्होंने दिमाग को 
बायोलोजी से जोड़ा है। 

29
00:02:05,640 --> 00:02:11,280
मुझे यह बात कुछ खास जमीन नहीं। 
आखरी बात ये है कि पिंकर बहुत 

30
00:02:11,280 --> 00:02:15,520
ज्यादा ऑप्टिमिस्टिक हैं। 
पिछले 50 सालों में हमने एक बात 

31
00:02:15,520 --> 00:02:18,880
सीखी है। 
दिमाग के कुछ काम बहुत ही 

32
00:02:18,880 --> 00:02:21,160
कॉम्प्लेक्स हैं, बहुत उलझे हुए 
हैं। 

33
00:02:22,840 --> 00:02:25,600
कंप्यूटर वाले तरीके वहाँ बिल्कुल
काम नहीं करते। 

34
00:02:25,880 --> 00:02:30,480
यह बात सब जानते हैं, फिर भी कुछ 
लोग इतने खुश कैसे हो सकते हैं? 

35
00:02:31,160 --> 00:02:35,560
इसीलिए मैंने अपनी यह किताब लिखी।
मैं कुछ पुरानी बातों को आगे 

36
00:02:35,560 --> 00:02:39,080
बढ़ाना चाहता था। 
यह किताब पिंकर की किताब से छोटी 

37
00:02:39,080 --> 00:02:44,080
है और यह थोड़ी कड़वी भी है। 
मैं यहाँ सब कुछ शुरू से नहीं 

38
00:02:44,080 --> 00:02:47,240
समझाऊंगा मैं बस अपना एक अलग 
नजरिया दूंगा। 

39
00:02:48,000 --> 00:02:51,840
नतीजा यह है कि कंप्यूटर वाला 
तरीका अच्छा है, पर यह बुरा सच 

40
00:02:51,880 --> 00:02:55,760
नहीं है। 
मैंने जब लिखना शुरू किया तो मैं 

41
00:02:55,760 --> 00:02:59,560
परेशान हो गया। 
मैं सिर्फ पैदाइशी ज्ञान पर लिखना

42
00:02:59,560 --> 00:03:04,480
चाहता था नेटिविज्म पर, पर मुझे 
समझ आया कि सब कुछ आपस में जुड़ा 

43
00:03:04,480 --> 00:03:07,760
है। 
क्या दिमाग वाकई कंप्यूटर है? 

44
00:03:08,280 --> 00:03:13,560
हमें यह साफ करना होगा। 
50 साल पहले एक बड़ा काम शुरू हुआ

45
00:03:13,560 --> 00:03:17,560
था, एक बड़े आदमी थे, नाम था एलन 
ट्यूरिंग। 

46
00:03:18,280 --> 00:03:23,720
उन्होंने कहा कि सोचना एक लैंगुएज
की तरह है, जिसे छोटे शब्दों से 

47
00:03:23,720 --> 00:03:28,840
बड़े सेंटेंसेस बनते हैं, वैसे ही
छोटे विचारों से बड़ी सोच बनती 

48
00:03:28,840 --> 00:03:32,240
है। 
दिमाग में यह सब एक मशीन 

49
00:03:32,680 --> 00:03:37,520
कॉम्पटीशन की तरह होता है। 
मुझे लगता है कि यह बात काफी हद 

50
00:03:37,520 --> 00:03:41,160
तक सही है। 
हमारा सोचना किसी लैंगुएज की तरह 

51
00:03:41,160 --> 00:03:46,880
ही है, लेकिन सोच को सिर्फ मशीन 
मानना आंधी जीत है। 

52
00:03:47,040 --> 00:03:51,040
हाफ। 
पिछले 40 सालों में हमने नेचर से 

53
00:03:51,040 --> 00:03:54,280
बहुत सवाल पूछे, नेचर ने हमें 
जवाब भी दिए। 

54
00:03:54,600 --> 00:03:58,640
हमें समझ आया कि यह मशीनी तरीका 
कहाँ तक चलता है? 

55
00:03:59,960 --> 00:04:02,520
मैं आपको एक छोटी सी समरी बताता 
हूँ। 

56
00:04:03,440 --> 00:04:06,720
दिमाग के दो तरह के हिस्से होते 
हैं एक वो। 

57
00:04:07,040 --> 00:04:11,800
जहाँ हमारी इच्छाएं और यकीन होते 
हैं जहाँ हमारे बिलीव्स होते हैं 

58
00:04:12,400 --> 00:04:17,040
और दूसरे को जहाँ हमें महसूस होता
है, जहाँ हमारी फीलिंग्स होती है।

59
00:04:17,760 --> 00:04:23,000
ऐसे ही दिमाग के काम करने के दो 
तरीके हैं एक है लोकल और दूसरा है

60
00:04:23,000 --> 00:04:26,840
ग्लोबल लोकल काम छोटे और बटे हुए 
होते हैं। 

61
00:04:27,360 --> 00:04:29,480
ये काम कंप्यूटर की तरह ही होते 
हैं। 

62
00:04:29,640 --> 00:04:34,760
ये हमें पैदाइश में मिलते हैं, 
इनेट होते हैं, पर बड़े कामों का 

63
00:04:35,000 --> 00:04:39,840
हिसाब कुछ अलग है। 
दूसरी तरफ ग्लोबल बिल्कुल अलग है।

64
00:04:40,200 --> 00:04:45,200
ये हमारे छोटे कामो जैसा नहीं है।
इसीलिए हमें गहराई से समझ नहीं 

65
00:04:45,200 --> 00:04:48,720
आता। 
हमारे दिमाग की सबसे खास बातें 

66
00:04:49,120 --> 00:04:52,320
यही हैं, पर हमें इनके बारे में 
कुछ नहीं पता। 

67
00:04:52,680 --> 00:04:57,240
इसलिए मैं बहुत खुश नहीं हूँ। 
दिमाग का साइंस अभी बहुत पीछे है।

68
00:04:57,280 --> 00:05:02,760
इसे ठीक करने में बहुत समय लगेगा।
अभी हमारे पास सही औजार नहीं है, 

69
00:05:02,920 --> 00:05:07,960
जिसे योर नाम का गधा कहता है। 
की बर्फ़ गिर रही है और ठंड बहुत 

70
00:05:07,960 --> 00:05:10,920
है। 
शुक्र है कि अभी भूकंप नहीं आया। 

71
00:05:13,040 --> 00:05:18,320
बाकी के भूख में हम सबसे पहले 
पैदाइशी ज्ञान के बारे में 

72
00:05:18,320 --> 00:05:21,040
जाएंगे। 
पिंकर और प्लॉट्किन की सोच अलग 

73
00:05:21,040 --> 00:05:24,680
है, एक्सपर्ट्स की सोच उनसे काफी 
अलग है। 

74
00:05:24,800 --> 00:05:29,040
कभी कभी वे एक जैसे शब्द बोलते 
हैं पर उनका मतलब अलग होता है। 

75
00:05:29,520 --> 00:05:33,640
चमस्की नॉलेज मिलने की बात करते 
हैं, बाकी लोग सोचने के तरीके 

76
00:05:33,920 --> 00:05:38,560
यानी प्रोसेसेस की बात करते हैं। 
पुराने जानकार शायद ये बातें 

77
00:05:38,560 --> 00:05:43,440
जानते होंगे पर एक बहुत जरूरी बात
छूट रही है वह है ड्युरिंग का 

78
00:05:43,520 --> 00:05:47,240
मशीनी तरीका। 
इसके बिना कहानी एक दमदूरी है। 

79
00:05:47,840 --> 00:05:50,280
यह तो बिना दूल्हे की शादी जैसा 
है। 

80
00:05:51,200 --> 00:05:57,160
मैं इस जरूरी बात को वापस लाऊंगा।
इससे मुश्किलें तो थोड़ी बढ़ेगी 

81
00:05:57,160 --> 00:06:03,160
पर सच जानना ज्यादा जरूरी है। 
फिर आगे हम कमियों को देखेंगे। 

82
00:06:03,880 --> 00:06:08,640
उसके बाद कुछ पुराने रास्तों को 
देखेंगे और वे रास्ते सक्सेसफुल 

83
00:06:08,640 --> 00:06:10,240
नहीं हुए। 
ये समझेंगे। 

84
00:06:11,760 --> 00:06:16,640
उसके आगे एक नई सोच मॉड्यूलेरिटी 
आएगी, पर वह भी फैल हो गई। 

85
00:06:17,480 --> 00:06:20,600
फिर लास्ट में हम पुरानी कहानियों
पर बात करेंगे। 

86
00:06:21,640 --> 00:06:25,400
मुझे लगता है कि चमच के सही हो 
सकते हैं, पर उनकी बात अभी अधूरी 

87
00:06:25,400 --> 00:06:28,840
है। 
नया तरीका शायद गलत साबित हो जाए।

88
00:06:29,560 --> 00:06:31,840
दिमाग को समझना बिल्कुल आसान नहीं
है। 

89
00:06:31,840 --> 00:06:36,880
मैंने पहले भी यही कहा था, मेरी 
सोच सालों से बदले नहीं है। 

90
00:06:37,040 --> 00:06:41,400
मैं बस सही रास्ता ढूंढ रहा हूँ। 
चलिए अब शुरू करते हैं। 

91
00:06:42,680 --> 00:06:51,160
मेरा नाम है रोहित और आप सुन रहे 
हैं सिलेबस विथ रोहित आजकल की नई 

92
00:06:51,160 --> 00:06:56,240
सोच चमस्की से शुरू हुई चमस्की ने
दो बहुत जरूरी बातें कहीं। 

93
00:06:56,400 --> 00:07:00,360
पहली बात, हर लैंग्वेज के कुछ 
पक्के नियम होते हैं। 

94
00:07:00,520 --> 00:07:02,680
ये नियम पूरी दुनिया में एक जैसे 
हैं। 

95
00:07:03,240 --> 00:07:07,520
दूसरी बात, ये नियम हमारे दिमाग 
में पहले से हैं। 

96
00:07:08,320 --> 00:07:10,880
हम इन्हें अपने साथ लेकर पैदा 
होते हैं। 

97
00:07:11,400 --> 00:07:14,000
ये हमारे शरीर की बनावट में छिपा 
है। 

98
00:07:14,960 --> 00:07:17,280
चोम्स्की ने इसे दो तरीकों से 
समझाया। 

99
00:07:17,280 --> 00:07:20,600
पहला दुनिया की सारी भाषाओं को 
देखिए। 

100
00:07:20,640 --> 00:07:24,880
सारी लैंग्वेजेज को देखिए कि 
उनमें क्या क्या एक जैसा है। 

101
00:07:25,600 --> 00:07:28,840
जो चीज़ सब में एक जैसी है, वही 
असली नियम है। 

102
00:07:29,080 --> 00:07:33,640
दूसरा यह देखिए कि बच्चे बोलना 
कैसे सीखते हैं? 

103
00:07:33,640 --> 00:07:36,360
आसपास के लोग तो बहुत कम सिखाते 
हैं। 

104
00:07:36,520 --> 00:07:39,080
फिर भी बच्चा बहुत जल्दी सब सीख 
जाता है। 

105
00:07:39,160 --> 00:07:42,920
मतलब बहुत सी जानकारी उसके अंदर 
पहले से थी। 

106
00:07:43,360 --> 00:07:49,040
यही पैदाइशी ज्ञान यानी इनेट 
नॉलेज उसे बोलना सीखाता है। 

107
00:07:49,760 --> 00:07:52,800
इसीलिए इंसान और जानवर में फर्क 
होता है। 

108
00:07:53,200 --> 00:07:56,120
इंसान का बच्चा लैंगुएज आसानी से 
सीख लेता है। 

109
00:07:56,560 --> 00:07:59,360
पर बंदर या दूसरे जानवर ऐसा नहीं 
कर पाते। 

110
00:08:00,240 --> 00:08:04,840
यह सुनने में बहुत सीधा और आसान 
लगता है पर इसे साबित करना बहुत 

111
00:08:05,280 --> 00:08:10,360
डिफिकल्ट बहुत मुश्किल काम है। 
साइंटिस्टों को रिसर्च के लिए 

112
00:08:10,360 --> 00:08:13,960
पैसा नहीं मिलता। 
एक्सपर्ट लोग आपस में बहुत झगड़ते

113
00:08:13,960 --> 00:08:17,560
भी हैं। 
कोई कहता है कि लैंगुएज समाज से 

114
00:08:17,560 --> 00:08:20,720
आती है। 
सोसाइटी से कोई कहता है कि यह 

115
00:08:20,720 --> 00:08:28,320
जरूरत से आती है या नीड से आती है
पर अपनी बात पर अड़े रहे की यह 

116
00:08:28,320 --> 00:08:31,760
बात बहुत पुरानी है। 
पुराने जमाने के प्लेटों भी यही 

117
00:08:31,760 --> 00:08:35,200
कहते थे। 
जैसे हम ज्योमैट्री के बारे में 

118
00:08:35,200 --> 00:08:39,280
पहले से जानते हैं, वैसे ही हम 
लैंगुएज के नियम भी जानते हैं। 

119
00:08:39,640 --> 00:08:44,120
चोम्स्की बस पुरानी बातों को एक 
नए तरीके से कह रहे हैं। 

120
00:08:46,160 --> 00:08:48,560
वो पिंकर और प्लाटकिन की बात करते
हैं। 

121
00:08:48,920 --> 00:08:52,040
ये लोग चोम्स्की से थोड़ा अलग 
सोचते हैं। 

122
00:08:52,200 --> 00:08:56,480
चोम्स्की कहते हैं कि हम जानकारी 
लेकर पैदा होते हैं पर ये लोग 

123
00:08:56,600 --> 00:09:01,520
दिमाग के काम पर ध्यान देते हैं। 
इनका मेन ऐडिया कंप्यूटर से जुड़ी

124
00:09:01,520 --> 00:09:04,560
है। 
इसे हम कंप्यूटर वाला तरीका या 

125
00:09:04,720 --> 00:09:10,320
कॉम्प्यूटेशन कह सकते हैं। 
इसे ने शुरू किया था दिमाग को एक 

126
00:09:10,400 --> 00:09:19,160
मशीन की तरह समझना ही। 
ये नई सोच है कॉम्पिटिशन एक 

127
00:09:19,160 --> 00:09:23,800
मजेदार बात पर ध्यान दीजिए अगर 
मैं कहूं, शिव पढ़ रहा है और शाम 

128
00:09:23,800 --> 00:09:27,000
हो गई है इस एक वाक्य में दो 
बातें हैं। 

129
00:09:27,320 --> 00:09:32,000
अगर यह पूरा वाक्य सच है तो इसका 
मतलब है कि शिव पढ़ रहा है भी। 

130
00:09:32,080 --> 00:09:36,320
सच है, इसे समझने के लिए शिव को 
जानना जरूरी नहीं। 

131
00:09:36,400 --> 00:09:39,120
बस शब्दों की सेट्टिंग देखनी 
पड़ती है। 

132
00:09:39,440 --> 00:09:45,640
यही टूरिंग की सबसे बड़ी खोज थी 
मशीनें मतलब नहीं समझती। 

133
00:09:45,960 --> 00:09:50,320
वे दुनिया के बारे में कुछ नहीं 
जानती पर वे शब्दों के ढांचे को। 

134
00:09:50,520 --> 00:09:55,280
उनके सिंटेक्स को समझ सकती हैं। 
वे बहुत तेजी से ये हिसाब किताब 

135
00:09:55,280 --> 00:09:59,280
कर सकती हैं। 
नई सोच कहती है कि दिमाग भी ऐसा 

136
00:09:59,280 --> 00:10:02,640
ही है। 
सोचना असल में एक मशीन का एक 

137
00:10:02,920 --> 00:10:07,080
कॉम्पिटिशन है। 
हमारा दिमाग सच को सच से जोड़ता 

138
00:10:07,080 --> 00:10:10,280
रहता है। 
यह एक बढ़िया सौदा लगता है। 

139
00:10:12,600 --> 00:10:19,360
फिर है रेशनलिस्ट साइकोलॉजी पैदा 
होते ही हमें कुछ तरीके पता होते 

140
00:10:19,360 --> 00:10:22,360
हैं। 
दिमाग के पास सोचने के कुछ खास 

141
00:10:22,400 --> 00:10:28,000
टूल्स हैं, कुछ खास औजार यौजर 
हमें इनहेरिटेंस में मिले हैं, 

142
00:10:28,120 --> 00:10:33,080
हमें विरासत में मिले हैं। 
पुराने एक्सपर्ट भी यही बात मानते

143
00:10:33,080 --> 00:10:36,880
थे। 
दिमाग के अंदर कुछ मेकेनिज़्म्स 

144
00:10:36,880 --> 00:10:41,800
लगी हैं, कुछ कुदरती मशीनें लगी 
हैं, वे जानकारी का सही इस्तेमाल 

145
00:10:41,800 --> 00:10:46,520
करना जानती हैं। 
इस सोच की सबसे बड़ी बात को समझिए

146
00:10:46,640 --> 00:10:52,200
कि हमारी हर पसंद ना पसंद। 
और सोच का एक ढांचा एक स्ट्रक्चर 

147
00:10:52,200 --> 00:10:56,360
होता है। 
इसी ढांचे से इसी स्ट्रक्चर से तय

148
00:10:56,360 --> 00:10:58,720
होता है कि दिमाग आ के क्या 
करेगा? 

149
00:10:59,200 --> 00:11:05,240
एग्ज़ैम्पल के तौर पर मान लीजिए 
रोहन तैर रहा है और सीमा पी रही 

150
00:11:05,240 --> 00:11:08,840
है। 
यहाँ और यानी एंड दो बातों को 

151
00:11:08,840 --> 00:11:12,120
जोड़ रहा है। 
इसलिए आप जड़ से समझ जाते हैं कि 

152
00:11:12,120 --> 00:11:17,720
रोहन तैर रहा है एक और एग्ज़ैम्पल
समझिए भूत जैसी कोई चीज़ नहीं 

153
00:11:17,720 --> 00:11:22,920
होती, यह मना करने वाली बात है। 
नेगेटिव इसलिए आप समझ जाती हैं की

154
00:11:22,920 --> 00:11:26,040
आपका दोस्त भूत नहीं है तो आसान 
बात ये है। 

155
00:11:26,840 --> 00:11:30,240
की दिमाग की हर बात का एक खास 
फॉर्म होता है। 

156
00:11:30,320 --> 00:11:33,600
एक खास रूप और उसी फॉर्म के हिसाब
से। 

157
00:11:33,600 --> 00:11:37,320
उसी रूप के हिसाब से दिमाग काम 
करता है। 

158
00:11:38,840 --> 00:11:43,120
यहाँ कुछ और जरूरी बातें भी हैं। 
हर सोच का अपना एक। 

159
00:11:43,280 --> 00:11:46,840
पक्का स्ट्रक्चर होता है। 
अगर दो बातों का स्ट्रक्चर अलग है

160
00:11:47,040 --> 00:11:51,400
तो वे अलग है, चाहे उनका मतलब 
उनके मीनिंग एक जैसा ही क्यों न 

161
00:11:51,400 --> 00:11:56,560
हो। 
अलग अलग बातों का ढांचा एक जैसा 

162
00:11:56,560 --> 00:12:01,040
हो सकता है, जिसे सांता क्लॉज 
नहीं होता और परियां नहीं होती। 

163
00:12:01,480 --> 00:12:05,560
ये दोनों बातें अलग हैं पर इनका 
ढांचा इनका स्ट्रक्चर एक ही है। 

164
00:12:06,600 --> 00:12:09,480
हमारी हर सोच कई टुकड़ों से मिलकर
बनती है। 

165
00:12:09,480 --> 00:12:15,480
जैसे आकाश गंजा है, इसमें एक 
हिस्सा आकाश है और दूसरा गंजा। 

166
00:12:16,240 --> 00:12:18,680
इन्हीं टुकड़ों को हम कॉन्सेप्टस 
कहते हैं। 

167
00:12:18,720 --> 00:12:23,160
ख्याल। 
कुछ लोग कहते हैं कि सोचना बस 

168
00:12:23,160 --> 00:12:27,840
पुरानी यादों का जूना है। 
जैसे चाय भूनने पर बिस्कुट याद आ 

169
00:12:27,840 --> 00:12:32,520
जाना, पर हमारी ये सोच सिर्फ ऐसी 
असोसिएशन पर नहीं। 

170
00:12:32,520 --> 00:12:38,160
टिक्की यह नियमों और स्ट्रक्चर्स 
पर चलती है, तभी तो हम किसी 

171
00:12:38,160 --> 00:12:40,880
पुरानी बात पर अपना फैसला बदल 
सकते हैं। 

172
00:12:41,000 --> 00:12:46,120
जैसे मुझे पक्का यकीन है कि रोहन 
गंजा है पर आपको शायद थोड़ा सा ही

173
00:12:46,120 --> 00:12:49,360
शक है। 
मुझे इस बात से बहुत फर्क पड़ता 

174
00:12:49,360 --> 00:12:53,680
है, पर आपको नहीं, फिर भी हम 
दोनों की सोच का फॉर्म हम दोनों 

175
00:12:53,680 --> 00:12:58,720
की सोच का ढाँचा बिल्कुल एक है। 
आदते अलग हो सकती हैं पर दिमाग का

176
00:12:58,720 --> 00:13:04,240
नियम एक ही रहता है। 
अब सवाल है कि यह ढांचा काम कैसे 

177
00:13:04,240 --> 00:13:07,880
करता है? 
पुराने एक्सपर्ट इस बात को ठीक से

178
00:13:07,880 --> 00:13:11,760
नहीं समझा पाए पर कंप्यूटर के आने
से यह आसान हो गया। 

179
00:13:12,360 --> 00:13:16,600
दिमाग में हर सोच के लिए एक 
रिप्रजेंटेशन होती है एक निशानी 

180
00:13:17,320 --> 00:13:21,400
यह निशानी दिमाग में किसी। 
असली चीज़ की तरह होती है। 

181
00:13:22,280 --> 00:13:25,720
ये निशानी हमारे दिमाग में हलचल 
पैदा करती है। 

182
00:13:26,440 --> 00:13:29,960
कंप्यूटर की तरह हमारा दिमाग भी 
निशाने को पढ़ता है। 

183
00:13:30,240 --> 00:13:35,680
वह मतलब नहीं देखता, बस सिनटैक 
यानी ढांचे को देखता है जैसे 

184
00:13:35,680 --> 00:13:38,120
कंप्यूटर को जीरो और वॅन समझ आता 
है। 

185
00:13:38,240 --> 00:13:43,080
वैसे ही दिमाग भी रीप्रेजेंटेशन 
यानी निशानी के हिसाब से काम करता

186
00:13:43,080 --> 00:13:48,960
है। 
पुरानी सोच कहती है कि सब कुछ 

187
00:13:48,960 --> 00:13:54,640
आदतों का खेल है जैसे बार बार साथ
होने से बातें जुड़ जाती हैं। 

188
00:13:55,480 --> 00:13:58,880
ने हमें एक नया मेकानिज्म दिखाया।
एक नया रास्ता। 

189
00:13:59,480 --> 00:14:02,600
उन्होंने बताया कि मशीन भी नियमों
को समझ सकती है। 

190
00:14:03,320 --> 00:14:06,120
हमारा दिमाग भी इसी तरह नियमों पर
चलता है। 

191
00:14:06,560 --> 00:14:12,640
दिमाग की सबसे बड़ी खूबी यही है 
एक सच हमें दूसरे सच तक ले जाता 

192
00:14:12,640 --> 00:14:15,400
है। 
पर यह कोई जादू नहीं है बल्कि 

193
00:14:15,400 --> 00:14:19,960
दिमाग का हिसाब किताब है। 
उसका कम्प्यूटेशन है, यही वह पहली

194
00:14:19,960 --> 00:14:23,040
है जिसे हम सुलझाने की कोशिश कर 
रहे हैं। 

195
00:14:24,920 --> 00:14:28,360
अब हम पुराने सोच और कंप्यूटर के 
काम को मिलाते हैं। 

196
00:14:30,160 --> 00:14:34,200
इसको दिमाग का कंप्यूटर वाला 
तरीका यानी कम्प्यूटेशनल थ्योरी 

197
00:14:34,200 --> 00:14:38,240
ऑफ माइंड कहते हैं। 
इसके तीन मेन प्रिंसिपल्स हैं। 

198
00:14:38,680 --> 00:14:44,760
पहला, हमारी सोच अपने ढांचे की 
अपने लॉजिकल फर्म की वजह से काम 

199
00:14:44,760 --> 00:14:48,920
करती है। 
सोच का ढांचा दिमाग के निशानी 

200
00:14:48,920 --> 00:14:52,440
यानी। 
दिमाग के रिप्रजेंटेशन पर टिका है

201
00:14:52,840 --> 00:14:58,680
और तीसरा सोचना असल में एक 
कंप्यूटेशन है, एक मशीनी हिसाब 

202
00:14:58,680 --> 00:15:02,600
है। 
यह तरीका हमें हमेशा सच की तरफ ले

203
00:15:02,600 --> 00:15:06,920
जाता है। 
इस मेल से हमें दो बड़े सवालों के

204
00:15:06,920 --> 00:15:11,200
जवाब मिलते हैं। 
सोच का ढांचा यानी फॉर्म कैसे 

205
00:15:11,200 --> 00:15:15,640
बनता है और यह ढांचा हमारे दिमाग 
पर कैसे असर डालता है? 

206
00:15:15,760 --> 00:15:21,440
जवाब है दिमाग की लिखावट। 
उसका सिंटेक्स ही ढांचा तय करती 

207
00:15:21,440 --> 00:15:25,920
है और यही लिखावट तय करती है कि 
दिमाग आगे क्या करेगा। 

208
00:15:27,400 --> 00:15:31,800
अब हम कह सकते हैं कि सोचना 
समझदारी भरा काम है, पर यह एक 

209
00:15:31,800 --> 00:15:35,960
मशीन की तरह भी है। 
यह पहली बार हुआ है कि किसी ने 

210
00:15:35,960 --> 00:15:41,280
ऐसी मशीन के बारे में बताया जो 
समझदारी यानी रैशनलिटी से काम 

211
00:15:41,280 --> 00:15:44,400
करती है। 
यह सच में एक बहुत ही प्यारा 

212
00:15:44,400 --> 00:15:49,800
ख्याल है, बहुत ही सुंदर आइडिया। 
अब हमारे पास नई सोच की आंधी 

213
00:15:49,800 --> 00:15:54,360
कहानी तैयार है। 
हम बहुत कुछ बचपन से ही जानते हैं

214
00:15:54,400 --> 00:15:57,680
और हमारा दिमाग एक मशीनी ढांचे 
जैसा बना है। 

215
00:15:57,680 --> 00:16:03,320
एक मशीनी आर्किटेक्चर जैसा इसे ही
नई सोच यानी न्यू सिन्थेसिस कहते 

216
00:16:03,320 --> 00:16:09,000
हैं, लेकिन बहुत से लोग इसे एक। 
मॉडुलर एक बंटा हुआ डिब्बा मानती 

217
00:16:09,000 --> 00:16:14,120
हैं, वे इसे पुराने इवोल्यूशन 
पुराने विकास से जोड़तें हैं। 

218
00:16:16,080 --> 00:16:19,840
मुझे लगता है कि इस सोच में कुछ 
बड़ी गलतियाँ है, पर उन गलतियों 

219
00:16:19,840 --> 00:16:24,160
की बात हम बाद में करेंगे। 
अभी हम दिमाग के लिखावट यानी 

220
00:16:24,240 --> 00:16:28,680
सिनटक्स के बारे में जायेंगे। 
ये लिखावट ही दिमाग की सबसे बड़ी 

221
00:16:28,680 --> 00:16:33,720
ताकत है। 
तो आखिर ये लिखावट यह सिंटेक्स 

222
00:16:33,880 --> 00:16:38,160
क्या है? 
देखिए ये लिखावट बड़ी अजीब होती 

223
00:16:38,160 --> 00:16:40,640
है। 
ये सब शब्दों की अंदरूनी सेट्टिंग

224
00:16:40,640 --> 00:16:43,520
है। 
उनकी लोकल प्रॉपर्टी है। 

225
00:16:44,040 --> 00:16:47,880
जैसे किसी शब्द की स्पेलिंग को 
देखना इसके लिए आपको बाहर देखने 

226
00:16:47,880 --> 00:16:51,640
की जरूरत नहीं है। 
पर ये लिखावट बाहर की बातों पर भी

227
00:16:51,640 --> 00:16:55,960
असर डालती है। 
यह अंदर और बाहर दोनों तरफ एक साथ

228
00:16:55,960 --> 00:17:02,800
देखती है, जैसे शिव तैरता है, 
यहाँ शिव नाम है और तैरनायक काम 

229
00:17:02,800 --> 00:17:05,520
है। 
ये इस वाक्य की अपनी सेट्टिंग है 

230
00:17:05,520 --> 00:17:09,960
इसका सिंटेक्स है। 
पर इसी सेट्टिंग से हमें पता चलता

231
00:17:09,960 --> 00:17:13,240
है कि सवाल क्या होगा जैसे कौन 
तैरता है? 

232
00:17:13,800 --> 00:17:18,119
अगर कोई मशीन इस सेट्टिंग को समझ 
ले तो वो खुद बता देगी की सही 

233
00:17:18,119 --> 00:17:22,440
सवाल क्या है? 
यही बात तर्क यानी लॉजिक पर भी 

234
00:17:22,440 --> 00:17:27,160
लागू होती है। 
अगर शिव तैरता है यह बात सच है तो

235
00:17:27,160 --> 00:17:29,880
इसका मतलब है कि कोई तो तैर रहा 
है। 

236
00:17:29,960 --> 00:17:33,320
मशीन इस लिखावट को देखकर ही 
रिसाल्ट निकाल लेती है। 

237
00:17:33,760 --> 00:17:36,760
उसे दुनिया की जानकारी होने की 
जरूरत नहीं है। 

238
00:17:37,480 --> 00:17:40,760
इसे एक मछली की कहानी से भी समझ 
सकते हैं। 

239
00:17:41,360 --> 00:17:47,720
एक खास मछली होती है। 
स्टिकल बेक जब मेल मछली जोश में 

240
00:17:47,720 --> 00:17:50,760
होती है तो उसके पेट पर लाल निशान
आ जाता है। 

241
00:17:51,160 --> 00:17:55,240
दूसरे मेल मछली इस लाल निशान को 
देखकर गुस्सा दिखाते हैं। 

242
00:17:55,840 --> 00:18:00,800
मछली का जोश में होना एक अंदरूनी 
स्टेट है एक अंदरूनी बात है। 

243
00:18:01,080 --> 00:18:03,920
पर पेट का लाल निशान एक बाहरी 
निशानी है। 

244
00:18:03,920 --> 00:18:09,000
एक लोकल प्रॉपर्टी है, दूसरी 
मछलियां उस निशान को देखकर समझ 

245
00:18:09,000 --> 00:18:13,560
जाती हैं कि मामला क्या है? 
वह निशान को देखती है और गुस्से 

246
00:18:13,560 --> 00:18:18,320
को समझ लेती है पर मछली और सोच 
में एक बड़ा फर्क है। 

247
00:18:18,400 --> 00:18:20,960
मछली का रंग बदलने से मछली नहीं 
बदलती। 

248
00:18:21,800 --> 00:18:26,640
पर अगर सोच की लिखावट उसका सिनटैक
बदल दिया जाए तो वह सोच ही बदल 

249
00:18:26,640 --> 00:18:30,600
जाती है। 
बिना शिव के शिव गंजा है वाली सोच

250
00:18:30,600 --> 00:18:38,120
नहीं रह सकती तो हमने क्या सीखा? 
हम बहुत सी बातें बचपन से जानते 

251
00:18:38,120 --> 00:18:41,320
हैं। 
दिमाग का अपना एक मशीनी ढांचा 

252
00:18:41,320 --> 00:18:47,280
होता है एक मशीनी सिंटेक्स और 
सोचना असल में एक कम्प्यूटेशन है 

253
00:18:47,280 --> 00:18:53,800
एक मशीनी हिसाब किताब ड्युरिंग और
की बातें तो बस आंधी कहानी है 

254
00:18:54,440 --> 00:18:58,640
बाकी आंधी कहानी दिमाग के अलग अलग
हिस्सों यानी मॉडल्स की है। 

255
00:18:59,720 --> 00:19:02,920
कुछ लोग कहते हैं कि दिमाग छोटे 
छोटे डिब्बों जैसा है। 

256
00:19:03,120 --> 00:19:07,520
छोटे छोटे मॉड्यूल्स जैसा वो यह 
भी कहते हैं कि यह सब इवोल्यूशन 

257
00:19:07,520 --> 00:19:12,960
की देन है, हम देखेंगे कि दिमाग 
को कंप्यूटर मानना कहाँ गलत है। 

258
00:19:13,880 --> 00:19:17,280
कंप्यूटर वाला तरीका सिर्फ छोटे 
हिस्सों में है, सिर्फ। 

259
00:19:17,440 --> 00:19:22,000
मॉड्यूल्स में काम करता है। 
बड़े और खुले कामों में यह तरीका 

260
00:19:22,000 --> 00:19:25,600
फैल हो जाता है। 
यही इस पूरे साइंस की सबसे बड़ी 

261
00:19:25,600 --> 00:19:30,360
कमी है। 
हमने पहले सीखा था कि लिखावट यानी

262
00:19:30,360 --> 00:19:35,040
सिनटैक बहुत जरूरी है। 
अगर आप लिखावट बदल दें तो थॉट बदल

263
00:19:35,040 --> 00:19:38,600
जाएगी। 
यहाँ एक नियम काम करता है सिर्फ 

264
00:19:39,000 --> 00:19:43,440
एसेंशियल प्रॉपर्टीस, सिर्फ पक्की
खूबियाँ ही दिमाग पर असर डालती 

265
00:19:43,440 --> 00:19:46,560
हैं। 
लिखावट यानी सिंटेक्स एक पक्की 

266
00:19:46,560 --> 00:19:50,760
खूबी है जो कभी नहीं बदलती। 
चाहे माहौल चाहे कॉन्टेक्स्ट कुछ 

267
00:19:50,760 --> 00:19:55,720
भी हो, लिखावट वही रहती है। 
कंप्यूटर भी सिर्फ इसी लिखावट को 

268
00:19:55,720 --> 00:20:00,520
देख कर काम करता है पर असली 
मुश्किल यहीं से शुरू होती है। 

269
00:20:01,760 --> 00:20:06,600
हमारी सोच कॉन्टेक्स्ट पर टिक्की 
होती है पर कंप्यूटर तो 

270
00:20:06,600 --> 00:20:14,040
कॉन्टेक्स्ट को समझ ही नहीं सकता।
सिम्प्लेसिटी को एक एग्ज़ैम्पल की

271
00:20:14,040 --> 00:20:17,560
तरह देखिए। 
इंसान हमेशा आसान बात या आसान 

272
00:20:17,560 --> 00:20:22,280
रास्ता चुनता है, यही हमारी 
इन्टेलिजेन्स की निशानी है, पर 

273
00:20:22,280 --> 00:20:24,800
कंप्यूटर के लिए आसान का क्या 
मतलब है? 

274
00:20:25,360 --> 00:20:28,480
शायद वो सोचे की शार्ट 
सेन्टेन्सेस आसान है। 

275
00:20:28,560 --> 00:20:31,840
इसे बिल्ली कंप्यूटर पर है, छोटा 
और आसान है। 

276
00:20:32,520 --> 00:20:37,280
और बिल्ली कंप्यूटर पर सो रही है।
थोड़ा बड़ा है परसल जिंदगी में 

277
00:20:37,280 --> 00:20:39,400
आसान होना कॉन्टेक्स्ट पर टिका 
है। 

278
00:20:39,680 --> 00:20:43,240
एक ही बात कहीं आसान होती है तो 
कहीं बहुत मुश्किल। 

279
00:20:44,360 --> 00:20:48,800
एक और एग्ज़ैम्पल लीजिए, मान 
लीजिए आप कल नाव चलाना चाहते हैं 

280
00:20:49,120 --> 00:20:51,640
तभी आपको पता चला कि कल हवा नहीं 
चलेगी। 

281
00:20:52,520 --> 00:20:54,800
यह बात आपके पूरे प्लान को बिगाड़
देगी। 

282
00:20:55,400 --> 00:20:59,560
अब आपको अपना सफर बहुत मुश्किल 
लगेगा, लेकिन अगर आप कार से जा 

283
00:20:59,560 --> 00:21:03,560
रहे हैं तो हवा नहीं चलेगी वाली 
बात से कोई फर्क नहीं पड़ेगा। 

284
00:21:03,600 --> 00:21:06,640
आपका प्लान अभी भी बहुत आसान 
रहेगा। 

285
00:21:07,520 --> 00:21:10,320
खूब ध्यान दीजिए, बात तो एक ही 
है। 

286
00:21:10,800 --> 00:21:14,440
लिखावट भी बिल्कुल एक ही जैसी है।
यानी सिन्टेक्स भी बिल्कुल एक ही 

287
00:21:14,440 --> 00:21:19,200
जैसा है पर अलग अलग कॉन्टेक्स्ट 
में अलग अलग प्लान में उसका असर 

288
00:21:19,200 --> 00:21:22,240
अलग हुआ। 
एक जगह उसने काम बढ़ा दिया। 

289
00:21:22,240 --> 00:21:27,200
दूसरी जगह कोई असर नहीं। 
कंप्यूटर सिर्फ शब्दों की बनावट 

290
00:21:27,200 --> 00:21:29,720
देखता है, उनका सिन्टेक्स देखता 
है। 

291
00:21:29,880 --> 00:21:34,120
वह यह नहीं देख पाता की बात किस 
माहौल में कही गई है। 

292
00:21:34,560 --> 00:21:39,880
इसीलिए सोच की सादगी, उसकी 
सिम्प्लिसिटी को सिर्फ लिखावट से 

293
00:21:39,880 --> 00:21:44,000
नहीं नापा जा सकता। 
यही वजह है कि दिमाग को कंप्यूटर 

294
00:21:44,000 --> 00:21:50,160
मानना एक अधूरी बात है। 
मशीन शब्दों की बनावट देखकर काम 

295
00:21:50,160 --> 00:21:53,160
करती है। 
मशीन शब्दों के सेन्टेक्स देखकर 

296
00:21:53,160 --> 00:21:57,000
काम करती है। 
यह लॉजिक वाले काम के लिए बहुत 

297
00:21:57,000 --> 00:22:01,000
बढ़िया है पर कुछ बातें पूरे 
सिस्टम पर टिक्की होती हैं। 

298
00:22:01,000 --> 00:22:06,880
इसे ग्लोबल या बड़ी सोच कहते हैं 
यहाँ कंप्यूटर वाला तरीका। 

299
00:22:07,000 --> 00:22:10,840
थोड़ा फंस जाता है। 
यहाँ एक ही बात का मतलब 

300
00:22:11,040 --> 00:22:16,400
कॉन्टेक्स्ट के हिसाब से उसके 
माहौल के हिसाब से बदलता है और 

301
00:22:16,400 --> 00:22:19,160
कंप्यूटर तो कॉन्टेक्स्ट को समझ 
ही नहीं पाता। 

302
00:22:23,040 --> 00:22:26,840
पहली नजर में लगता है कि सूचना और
कंप्यूटर का काम अलग है। 

303
00:22:27,080 --> 00:22:32,440
पर यहाँ एक बारीक बात छिपी है। 
दिमाग एक कंप्यूटर है इस बात के 

304
00:22:32,440 --> 00:22:38,480
दो मतलब हो सकते हैं पहला है 
पक्का तरीका यह कहता है कि दिमाग 

305
00:22:38,480 --> 00:22:43,720
सिर्फ लोकल सेन्टेक्स सिर्फ 
अंदरूनी बनावट दिखता है यानी 

306
00:22:43,720 --> 00:22:47,160
सिर्फ वो हिस्सा। 
जो सेख थॉट के अंदर है, उस एक 

307
00:22:47,320 --> 00:22:53,240
ख्याल के अंदर है, पर जैसा हमने 
देखा, इससे ग्लोबेलिटी यानी बड़ी 

308
00:22:53,240 --> 00:22:59,080
सोच समझ नहीं आती। 
दूसरा है ढीला तरीका यह कहता है 

309
00:22:59,080 --> 00:23:02,280
की दिमाग किसी भी तरह की बनावट 
देख सकता है। 

310
00:23:02,360 --> 00:23:05,400
चाहे वो अंदर की हो या बाहर की 
कॉन्टेक्स्ट की। 

311
00:23:06,240 --> 00:23:11,080
इसमें सिम्प्लिसिटी भी इसमें 
सादगी भी एक नियम हो सकती है। 

312
00:23:11,360 --> 00:23:15,480
बस शर्त ये है कि दिमाग उससे एक 
मशीन की तरह पड़ सके। 

313
00:23:16,360 --> 00:23:20,520
अगर ये ढीला तरीका सही है तो बात 
बन सकती है। 

314
00:23:20,680 --> 00:23:25,880
तो हम कह सकते हैं कि बड़ी सोच भी
एक तरह का कंप्यूटर ही है, लेकिन 

315
00:23:26,240 --> 00:23:29,000
यहीं पर असली गड़बड़ शुरू होती 
है। 

316
00:23:32,720 --> 00:23:37,280
मशीन को सचमुच देखने के लिए सब 
कुछ एक साथ मिलाना होगा। 

317
00:23:37,960 --> 00:23:43,120
मान लीजिए एक छोटी सी बात आहार। 
पूरे सिस्टम टी से जुड़ी है। 

318
00:23:43,840 --> 00:23:48,160
मशीन की उस बात का असर समझने के 
लिए पूरा सिस्टम पढ़ना पड़ेगा। 

319
00:23:48,720 --> 00:23:54,360
उसे पूरी जानकारी को एक लंबा 
सेन्टेन्स बनाना होगा तभी वह उसे 

320
00:23:54,360 --> 00:23:57,880
देख पाएगी। 
पर ऐसा ज़िन्दगी में हमारा दिमाग 

321
00:23:57,880 --> 00:24:01,920
ऐसे काम नहीं करता। 
हमारा पूरा ज्ञान हमारा पूरा 

322
00:24:01,920 --> 00:24:07,240
बिलीफ सिस्टम बहुत ही ज्यादा बड़ा
है, इतना बड़ा की उसे हर बार पूरा

323
00:24:07,240 --> 00:24:12,000
पढ़ना मुमकिन नहीं। 
एक एग्ज़ैम्पल लीजिए, मान लीजिए 

324
00:24:12,000 --> 00:24:14,960
बाहर बादल है और आपको छाता लेना 
है। 

325
00:24:15,320 --> 00:24:18,440
आप आसमान देखेंगे और बादल देख कर 
फैसला लेंगे। 

326
00:24:19,160 --> 00:24:22,320
क्या आप उसी वक्त अपनी जिंदगी की 
सारी यादें चेक करेंगे? 

327
00:24:22,680 --> 00:24:25,680
क्या आप बचपन की बातें या अपनी 
पूरी पढ़ाई याद करेंगे? 

328
00:24:25,760 --> 00:24:28,760
हम बिल्कुल नहीं। 
आप सिर्फ काम की बात देखेंगे। 

329
00:24:29,600 --> 00:24:33,560
अगर दिमाग कंप्यूटर होता तो उसे 
पूरा सिस्टम छानना पड़ता। 

330
00:24:34,080 --> 00:24:38,000
पूरी दुनिया की जानकारी खंगालने 
बहुत भारी काम है। 

331
00:24:38,560 --> 00:24:41,520
इंसान का दिमाग इतना बड़ा बोझ 
नहीं झेल सकता। 

332
00:24:42,240 --> 00:24:46,720
हमारा दिमाग सिर्फ छोटे टुकड़ों 
में सिर्फ छोटे यूनिट्स में सोचता

333
00:24:46,720 --> 00:24:49,320
है। 
पूरी थ्योरी को एक साथ लेकर चलना 

334
00:24:49,320 --> 00:24:53,920
मशीन के लिए भी मुश्किल है। 
कुछ बड़े स्कॉलर्स कहते हैं कि सब

335
00:24:53,920 --> 00:24:57,880
कुछ आपस में जुड़ा है। 
वे मानते हैं कि एक छोटी सी बात 

336
00:24:57,880 --> 00:25:00,680
बदलने से पूरा सिस्टम बदल जाता 
है। 

337
00:25:01,000 --> 00:25:05,600
हो सकता है वह सही हों, पर दिमाग 
के लिए यह तरीका बहुत धीमा है। 

338
00:25:06,320 --> 00:25:12,000
यही वह मोड़ है जहाँ कंप्यूटर 
वाला रास्ता यानी कॉम्पटीशन कमजोर

339
00:25:12,000 --> 00:25:20,320
पड़ जाता है। 
यकीन करने के लिए हमें बस एक छोटी

340
00:25:20,320 --> 00:25:26,000
बात चाहिए जैसे यह आम मीठा है। 
यह सबसे छोटी बात है जो सच हो 

341
00:25:26,000 --> 00:25:28,760
सकती है। 
पर कौन सी बात किस्से जुड़ी है, 

342
00:25:29,120 --> 00:25:34,000
यह पहले से नहीं पता होता। 
यह दुनिया की बनावट पर टिका है। 

343
00:25:35,360 --> 00:25:40,800
नेशन ने दुनिया को कैसे बनाया यह 
उस पर है दिमाग के पुराने मॉडल 

344
00:25:40,800 --> 00:25:44,680
यहाँ फैल हो जाते हैं। 
वे बड़ी सोच को नहीं समझ पाते, 

345
00:25:44,840 --> 00:25:49,560
सिर्फ मशीन होना काफी नहीं है 
असली मुश्किल यह है कि दिमाग काम 

346
00:25:49,560 --> 00:25:53,840
कैसे करता है सबको पता है कि यहाँ
बड़ी गड़बड़ है। 

347
00:25:53,920 --> 00:25:56,360
मशीन को सब कुछ एक साथ देखना 
पड़ता है। 

348
00:25:56,640 --> 00:26:01,960
इंसान का दिमाग ऐसा नहीं करता। 
हम नई सोच के करीब पहुँच रहे हैं।

349
00:26:02,440 --> 00:26:07,320
दिमाग को एक अलग तरीके से देखना 
होगा एक मैसिव मॉड्यूलेरिटी की 

350
00:26:07,320 --> 00:26:11,040
तरह पर उससे पहले एक और 
एग्ज़ैम्पल देखते हैं। 

351
00:26:13,480 --> 00:26:16,560
हम सब अपनी पुरानी बातों पर टिके 
रहना चाहते हैं। 

352
00:26:16,920 --> 00:26:19,320
हम अपने सोच या प्लान जल्दी नहीं 
बदलते। 

353
00:26:19,840 --> 00:26:24,240
यह समझदारी की निशानी है। 
बिना किसी मजबूत वजह के हम नहीं 

354
00:26:24,240 --> 00:26:27,040
बदलते। 
हम चाहते हैं कि हमारी पुरानी 

355
00:26:27,040 --> 00:26:31,520
बातें बची रहे पर यहाँ भी 
कंप्यूटर को मुश्किल आती है। 

356
00:26:31,960 --> 00:26:35,360
जब हम अपने सोच बदलते हैं तो कीमत
चुकाने पड़ती है। 

357
00:26:35,640 --> 00:26:38,120
कुछ बातें हमारे लिए बहुत जरूरी 
होती हैं। 

358
00:26:38,440 --> 00:26:41,200
अगर वो बदल गई तो सब कुछ बदल 
जाएगा। 

359
00:26:41,760 --> 00:26:46,360
पर कौन सी बात जरूरी है? 
यह कॉन्टेक्स्ट और हमारी थियरी पर

360
00:26:46,360 --> 00:26:50,720
टिका है। 
इस एक एग्ज़ैम्पल से समझिए। 

361
00:26:51,960 --> 00:26:55,880
पुराने वैज्ञानिक सोचते थे कि 
भारी चीजें जल्दी गिरती हैं। 

362
00:26:56,160 --> 00:27:00,360
उन्हें लगता था कि यह नियम बहुत 
जरूरी है, जिससे पत्थर तेज गिरता 

363
00:27:00,360 --> 00:27:05,000
है और पंख थैरे पर बाद में पता 
चला कि यह हवा की वजह से है। 

364
00:27:05,200 --> 00:27:09,680
असली नियम तो कुछ और ही था जैसे 
थ्योरी बदली पुरानी। 

365
00:27:09,800 --> 00:27:15,960
जरूरी बात बेकार हो गई। 
एक और बात देखिए पहले लोग सोचते 

366
00:27:15,960 --> 00:27:22,080
थे की मेटल हमेशा सख्त होते हैं। 
मरकरी यानी पारा तो बहुत लिक्विड 

367
00:27:22,080 --> 00:27:27,120
है तो वह मेटल नहीं हो सकता और 
बाद में समझ आया की मेटल लिक्विड 

368
00:27:27,120 --> 00:27:30,160
भी हो सकते हैं। 
यहाँ भी कॉन्टेक्स्ट ने सब बदल 

369
00:27:30,160 --> 00:27:33,840
दिया। 
हमारी सोच में क्या जरूरी है? 

370
00:27:33,840 --> 00:27:37,920
यह बदलता रहता है। 
परक्षरों की बनावट उनके सिनटेक्स 

371
00:27:37,920 --> 00:27:41,800
कभी नहीं बदलते। 
सिनटेक्स को नहीं पता कि कौन सी 

372
00:27:41,800 --> 00:27:47,720
बात जरूरी है, वह तो बस एक मशीन 
की तरह काम करती है तो फिर दिमाग।

373
00:27:47,800 --> 00:27:51,120
सेंट्रेलिटी यानी महत्त्व को कैसे
समझता है? 

374
00:27:51,960 --> 00:27:54,800
कंप्यूटर के पास इसका कोई सीधा 
जवाब नहीं है। 

375
00:27:55,160 --> 00:27:59,000
यही वह गड़बड़ है जो नई सोच को 
कमजोर बनाती है। 

376
00:28:02,680 --> 00:28:06,960
बहुत से लोग कहते हैं कि दिमाग 
छोटे डिब्बों में छोटे मॉडल्स में

377
00:28:06,960 --> 00:28:10,600
बंटा है। 
वे ऐसा इसलिए कहते हैं ताकि वे यह

378
00:28:10,600 --> 00:28:14,760
मान सकें कि दिमाग सिर्फ अपने 
आसपास की चीजें देखता है। 

379
00:28:15,680 --> 00:28:19,520
वे इस बात को छिपाना चाहते हैं कि
दिमाग कॉन्टेक्स्ट को भी समझता 

380
00:28:19,520 --> 00:28:23,000
है। 
ये सिर्फ किताबें बहस नहीं है या 

381
00:28:23,480 --> 00:28:27,320
असली साइंस के लिए भी एक बहुत 
बड़ी सिरदर्दी है। 

382
00:28:28,800 --> 00:28:33,280
अगर दिमाग को कंप्यूटर मानने वाला
तरीका सही होता तो अब तक हमारा 

383
00:28:33,280 --> 00:28:37,400
साइंस बहुत आगे होता। 
पर सच तो यह है कि यह तरीका कई 

384
00:28:37,400 --> 00:28:42,440
जगह फेल हो रहा है। 
कंप्यूटर वाली सोच सिर्फ कुछ छोटी

385
00:28:42,440 --> 00:28:46,560
बातों के लिए तो सही है पर यह हर 
जगह काम नहीं करती। 

386
00:28:47,320 --> 00:28:53,120
एग्ज़ैम्पल के तौर पर आर्टिफिशियल
इन्टेलिजेन्स यानी मशीनी दिमाग आज

387
00:28:53,120 --> 00:28:55,640
भी आम आदमी जैसा काम नहीं कर 
पाता। 

388
00:28:56,120 --> 00:29:00,800
यह बड़े शर्म की बात है। 
हम आज तक ऐसा रोबोट नहीं बना पाए 

389
00:29:00,920 --> 00:29:06,440
जो घर का नाश्ता बना सके, वह घर 
जलाये बिना नाश्ता नहीं बना सकता।

390
00:29:06,600 --> 00:29:10,920
ये एक लैंगुएज का दूसरी लैंगुएज 
में सही ट्रांसलेट नहीं कर सकता। 

391
00:29:11,840 --> 00:29:14,960
वह किसी किताब का छोटी समरी नहीं 
लिख सकता। 

392
00:29:16,280 --> 00:29:20,680
पिंकर कहते हैं कि हम दिमाग को 
समझ चूके हैं पर वे यह नहीं बताते

393
00:29:20,680 --> 00:29:25,240
कि अगर सब हम जानते हैं तो हमारे 
रोबोट्स इतने बुद्धू क्यों हैं? 

394
00:29:27,000 --> 00:29:29,840
रोबोट के फेल होने का एक खास 
तरीका है। 

395
00:29:30,280 --> 00:29:35,040
आम जिंदगी में अंदाजा लगाने के 
लिए कॉन्टेक्स्ट समझना पड़ता है। 

396
00:29:35,800 --> 00:29:41,400
यह एक बड़ी डायलेमा है। 
बड़ी दुविधा सही फैसले के लिए 

397
00:29:41,400 --> 00:29:45,120
आपको अपनी सारी पुरानी जानकारी 
चेक करनी पड़ती है। 

398
00:29:45,240 --> 00:29:48,960
पर जल्दी काम करने के लिए आप 
सिर्फ थोड़ी सी जानकारी ही देख 

399
00:29:48,960 --> 00:29:52,720
सकते हैं। 
मशीन को यह समझ नहीं आता कि कौन 

400
00:29:52,720 --> 00:29:58,240
सी बात जरूरी है और कौन सी नहीं। 
इसे ही साइंटिस्ट फ्रेम प्रॉब्लम 

401
00:29:58,240 --> 00:30:01,400
कहते हैं। 
इसी चक्कर में रोबोट लग जाते हैं 

402
00:30:01,400 --> 00:30:07,920
और काम नहीं कर पाते। 
कंप्यूटर छोटी लॉजिक वाली बातों 

403
00:30:07,920 --> 00:30:11,760
में बहुत तेज है। 
जैसे शिव और मोहन आए। 

404
00:30:12,360 --> 00:30:18,440
इसे यह समझना कि शिव आया यहाँ उसे
सिर्फ शब्दों की सेटिंग देखनी है,

405
00:30:18,600 --> 00:30:22,880
सिर्फ उनका सिनटैक्स। 
यह काम बहुत आसान और लोकल है। 

406
00:30:23,240 --> 00:30:27,840
यहाँ तक तो सब ठीक है पर आम 
जिंदगी की सोच ऐसी नहीं होती। 

407
00:30:28,120 --> 00:30:31,040
ज्यादातर बातें कॉन्टेक्स्ट पर 
टिक्की होती हैं। 

408
00:30:31,480 --> 00:30:35,280
कंप्यूटर के पास कॉन्टेक्स्ट को 
समझने का कोई पक्का तरीका नहीं 

409
00:30:35,280 --> 00:30:38,640
है। 
वह पूरी आने पूरे डेटबेस छाने 

410
00:30:38,640 --> 00:30:41,320
लगता है। 
और इसी में हार जाता है। 

411
00:30:42,000 --> 00:30:46,800
इसीलिए हमारे रोबोट आज भी वो काम 
नहीं कर पाते जो एक बच्चा आसानी 

412
00:30:46,800 --> 00:30:53,360
से कर लेता है। 
उम्मीद है कि आप पिछली बातों से 

413
00:30:53,360 --> 00:30:57,080
सहमत होंगे। 
दिमाग के नए साइंस की नींव में एक

414
00:30:57,080 --> 00:30:59,640
बड़ी दरार है एक। 
बड़ा क्रैक है। 

415
00:31:00,520 --> 00:31:05,080
अब आप सोच रहे होंगे कि वैज्ञानिक
इस पर परेशान क्यों नहीं होते? 

416
00:31:05,480 --> 00:31:08,720
उन्हें क्यों नहीं लगता कि 
कंप्यूटर वाला तरीका यहाँ फैल हो 

417
00:31:08,720 --> 00:31:11,360
रहा है? 
इसके दो मेन कारण हैं। 

418
00:31:11,520 --> 00:31:17,640
पहला, कुछ वैज्ञानिक सोचते हैं कि
हम शॉर्टकट यूरिस्टिक से काम चला 

419
00:31:17,640 --> 00:31:21,160
सकते हैं। 
दूसरा, कुछ लोग कनेक्शनिस्ट तरीका

420
00:31:21,160 --> 00:31:24,400
पसंद करते हैं। 
उन्हें लगता है कि इससे सारी 

421
00:31:24,400 --> 00:31:28,800
मुश्किलें हल हो जाएंगी। 
पर मुझे लगता है कि मामला बहुत 

422
00:31:28,800 --> 00:31:32,800
गंभीर है। 
बड़ी सोच एक बहुत बड़ी समस्या है।

423
00:31:33,120 --> 00:31:37,000
इसे सुलझाना आज के विज्ञान के बस 
की बात नहीं लग रही। 

424
00:31:37,240 --> 00:31:43,960
हाँ जी देखते हैं क्यों पहले बात 
करते हैं शॉर्टकट वाले तरीके के 

425
00:31:44,200 --> 00:31:49,640
ट्यूरिस्टिक सोलूशन्स की। 
यह सच है कि इंसान हमेशा एकदम सही

426
00:31:49,640 --> 00:31:54,160
फैसला नहीं लेता। 
हम अक्सर कामचलाऊ तरीके से सोच 

427
00:31:54,160 --> 00:31:56,160
लेते हैं। 
अप्रॉक्समेशन से। 

428
00:31:57,120 --> 00:32:01,480
लोग कहते हैं कि शायद हमारा दिमाग
बड़ी सोच की जगह छोटे छोटे 

429
00:32:01,480 --> 00:32:06,480
शॉर्टकट इस्तेमाल करता है। 
आर्टिफीसियल इन्टेलिजेन्स यानी 

430
00:32:06,520 --> 00:32:10,280
मशीनी दिमाग वाले से फ्रेम 
प्रॉब्लम कहते हैं। 

431
00:32:11,120 --> 00:32:15,560
उनका मानना है कि हम छोटे छोटे 
टुकड़ों में सोचकर बड़ी समस्या हल

432
00:32:15,560 --> 00:32:19,040
कर लेते हैं। 
पर इसमें एक बहुत बड़ी गड़बड़ है।

433
00:32:19,480 --> 00:32:24,160
गड़बड़ क्या है यह सोचना कि कौन 
सा शॉर्टकट इस्तेमाल करें। 

434
00:32:24,400 --> 00:32:30,280
यह खुद एक बहुत मुश्किल काम है। 
मान लीजिए, मान लीजिए आप सोच रहे 

435
00:32:30,280 --> 00:32:35,080
हैं कि आलू के बिज़नेस में पैसा 
लगाया या नहीं, यह फैसला लेना 

436
00:32:35,080 --> 00:32:38,480
मुश्किल है। 
अब आप सोचते हैं कि इसके लिए कौन 

437
00:32:38,480 --> 00:32:42,360
सा शॉर्टकट चुने, क्या किसी दोस्त
से पूछें या अखबार पढ़ें? 

438
00:32:43,080 --> 00:32:46,920
यहाँ भी वही समस्या आ जाती है। 
दोस्त की बात मानूं या नहीं? 

439
00:32:47,480 --> 00:32:52,280
यह भी कॉन्टेक्स्ट पर टिका है। 
अगर आपका दोस्त जोंस आलू का बड़ा 

440
00:32:52,280 --> 00:32:55,200
बिजनेसमैन है तो उसकी बात जरूरी 
है। 

441
00:32:55,320 --> 00:32:59,720
पर अगर वो सिर्फ एक साधारण पड़ोसी
है तो उसकी बात का कोई मतलब नहीं।

442
00:33:00,320 --> 00:33:04,760
यानी शॉर्टकट चुनने के लिए भी 
हमें बड़ी सोच चाहिए। 

443
00:33:04,920 --> 00:33:09,320
कंटेक्चुअल थिंकिंग चाहिए? 
हम एक ही दायरे में गोल गोल घूम 

444
00:33:09,320 --> 00:33:14,360
रहे हैं तो दिमाग के काम करने के 
दो तरीके हो सकते हैं। 

445
00:33:14,440 --> 00:33:19,560
पहला, कम्प्यूटेशनल यानी हिसाब 
किताब वाला जैसे एक बात से दूसरी 

446
00:33:19,560 --> 00:33:25,960
बात पर पहुंचना जैसे 2+2 इक्वल्स,
फोर दूसरा दिमाग की बनावट यानी 

447
00:33:25,960 --> 00:33:30,880
आर्किटेक्चरल, वो तरीका जिससे 
दिमाग खुद ब खुद काम करता है। 

448
00:33:31,720 --> 00:33:34,920
कंप्यूटर सिर्फ। 
एक एक सिंबल्स को देख सकता है उसे

449
00:33:34,920 --> 00:33:37,160
पूरा कॉन्टेक्स्ट का अंदाजा नहीं 
होता। 

450
00:33:37,760 --> 00:33:40,600
ट्यूरिंग की मशीन सिर्फ लोकल काम 
कर सकती है। 

451
00:33:40,800 --> 00:33:45,040
वह एक एक पुर्जे को तो देख सकती 
है पर पूरी मशीन को एक साथ नहीं 

452
00:33:45,040 --> 00:33:49,080
समझ सकती। 
मशीन को यह समझ नहीं आता कि कौन 

453
00:33:49,080 --> 00:33:51,960
सी बात साधारण है और कौन सी 
स्पेशल। 

454
00:33:52,120 --> 00:33:55,800
कौन सी खास? 
उसे यह भी नहीं पता चलता कि 

455
00:33:55,800 --> 00:34:02,320
पुरानी बातों को कब छोड़ना है। 
पहेली यही है कि हमारा दिमाग बिना

456
00:34:02,320 --> 00:34:05,760
किसी मेहनत के कॉन्टेक्स्ट को 
कैसे समझ लेता है। 

457
00:34:06,560 --> 00:34:10,080
टूरिंग का कंप्यूटर वाला तरीका 
इसका जवाब नहीं दे पाता। 

458
00:34:10,480 --> 00:34:13,600
वह सिर्फ छोटे। 
और बंटे हुए कामों में ही 

459
00:34:13,679 --> 00:34:17,960
एक्स्पर्ट है। 
हम क्रिसमस के बाद के समय को 

460
00:34:17,960 --> 00:34:21,639
आसानी से समझ सकते हैं। 
इसके लिए बस एक घड़ी की जरूरत 

461
00:34:21,639 --> 00:34:25,199
होती है। 
घड़ी एक मशीन है जो समय बता देती 

462
00:34:25,199 --> 00:34:30,480
है पर बड़ी सोच यानी ग्लोबलिटी के
लिए ऐसी कोई मशीन नहीं है। 

463
00:34:30,880 --> 00:34:35,040
इसीलिए यह कंप्यूटर वाला तरीका 
फैल हो जाता है। 

464
00:34:39,199 --> 00:34:43,840
तो हमने दो बातें मानी थी। 
पहले पहली कि दिमाग में बड़ी सोच 

465
00:34:43,840 --> 00:34:46,320
यानी ग्लोबल इफेक्ट्स सच में होती
है। 

466
00:34:46,600 --> 00:34:49,719
हो सकता है कि आगे चलकर यह मशीन 
जैसा ही निकले। 

467
00:34:50,080 --> 00:34:52,960
पर फिलहाल हमारे पास ऐसा कोई सबूत
नहीं है। 

468
00:34:53,239 --> 00:34:57,640
दूसरी टूरिंग का तरीका शायद हर 
जगह काम नहीं करता। 

469
00:34:58,160 --> 00:35:02,840
टूरिंग की कहानी सिर्फ छोटे और 
सीधे कामों के लिए है पर बड़ी सोच

470
00:35:02,840 --> 00:35:07,720
के लिए यह बिल्कुल बेकार है। 
अगर आपको लगता है कि बड़ी सोच 

471
00:35:07,720 --> 00:35:10,880
जरूरी नहीं है तो आप। 
ट्यूनिंग की कहानी पर यकीन कर 

472
00:35:10,880 --> 00:35:14,800
सकते हैं, पर मुझे लगता है कि यह 
कहानी अधूरी है। 

473
00:35:14,880 --> 00:35:19,480
इन्कम्प्लीट है दिमाग सिर्फ एक 
मशीनी सेन्टेक्स नहीं है। 

474
00:35:20,400 --> 00:35:25,640
अब एक नया तरीका देखते हैं, जिसे 
कनेक्शनिज्म या नेटवर्क्स कहते 

475
00:35:25,640 --> 00:35:28,200
हैं। 
पर सच कहूं तो यह तरीका और भी 

476
00:35:28,200 --> 00:35:31,880
ज्यादा बुरा है। 
यह ना तो लॉजिक समझ पाता है और ना

477
00:35:31,880 --> 00:35:36,560
ही यह बड़ी सोच को समझा पाता है। 
पता नहीं लोग इसे इतना पसंद क्यों

478
00:35:36,560 --> 00:35:41,600
करते हैं? 
तो ये नेटवर्क्स क्या चीज़ है? 

479
00:35:42,200 --> 00:35:45,280
ये नेटवर्क हमारे डेस्कटॉप 
कंप्यूटर जैसे नहीं होते। 

480
00:35:45,360 --> 00:35:48,240
इनमें मेमॅरि और प्रोग्राम अलग 
नहीं होते। 

481
00:35:49,880 --> 00:35:53,160
ये बहुत सारे छोटे स्विच जैसे 
होते हैं। 

482
00:35:53,200 --> 00:35:58,360
छोटे नोट्स जैसे ये स्विच आपस में
कनेक्शन से जुड़े होते हैं। 

483
00:35:58,400 --> 00:36:03,280
तारों से जब एक स्विच जलता है तो 
वह दूसरे को मैसेज भेजता है। 

484
00:36:03,640 --> 00:36:08,000
इसे आप पुराने ख्यालों के जुड़ने 
यानी असोसिएशन जैसा समझिए। 

485
00:36:09,200 --> 00:36:12,040
इसमें सोचने की शी लहर के चलने 
जैसा है। 

486
00:36:12,480 --> 00:36:17,000
जब हमारी आँखें कुछ देखती हैं तो 
नेटवर्क चालू हो जाता है। 

487
00:36:18,240 --> 00:36:21,840
अब क्या सोचने हैं? 
यह दो बातों पर टिका है पहली आपने

488
00:36:21,840 --> 00:36:25,280
बाहर क्या देखा यानी सेंसेशन्स और
दूसरा। 

489
00:36:25,360 --> 00:36:28,800
आपके दिमागी तारे यानी कनेक्शन्स 
कितने मजबूत हैं? 

490
00:36:29,920 --> 00:36:37,240
ये बहुत ही पुराना और सीधा तरीका 
है, लेकिन नेटवर्क के साथ एक बहुत

491
00:36:37,240 --> 00:36:41,560
बड़ी प्रॉब्लम है। 
इसमें हर स्विच अपनी जगह से 

492
00:36:41,560 --> 00:36:45,080
पहचाना जाता है। 
एक स्विच का अपना कोई वजूद नहीं 

493
00:36:45,080 --> 00:36:49,720
होता, कोई ऐडेंटिटी नहीं। 
वो सिर्फ अपने आस पास के तारों से

494
00:36:49,720 --> 00:36:53,840
पहचाना चाहता है। 
इसका मतलब है कि आप एक नोड को एक 

495
00:36:53,840 --> 00:36:56,360
स्विच को दूसरी जगह नहीं ले जा 
सकते। 

496
00:36:57,000 --> 00:37:02,120
अगर नेटवर्क बदल गया तो ख्याल भी 
बदल जाएगा। 

497
00:37:02,960 --> 00:37:08,920
इस वजह से नेटवर्क यह नहीं समझ 
पाते कि राम ने श्याम को मारा या 

498
00:37:09,120 --> 00:37:12,000
श्याम ने राम को मारा। 
इनमे क्या फर्क है? 

499
00:37:12,560 --> 00:37:15,160
वे शब्दों के अदल बदल को नहीं समझ
सकते। 

500
00:37:15,760 --> 00:37:19,920
ये नेटवर्क बड़ी सोच में वैसे ही 
फैल होते हैं जैसे कंप्यूटर। 

501
00:37:21,480 --> 00:37:25,400
नेटवर्क ये नहीं समझ सकते कि कौन 
सी बात कितनी जरूरी है। 

502
00:37:26,120 --> 00:37:29,680
उनके कनेक्शन्स एक बार जुड़ गए तो
वैसे ही रहती है। 

503
00:37:29,920 --> 00:37:34,440
वे कॉन्टेक्स्ट के हिसाब से खुद 
को बदल नहीं पाते पर असल जिंदगी 

504
00:37:34,440 --> 00:37:39,520
में हमारी सोच बदलती रहती है। 
आज जो बात हमें जरूरी लगती है कल 

505
00:37:39,520 --> 00:37:43,440
वो बेकार हो सकती है। 
नेटवर्क अपनी इन तारों को इतनी 

506
00:37:43,440 --> 00:37:48,120
जल्दी नहीं बदल सकते, इसीलिए वे 
हमारी बड़ी सोच का मुकाबला नहीं 

507
00:37:48,120 --> 00:37:53,040
कर सकते। 
तो अब हमारे पास क्या रास्ते बचे 

508
00:37:53,040 --> 00:37:55,920
हैं? 
पहला कुछ मत करो, बस अच्छे आइडिया

509
00:37:55,920 --> 00:37:59,240
का इंतजार करो। 
यह सुनने में तो अच्छा है पर काम 

510
00:37:59,240 --> 00:38:00,760
नहीं आएगा। 
दूसरा ये। 

511
00:38:01,360 --> 00:38:06,000
कि यह मान लो कि बड़ी सोच जैसा 
कुछ नहीं होता, यह तो सरासर झूठ 

512
00:38:06,040 --> 00:38:14,200
बोलने वाली बात होगी तो हमने देखा
कि बड़ी सोच यानी ग्लोबेलिटी 

513
00:38:14,240 --> 00:38:17,720
कंप्यूटर के लिए एक कांटा है, 
लेकिन। 

514
00:38:17,960 --> 00:38:21,840
अगर हमारा दिमाग छोटे छोटे 
डिब्बों से छोटे छोटे मॉड्यूल से 

515
00:38:21,840 --> 00:38:27,760
बना हो तो अगर ये डिब्बे सिर्फ 
अपना काम सिर्फ लोकल वर्क करें तो

516
00:38:27,760 --> 00:38:30,200
कंप्यूटर वाला तरीका काम कर सकता 
है। 

517
00:38:30,800 --> 00:38:35,880
अब यहाँ तीन बातें हो सकती हैं। 
पहला अगर दिमाग में कोई डिब्बा 

518
00:38:35,880 --> 00:38:40,520
नहीं है, कोई मॉड्यूल नहीं है। 
तो मामला खत्म अगर दिमाग का सिर्फ

519
00:38:40,520 --> 00:38:44,320
कुछ हिस्सा डिब्बों वाला है, तो 
हम सिर्फ उसी पर ध्यान देंगे। 

520
00:38:45,040 --> 00:38:49,560
अगर पूरा दिमाग है डिब्बों से भरा
है मॉड्यूल से भरा है, तो पिंकर 

521
00:38:49,560 --> 00:38:54,640
और प्लाटकिन सही है और मैं आपका 
समय बर्बाद कर रहा हूँ। 

522
00:38:55,840 --> 00:39:00,680
पूरे दिमाग को डीबो जैसा मानने को
मैसिव मॉड्यूलेरिटी कहते हैं। 

523
00:39:00,960 --> 00:39:03,080
मुझे लगता है कि यह बात सच नहीं 
है। 

524
00:39:03,440 --> 00:39:07,280
अगर हम इसे सच मान ले तो बहुत सी 
बातें समझ नहीं आती। 

525
00:39:09,440 --> 00:39:13,920
पहले यह डिब्बा है क्या? 
साइंस में मॉड्यूल्स? 

526
00:39:14,200 --> 00:39:17,800
विज्ञान में डिब्बों को लेकर लोग 
अलग अलग बातें कहते हैं। 

527
00:39:18,320 --> 00:39:21,680
असल में दो तरह के दिमागी 
आर्किटेक्चर होते हैं। 

528
00:39:21,680 --> 00:39:27,800
दो तरह के दिमागी ढांचे, एक वो 
जहाँ जानकारी बंद रहती है और एक 

529
00:39:27,800 --> 00:39:31,360
वो जहाँ नहीं। 
हम सिर्फ वो बंद वाली जानकारी पर 

530
00:39:31,360 --> 00:39:37,200
बात करेंगे। 
कुछ लोग हर उस हिस्से को मॉडल 

531
00:39:37,200 --> 00:39:42,920
कहते हैं जो अपना एक खास काम, एक 
खास फंक्शन करता है जैसे शरीर के 

532
00:39:42,920 --> 00:39:46,960
अलग अलग वर्स होते हैं। 
इस हिसाब से तो हर किसी का दिमाग 

533
00:39:46,960 --> 00:39:52,360
डिपो वाला ही है। 
चमस्की के हिसाब से डिब्बा यानी 

534
00:39:52,360 --> 00:39:58,040
मॉड्यूल सिर्फ पैदाइशी जानकारी 
सिर्फ इनेट नॉलेज का एक डेटबेस 

535
00:39:58,040 --> 00:40:01,760
है। 
एक भंडार मैं मॉड्यूल से कहूंगा, 

536
00:40:01,760 --> 00:40:05,520
मैं डिब्बा से कहूंगा जो एक बंद 
मशीन की तरह हो। 

537
00:40:06,160 --> 00:40:10,040
इसका मतलब है कि वह मशीन बाहर की 
बातों से कोई मतलब नहीं रखती। 

538
00:40:10,480 --> 00:40:16,120
वह बस अपना काम जानती है। 
अक्सर कहा जाता है कि हर डिब्बा 

539
00:40:16,120 --> 00:40:20,240
अपने काम में माहिर होता है। 
डोमेन स्पेसिफिक होता है। 

540
00:40:20,720 --> 00:40:25,640
इसे थोड़ा ध्यान से समझना होगा। 
अगर हम चोंस्की की बात माने तो यह

541
00:40:25,640 --> 00:40:29,680
बहुत सीधा है। 
जानकारी हमेशा किसी एक चीज़ के 

542
00:40:29,680 --> 00:40:34,280
बारे में ही होती है जैसे खरगोश 
के सीन नहीं होते। 

543
00:40:34,720 --> 00:40:37,680
यह जानकारी सिर्फ खरगोश के बारे 
में ही है। 

544
00:40:39,120 --> 00:40:43,240
एक और मतलब यह है कि कुछ जानकारी 
बहुत खास होती है जैसे। 

545
00:40:43,760 --> 00:40:47,840
चोम्स्की कहती हैं कि लैंगुएज 
सीखने का नियम बहुत ही खास है। 

546
00:40:48,320 --> 00:40:51,080
यह सिर्फ इंसानी लैंगुएज पर ही 
लागू होता है। 

547
00:40:51,480 --> 00:40:56,960
यह वैसा ही है जैसे एक खास जानवर 
प्लेटीपस सिर्फ एक ही जगह पाया 

548
00:40:56,960 --> 00:41:01,360
जाता है लैंगुएज का डिब्बा 
लैंगुएज का मॉड्यूल सिर्फ। 

549
00:41:01,520 --> 00:41:04,120
लैंगुएज के ही नियम जानता है और 
कुछ नहीं। 

550
00:41:06,920 --> 00:41:11,040
बात सिर्फ जानकारी की नहीं है, 
सिर्फ इन्फॉर्मेशन की नहीं है। 

551
00:41:11,680 --> 00:41:16,200
प्लेटिपस की जानकारी सिर्फ उसके 
लिए है, पर यह नहीं बताती कि हम 

552
00:41:16,200 --> 00:41:20,080
सीखते कैसे हैं। 
हमें ऐसी चीज़ चाहिए जो दिमाग के 

553
00:41:20,080 --> 00:41:24,560
काम से जुड़ी हो। 
दिमाग के काम करने का तरीका भी 

554
00:41:24,560 --> 00:41:27,520
खास होता है पर इसमें एक बात 
फंसती है। 

555
00:41:27,760 --> 00:41:31,160
क्या लॉजिक का नियम किसी एक चीज़ 
के लिए है? 

556
00:41:31,960 --> 00:41:39,680
लॉजिक का एक फेमस नियम है मोडस 
पोनेस इसका मतलब है अगर ये है तो 

557
00:41:39,680 --> 00:41:43,320
ब होगा। 
अगर ये है तो बी होगा एग्ज़ैम्पल 

558
00:41:43,320 --> 00:41:48,280
के तौर पर दो बातें देखिए पहली 
अगर इसमें पानी है तो यह जहर है। 

559
00:41:48,760 --> 00:41:52,560
दूसरी अगर दो एक नंबर है तो यह 
छोटा है। 

560
00:41:53,600 --> 00:41:55,880
लॉजिक के हिसाब से ये दोनों एक 
जैसे हैं। 

561
00:41:55,960 --> 00:41:59,680
नियम कहता है कि यह हर जगह काम 
करना चाहिए। 

562
00:42:00,240 --> 00:42:03,600
पर क्या हमारा दिमाग से हर जगह 
इस्तेमाल करता है? 

563
00:42:04,000 --> 00:42:09,640
कुछ साइंटिस्ट कहते हैं कि नहीं, 
शायद हमारा दिमाग नंबरों के लिए 

564
00:42:09,640 --> 00:42:14,640
लॉजिक जानता है, पर वही दिमाग जहर
की बात पर गड़बड़ कर देता है। 

565
00:42:15,160 --> 00:42:18,920
ऐसे ही डोमेन स्पेसिफिक यानी खास 
काम में। 

566
00:42:19,040 --> 00:42:23,200
माहिर होना कहते हैं। 
यह जानकारी और काम के बीच का 

567
00:42:23,200 --> 00:42:29,400
तालमेल है। 
अब बात करते हैं बंद डिब्बे की इस

568
00:42:29,400 --> 00:42:33,280
एक एग्ज़ैम्पल से समस्या मान 
लीजिए आपको एक मजेदार बात पता है,

569
00:42:33,600 --> 00:42:37,600
आप उसे काम में तो इस्तेमाल कर 
लेते हैं पर दूसरे काम में आप उसे

570
00:42:37,600 --> 00:42:41,440
भूल जाते हैं। 
आपकी जानकारी एक डिब्बे में बंध 

571
00:42:41,440 --> 00:42:43,760
है। 
वह बाहर नहीं निकल पा रही। 

572
00:42:45,360 --> 00:42:48,240
दिमाग के पास अलग अलग मशीनों के 
डिब्बे हैं। 

573
00:42:48,720 --> 00:42:53,080
रास्ता ढूंढने वाली मशीन अलग है। 
मैथ करने वाली मशीन अलग है। 

574
00:42:53,560 --> 00:42:56,680
मैप वाली मशीन की बात हिसाब वाली 
को नहीं पता। 

575
00:42:56,840 --> 00:43:00,880
यह दिमाग की बनावट। 
निम्मा के आर्किटेक्चर की वजह से 

576
00:43:00,880 --> 00:43:04,160
है। 
ये कोई भूलने वाली बिमारी नहीं है

577
00:43:05,480 --> 00:43:08,200
तो डिब्बा तो मॉड्यूल असल में 
क्या है? 

578
00:43:08,920 --> 00:43:13,560
ये एक ऐसी मशीन है जिसके पास अपना
खजाना है, अपना डेटबेस है। 

579
00:43:14,400 --> 00:43:17,320
ये अपना काम करने के लिए बाहर से 
मदद नहीं लेती। 

580
00:43:17,600 --> 00:43:21,760
यह सिर्फ अपने डिब्बे की जानकारी 
इस्तेमाल करती है इसीलिए यह बहुत 

581
00:43:21,760 --> 00:43:26,200
तेज काम करती है। 
यही बड़ी सोच वाली समस्या का हल 

582
00:43:26,200 --> 00:43:29,680
है। 
जब जानकारी एक छोटे डिब्बे में 

583
00:43:29,680 --> 00:43:33,640
बंद होती है तो दिमाग को पूरी 
दुनिया नहीं छाननी पड़ती। 

584
00:43:34,080 --> 00:43:36,960
उसे सिर्फ अपने छोटे से डिब्बे 
में देखना होता है। 

585
00:43:37,800 --> 00:43:40,960
इससे फ्रेम प्रॉब्लम अपने आप सुलझ
जाती है। 

586
00:43:41,240 --> 00:43:44,560
डिब्बे के बाहर क्या है उससे मशीन
को मतलब नहीं। 

587
00:43:45,960 --> 00:43:50,360
तो सीधी बात यह है कि कंप्यूटर 
छोटे और लोकल कॉन्टेक्स्ट में 

588
00:43:50,360 --> 00:43:53,400
अच्छा है। 
दिमाग की ये मॉडल्स भी वैसे ही 

589
00:43:53,400 --> 00:43:56,640
हैं इसीलिए। 
कंप्यूटर वाली थ्योरी यहाँ एकदम 

590
00:43:56,680 --> 00:44:01,920
फिट बैठती है। 
फिर मान लीजिए कि बहुत सारे 

591
00:44:01,920 --> 00:44:03,920
डिब्बे हैं, मैसिव मॉड्यूलेरिटी 
है। 

592
00:44:04,160 --> 00:44:08,320
मान लीजिए हमारा पूरा दिमागी 
डिब्बों से यानी मॉड्यूल से बना 

593
00:44:08,320 --> 00:44:11,680
है। 
इसका मतलब है हर समस्या के लिए एक

594
00:44:11,680 --> 00:44:17,040
अलग मशीन है, एक अलग प्रोसेसर है।
पर फिर दिमाग में ऐसी कोई जगह 

595
00:44:17,040 --> 00:44:22,680
नहीं बचेगी जो यह बता सके कि सबसे
अच्छा फैसला क्या है, क्योंकि हर 

596
00:44:22,680 --> 00:44:28,360
डिब्बा बस अपना ही काम जानता है। 
अगर ऐसा है तो मेरी बड़ी सोच वाली

597
00:44:28,360 --> 00:44:31,120
बात गलत होगी, पर मैं इसे मानूंगा
नहीं। 

598
00:44:31,960 --> 00:44:35,880
मैं साबित करूँगा की पूरा दिमाग 
डिब्बों वाला होना पॉसिबल नहीं। 

599
00:44:36,280 --> 00:44:38,640
इसके लिए कोई पक्का सबूत भी नहीं 
है। 

600
00:44:38,880 --> 00:44:44,880
तो चलिए इस सोच की कमियों को 
देखते हैं कुछ वैज्ञानिक टू बी 

601
00:44:44,880 --> 00:44:49,760
एंड कोसमिडेस कहते हैं कि इंसानी 
दिमाग सिर्फ डिब्बों से ही बन 

602
00:44:49,760 --> 00:44:51,640
सकता था। 
वह कहते हैं। 

603
00:44:51,760 --> 00:44:54,280
कि बिना डिब्बे वाला दिमाग बच 
नहीं पाता। 

604
00:44:55,040 --> 00:44:59,240
मुझे यह बात हजम नहीं होती। 
दिमाग की बनावट कई चीजों का मेल 

605
00:44:59,240 --> 00:45:02,720
है जैसे स्पीड और अच्युरेसी के 
बीच तालमेल। 

606
00:45:03,560 --> 00:45:07,360
ऐसा कोई नियम नहीं है कि सिर्फ 
डिब्बे ही जीतेंगे पर ये 

607
00:45:07,360 --> 00:45:10,000
वैज्ञानिक अपने बात पर अड़े हुए 
हैं। 

608
00:45:10,200 --> 00:45:14,680
वे कहते हैं कि बिना डिब्बों के 
बिना मॉडल्स के जीना इम्पॉसिबल 

609
00:45:14,680 --> 00:45:17,400
है। 
आइए देखते हैं उनकी तीन बड़ी 

610
00:45:17,400 --> 00:45:21,560
वजहें क्या हैं पहली सही और गलत 
की पहचान। 

611
00:45:23,000 --> 00:45:27,320
वह कहते हैं कि हर काम के लिए 
कामयाबी अलग होती है, हर काम के 

612
00:45:27,320 --> 00:45:29,720
लिए सक्सेस का पैरामीटर अलग होता 
है। 

613
00:45:30,520 --> 00:45:33,440
जैसे शिकार करना और बच्चे पालना 
अलग काम है। 

614
00:45:33,600 --> 00:45:37,760
वे पूछते हैं, क्या एक ही मशीन इन
सब को समझ सकती है? 

615
00:45:38,960 --> 00:45:43,200
अगर किसी को पता चले कि बच्चे के 
लिए सेक्स जरूरी है तो क्या उसे 

616
00:45:43,200 --> 00:45:47,800
हर वक्त वही करते रहना चाहिए? 
वह कहते हैं कि सिर्फ एक खास 

617
00:45:47,800 --> 00:45:50,600
डिब्बा ही बता सकता है। 
की कब रुकना है? 

618
00:45:51,320 --> 00:45:54,240
पर मेरा मानना है कि सच्चाई हर 
जगह काम आती है। 

619
00:45:54,760 --> 00:45:58,000
सच्ची जानकारी होना हर काम के लिए
कामयाबी है। 

620
00:45:59,480 --> 00:46:02,440
कुछ लोग कहेंगे कि सिर्फ सच जानना
काफी नहीं है। 

621
00:46:02,640 --> 00:46:05,880
जिंदा रहने के लिए हाथ, पैर और 
खाना भी चाहिए। 

622
00:46:06,760 --> 00:46:10,880
पर सच तो यह है कि सच जानना और 
काम करना साथ चलते हैं। 

623
00:46:11,640 --> 00:46:15,880
दिमाग जानकारी इकट्ठा करता है और 
शरीर उसे इस्तेमाल करता है। 

624
00:46:16,400 --> 00:46:21,000
यह एक टीम की तरह काम करते हैं। 
इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि काम 

625
00:46:21,000 --> 00:46:25,440
अलग अलग है। 
सच्चाई ढूंढना एक जनरल रूल हो 

626
00:46:25,440 --> 00:46:30,320
सकता है। 
फिर है दूसरी वजह कम जानकारी में 

627
00:46:30,320 --> 00:46:33,000
सीखना। 
वे कहते हैं कि दुनिया में 

628
00:46:33,000 --> 00:46:37,360
जानकारी बहुत कम है। 
पॉवर्टी ऑफ़ स्टीमुलस है, इसलिए 

629
00:46:37,360 --> 00:46:40,000
हमें पैदा होते ही खास डिब्बे 
चाहिए। 

630
00:46:40,680 --> 00:46:47,000
पर यहाँ वे एक गलती कर रहे हैं 
पैदाशी यानी इनेट नॉलेज और डिब्बे

631
00:46:47,000 --> 00:46:52,000
या मॉड्यूल्स अलग चीजें हैं। 
हम बहुत कुछ सीख कर पैदा हो सकते 

632
00:46:52,000 --> 00:46:56,640
हैं पर जरूरी नहीं कि वो सब अलग 
अलग मॉड्यूल्स में अलग अलग 

633
00:46:56,640 --> 00:47:00,920
डिब्बों में बंद हो। 
जैसे हम चलना जानते हैं पर वो कोई

634
00:47:01,000 --> 00:47:06,400
बंद डिब्बा नहीं है। 
तीसरी वजह है कोंबिनटोरियल 

635
00:47:06,400 --> 00:47:08,640
एक्सप्लोजन यानी बहुत सारी 
उलझनें। 

636
00:47:09,680 --> 00:47:14,560
वे कहते हैं कि अगर दिमाग डिब्बों
में न बटा हो तो वह इतनी सारी 

637
00:47:14,560 --> 00:47:18,680
जानकारीयों में खो जाएगा। 
जैसे अगर आपको हजारों रास्ते दिखे

638
00:47:18,680 --> 00:47:23,160
तो आप रुक जाएंगे, सिर्फ छोटे 
डिब्बे ही काम को आसान बना सकते 

639
00:47:23,160 --> 00:47:25,400
हैं। 
पर मुझे लगता है कि इसका एक और 

640
00:47:25,400 --> 00:47:28,920
रास्ता भी है। 
हो सकता है दिमाग का काम करने का 

641
00:47:28,920 --> 00:47:33,960
तरीका ही अलग हो, वो शायद मशीनी 
हिसाब किताब यानी कम्प्यूटेशन से 

642
00:47:34,120 --> 00:47:39,320
कुछ ज्यादा हो। 
अब मैं अपनी एक दलील देता हूँ, एक

643
00:47:39,320 --> 00:47:42,800
आर्गुमेंट मान लीजिए हमारे पास दो
टिब्बी हैं। 

644
00:47:42,920 --> 00:47:46,520
एक डिब्बा ट्रायंगल्स के बारे में
सोचता है, दूसरा डिब्बा स्क्वायर 

645
00:47:46,520 --> 00:47:51,720
के बारे में जब दिमाग के सामने 
कोई फोटो आती है तो उसे कैसे पता 

646
00:47:51,720 --> 00:47:54,120
चलता है कि कौन सा डिब्बा खोलना 
है? 

647
00:47:54,840 --> 00:47:59,600
यहाँ दो रास्ते हो सकते हैं दो 
ऑप्शन्ज़ पहला रास्ता एक बड़ा 

648
00:47:59,600 --> 00:48:05,000
डिब्बा बॉक्स वॅन बाहर खड़ा है। 
वो फोटो देखता है और उसे सही छोटे

649
00:48:05,000 --> 00:48:07,880
डिब्बे यानी एम वॅन या एम टू में 
भेज देता है। 

650
00:48:08,280 --> 00:48:13,000
पर अगर ऐसा है तो दिमाग पूरा 
डिब्बों वाला नहीं रहा क्योंकि वो

651
00:48:13,000 --> 00:48:15,520
बड़ा डिब्बा तो सबका काम कर रहा 
है। 

652
00:48:17,160 --> 00:48:21,760
दूसरा रास्ता दो और छोटे दरबान 
बिठा दीजिए बॉक्स टू और बॉक्स 

653
00:48:21,760 --> 00:48:25,360
थ्री। 
एक सिर्फ ट्रायंगल्स पहचाने दूसरा

654
00:48:25,360 --> 00:48:29,560
सिर्फ स्क्वेयर पर। 
फिर सवाल आएगा उन दरबानों में कौन

655
00:48:29,560 --> 00:48:34,360
बताएगा कि फोटो किसकी है? 
यह तो अंडे और मुर्गी वाली कहानी 

656
00:48:34,360 --> 00:48:37,400
बन जाएगी। 
हर छोटे डिब्बे के लिए एक और छोटा

657
00:48:37,400 --> 00:48:41,680
डिब्बा चाहिए होगा। 
यह सिलसिला कभी खत्म नहीं होगा। 

658
00:48:41,880 --> 00:48:45,920
इसका मतलब है कि शुरुआत में एक 
जनरल बात होना ही चाहिए। 

659
00:48:46,280 --> 00:48:51,040
एक आम रास्ता जो सारी जानकारीयों 
को देख सके और उन्हें बांट सके। 

660
00:48:51,480 --> 00:48:57,120
इसीलिए पूरा दिमाग डिब्बों वाला 
है, यह बात सही नहीं लगती। 

661
00:48:58,880 --> 00:49:01,360
पुराने जमाने के लोग एक बात मानते
थे। 

662
00:49:01,480 --> 00:49:06,800
दिमाग में कुछ भी आने से पहले वह 
इंद्रियों से गुजरता है। 

663
00:49:07,160 --> 00:49:10,400
इसे ही एम्पेरिसिस्ट प्रिन्सिपल 
कहते हैं। 

664
00:49:11,480 --> 00:49:16,800
हमारी इंद्रियां हमारी सबसे 
ज्यादा खुली होती हैं, डोमेन जनरल

665
00:49:16,800 --> 00:49:20,920
होती हैं, वे हर तरह की जानकारी 
को अंदर आने देती हैं। 

666
00:49:21,120 --> 00:49:25,520
वे तय करती हैं कि कौन सी बात किस
डिब्बे में किस मॉड्यूल में 

667
00:49:25,520 --> 00:49:30,760
जाएगी। 
इस तरह सेन्सस ही दिमाग का असली 

668
00:49:30,760 --> 00:49:34,880
दरवाजा है। 
अब मान लीजिए आप मैसिव 

669
00:49:34,920 --> 00:49:40,440
मॉड्यूलेरिटी मानते हैं, पर आप यह
नहीं मानते कि हर चीज़ सेन्सस से 

670
00:49:40,440 --> 00:49:44,640
आती है। 
तो फिर मामला और भी उलझ जाता है। 

671
00:49:44,960 --> 00:49:50,120
एग्ज़ैम्पल के तौर पर धोखेबाजों 
को पकड़ने वाली मशीन चीटर 

672
00:49:50,160 --> 00:49:54,120
डिटेक्शन मॉडल को लीजिए। 
वैज्ञानिक कहते हैं कि यह मशीन 

673
00:49:54,120 --> 00:49:58,200
सिर्फ सोशल एक्सचेंज के वक्त चलती
है सिर्फ लेन देन के वक्त। 

674
00:49:58,880 --> 00:50:02,560
जब आप किसी से सौदा करते हैं तो 
यह मशीन चालू होती है। 

675
00:50:03,160 --> 00:50:06,720
यह मशीन बताती है की सामने वाला 
धोखा तो नहीं दे रहा। 

676
00:50:07,720 --> 00:50:11,160
पर सवाल ये है की दिमाग को कैसे 
पता चलता है? 

677
00:50:11,640 --> 00:50:17,200
उसे कैसे पता है की अभी लेन देन 
अभी सोशल एक्स्चेंज चल रहा है। 

678
00:50:17,320 --> 00:50:22,520
इसके लिए एक और मशीन चाहिए जो 
लेनदेन को पहचाने वह मशीन धोखे 

679
00:50:22,520 --> 00:50:25,240
वाली मशीन से भी ज्यादा बड़ी होनी
चाहिए। 

680
00:50:25,800 --> 00:50:30,000
तो फिर पूरा दिमाग डिब्बो वाला 
है, यह बात यहाँ भी गलत साबित 

681
00:50:30,000 --> 00:50:34,040
होती है। 
तो आखिर एक डिब्बा एक मॉड्यूल 

682
00:50:34,040 --> 00:50:38,920
फैसला कैसे लेता है? 
क्या लेनदेन का क्या? 

683
00:50:38,960 --> 00:50:44,480
सोशल एक्सचेंज का कोई खास रंग 
होता है नहीं या कोई सेंसरी वाली 

684
00:50:44,480 --> 00:50:48,280
पहचान नहीं है? 
ऐसा नहीं है कि लेन देन होते ही 

685
00:50:48,280 --> 00:50:52,960
कोई लाल बत्ती जल जाती है। 
इसे पहचानने के लिए बहुत बारीकी 

686
00:50:52,960 --> 00:50:57,960
से सोचना पड़ता है। 
इंसान को इशारे समझने पड़ते हैं। 

687
00:50:58,680 --> 00:51:01,520
आज के वैज्ञानिक पुराने शिकारियों
की बात करते हैं। 

688
00:51:01,520 --> 00:51:04,840
वे कहते हैं कि पुराने जमाने में 
सब आसान था। 

689
00:51:05,680 --> 00:51:08,840
शायद तब लेनदेन को पहचानना बहुत 
आसान रहा होगा। 

690
00:51:09,040 --> 00:51:13,200
पर आज तो ऐसा नहीं है। 
आज हमें बहुत सोच समझ कर 

691
00:51:13,400 --> 00:51:19,000
कॉन्टेक्स्ट को समझना पड़ता है। 
और डिब्बे और मॉड्यूज तो ऐसी बड़ी

692
00:51:19,000 --> 00:51:23,720
सोच रख ही नहीं सकते। 
यही हाल लैंगुएज वाले मॉड्यूज का 

693
00:51:23,720 --> 00:51:26,720
भी है। 
दिमाग को कैसे पता चलता है कि 

694
00:51:26,720 --> 00:51:31,480
सामने वाला बोल रहा है या कोई 
सिर्फ शोर मचा रहा है? 

695
00:51:32,000 --> 00:51:36,040
वैज्ञानिक सालों से इसकी आवाज 
वाली पहचान ढूंढ रहे हैं। 

696
00:51:36,080 --> 00:51:41,720
ऐकूस्टिक फीचर्स पर आज तक किसी को
कुछ नहीं मिला साइन लैंगुएज में 

697
00:51:41,720 --> 00:51:45,840
तो आवाज भी नहीं होती, फिर भी 
दिमाग समझ जाता है की यह लैंगुएज 

698
00:51:45,840 --> 00:51:52,440
है तो सीधी बात यह है। 
की चीजों को पहचानना और उन्हें 

699
00:51:52,680 --> 00:51:57,400
सही मॉडल तक पहुंचाना। 
यह काम खुद एक बहुत बड़ी सोच 

700
00:51:57,400 --> 00:52:04,280
मांगता है और यही वह काम है जो 
बंद मॉड्यूल्स जो बंद डिब्बे कभी 

701
00:52:04,280 --> 00:52:09,160
नहीं कर सकते, बिना बड़ी सोच के 
बिना ग्लोबेलिटी के। 

702
00:52:09,240 --> 00:52:18,960
ये छोटे डिब्बे बेकार हैं यूज़लेस
सच कहूं तो हम पिछली बात पर ही 

703
00:52:18,960 --> 00:52:23,640
रुक सकते थे। 
पुरानी नई सोच दो बातें मानती है।

704
00:52:23,640 --> 00:52:27,320
पहली दिमाग एक कंप्यूटर की तरह 
काम करता है और दूसरी। 

705
00:52:27,600 --> 00:52:30,040
दिमाग छोटे छोटे डिब्बों में बंटी
हुई है। 

706
00:52:30,480 --> 00:52:33,840
कंप्यूटर सिर्फ अपने आसपास की 
चीजें देखता है यानी लोकल। 

707
00:52:34,200 --> 00:52:38,600
इसलिए वह बड़ी सोच में कच्चा है, 
लेकिन अगर दिमाग डिब्बों वाला है 

708
00:52:38,600 --> 00:52:43,320
तो काम आसान है, जितना ज्यादा 
डिब्बा बंद होगा, उतना ही कम उलझन

709
00:52:43,320 --> 00:52:45,760
होगी, उतनी ही कम कम्प्लेक्सिटी 
होगी। 

710
00:52:46,440 --> 00:52:51,760
नई सोच एक तीसरी बात भी कहती है, 
हमारा दिमाग एवोल्यूशन की एक 

711
00:52:52,240 --> 00:52:57,520
अडेप्टेशन है। 
विकास की एक देन है और अब हम इसी 

712
00:52:57,520 --> 00:53:03,440
तीसरी बात पर गौर करेंगे। 
नई सोच वाले एक अजीब दलील देते 

713
00:53:03,440 --> 00:53:07,200
हैं, एक अजीब सा आर्गुमेंट। 
वे कहते हैं की दिमाग को 

714
00:53:07,200 --> 00:53:09,120
एवोल्यूशन के नियम मान नहीं 
होंगे। 

715
00:53:09,560 --> 00:53:12,800
अगर हम ऐसा नहीं मानते तो ये एक 
बड़ी गलती होगी। 

716
00:53:13,240 --> 00:53:16,480
वे इसे कंसिस्टेंसी कहते हैं। 
एक जैसा होना। 

717
00:53:17,040 --> 00:53:20,560
उनका कहना है कि सारा विज्ञान आपस
में जुड़ा होना चाहिए। 

718
00:53:20,920 --> 00:53:24,560
जैसे डार्विन ने शरीर की बनावट को
समझाया। 

719
00:53:24,640 --> 00:53:29,720
वैसे ही वोल्यूशन ही दिमाग की 
बनावट को समझाता है, पर मुझे यह 

720
00:53:29,720 --> 00:53:36,520
बात थोड़ी अच्छी लगती है। 
थोड़ी वीक पहला गलत तर्क ये है कि

721
00:53:36,520 --> 00:53:41,120
सब कुछ एक जैसा यानी 
कन्सिस्टेन्सी यह कहना कि सारा 

722
00:53:41,120 --> 00:53:43,560
विज्ञान एक जैसा होना चाहिए, यह 
बहुत। 

723
00:53:43,880 --> 00:53:47,240
मजबूत बात नहीं है। 
इसके दो बड़े कारण हैं। 

724
00:53:49,240 --> 00:53:53,560
आप ये जान सकते हैं कि दिमाग कैसे
काम करता है, उसका मेकानिज्म क्या

725
00:53:53,560 --> 00:53:56,640
है। 
इसके लिए यह जानना जरूरी नहीं कि 

726
00:53:56,640 --> 00:53:59,520
वह कैसे बना, उसकी हिस्टरी जरूरी 
नहीं। 

727
00:54:00,000 --> 00:54:03,160
जैसे हवाई जहाज या बर्ड्स कैसे 
उड़ते हैं? 

728
00:54:03,960 --> 00:54:08,360
इसके लिए हवा के दबाव यानी 
एरोडाइनैमिक्स को समझना जरूरी है।

729
00:54:08,800 --> 00:54:12,320
यह जानना जरूरी नहीं कि बोर्ड्स 
ने उड़ना कैसे शुरू किया। 

730
00:54:13,360 --> 00:54:17,800
दो अलग अलग विज्ञान हमेशा आपस में
नहीं मिलते, जैसे तारों का 

731
00:54:17,800 --> 00:54:22,600
विज्ञान और पौधों का विज्ञान। 
ये दोनों सच हैं इसलिए ये आपस में

732
00:54:22,600 --> 00:54:26,280
लड़ते नहीं। 
पर इसका मतलब यह नहीं कि पौधों को

733
00:54:26,280 --> 00:54:31,000
तारों से जोड़ना जरूरी है। 
यही बात दिमाग और एवोल्यूशन पर भी

734
00:54:31,000 --> 00:54:34,320
लागू होती है। 
हो सकता है डार्विन का नियम सही 

735
00:54:34,320 --> 00:54:39,640
हो और हो सकता है मेरे दिमाग का 
नियम भी सही हो पर जरूरी नहीं। 

736
00:54:39,760 --> 00:54:41,960
कि दोनों को एक दूसरे की जरूरत 
पड़े। 

737
00:54:43,080 --> 00:54:46,840
विज्ञान में अक्सर चीजें एक दूसरे
से बिल्कुल अलग होती हैं। 

738
00:54:49,920 --> 00:54:54,680
नई सोच वाले चाहते हैं कि 
बायोलोजी सब कुछ समझाये पर असल 

739
00:54:54,680 --> 00:54:58,200
में अलग अलग विज्ञान के बीच 
रिश्ता ढूँढना बहुत मुश्किल काम 

740
00:54:58,200 --> 00:55:01,360
है। 
यह कहना कि सब कुछ जुड़ा है, बस 

741
00:55:01,360 --> 00:55:05,520
एक बड़ी बात है। 
इसे साबित करने के लिए मजबूत सबूत

742
00:55:05,520 --> 00:55:08,280
चाहिए। 
सिर्फ बातों से काम नहीं चलेगा। 

743
00:55:09,280 --> 00:55:11,760
तो दिमाग कैसे बना? 
यह एक अलग कहानी है। 

744
00:55:11,840 --> 00:55:15,560
दिमाग आज कैसे काम करता है? 
यह एक अलग कहानी है। 

745
00:55:15,880 --> 00:55:19,240
हमें इन दोनों को जबरदस्ती मिलाने
की जरूरत नहीं है। 

746
00:55:22,040 --> 00:55:28,200
दूसरा गलत तर्क है, काम का मकसद 
यानी टेलीोलॉजी बायोलोजी और दिमाग

747
00:55:28,200 --> 00:55:32,920
के विज्ञान में एक खास बात है। 
हमें यह पता करना पड़ता है कि कौन

748
00:55:32,920 --> 00:55:37,520
सा हिस्सा क्या काम करता है। 
जैसे दिल का काम खून को शरीर में 

749
00:55:37,520 --> 00:55:41,240
दौड़ाना है। 
आँखों का काम दुनिया को देखना है।

750
00:55:42,160 --> 00:55:46,520
कुछ लोग कहते हैं कि बिना क्यों 
पूछे हम विज्ञान नहीं समझ सकते। 

751
00:55:47,120 --> 00:55:52,160
आपको पूछना पड़ेगा कि कोई चीज़ 
किस काम के लिए बनी है, पर यहाँ 

752
00:55:52,160 --> 00:55:56,480
एक बड़ी गड़बड़ है। 
लोग कहते हैं कि काम का मतलब वही 

753
00:55:56,480 --> 00:55:58,640
है जिसके लिए डार्विन ने हमें 
चुना। 

754
00:56:00,080 --> 00:56:03,520
वे कहते हैं कि डार्विन ने हमें 
क्यों का जवाब देना सिखाया? 

755
00:56:04,080 --> 00:56:08,440
अगर आपके दिमाग को समझना है तो 
उसकी पुरानी कहानी यानी उसके 

756
00:56:08,440 --> 00:56:12,960
एवोल्यूशन को जानना होगा। 
बिना डार्विन के आप काम को नहीं 

757
00:56:12,960 --> 00:56:16,560
समझ सकते पर मैं इस बात को नहीं 
मानता। 

758
00:56:17,080 --> 00:56:19,520
डार्विन की कहानी पुरानी यादों 
जैसी है। 

759
00:56:19,640 --> 00:56:25,400
वह कहती है कि दिल आज खून दौड़ाता
है क्योंकि पुराने जमाने में इसे 

760
00:56:25,400 --> 00:56:30,280
इसी काम के लिए चुना गया था। 
ज़रा सोचिए अगर डार्विन की बात 

761
00:56:30,440 --> 00:56:35,360
गलत निकल जाए तो क्या दिल खून साफ
करना बंद कर देगा? 

762
00:56:35,760 --> 00:56:38,680
नहीं। 
दिल अपना काम फिर भी करता रहेगा। 

763
00:56:39,640 --> 00:56:43,960
हमें किसी चीज़ का काम समझने के 
लिए उसका इतिहास जानने की जरूरत 

764
00:56:43,960 --> 00:56:49,880
नहीं जैसे हाथ पकड़ने के लिए है। 
आखिर देखने के लिए पुराने 

765
00:56:49,880 --> 00:56:54,200
डॉक्टरों ने डार्विन को पढ़े बिना
ही दिल का काम समझ लिया था। 

766
00:56:54,280 --> 00:56:58,360
हवाई जहाज के पंख क्या करते हैं, 
यह उसे देखकर पता चलता है। 

767
00:56:58,640 --> 00:57:02,240
उसके लिए करोड़ों साल पीछे जाने 
की जरूरत नहीं है। 

768
00:57:03,040 --> 00:57:05,760
सच तो यह है कि हम पहले काम देखते
हैं। 

769
00:57:06,480 --> 00:57:09,800
हम देखते हैं कि आज दिमाग क्या 
क्या कर सकता है। 

770
00:57:10,360 --> 00:57:14,440
फिर हम अंदाजा लगाते हैं। 
ये शायद इसीलिए हमें चुना गया 

771
00:57:14,440 --> 00:57:17,880
होगा। 
आज के काम को समझना आसान है पर 

772
00:57:18,280 --> 00:57:23,080
करोड़ों साल पुरानी कहानी का सबूत
ढूंढ़ना बहुत मुश्किल है। 

773
00:57:24,440 --> 00:57:29,280
तीसरा गलत तर्क है दिमाग की 
बनावट, उसकी कम्प्लेक्सिटी लोग 

774
00:57:29,280 --> 00:57:31,960
कहते हैं कि हमारा दिमाग बहुत 
कॉम्प्लेक्स है। 

775
00:57:32,120 --> 00:57:36,760
इतना मुश्किल और बढ़िया दिमाग 
सिर्फ डार्विन का चुनाव ही उनका 

776
00:57:36,760 --> 00:57:42,080
सेलेक्शन ही बना सकता है। 
पिंकर और बाकी लेखक बार बार यही 

777
00:57:42,080 --> 00:57:45,480
बात कहते हैं। 
उनके हिसाब से मुश्किल चीजें बिना

778
00:57:45,480 --> 00:57:50,400
सेलेक्शन के बन ही नहीं सकते, पर 
दिमाग का उलझा होना इस बात का 

779
00:57:50,400 --> 00:57:54,680
सबूत नहीं है। 
असली सवाल यह है कि पुराने पूर्वज

780
00:57:54,880 --> 00:57:59,200
पुराने एनसेस्टर से हम तक आने में
कितना बदलाव हुआ? 

781
00:58:00,240 --> 00:58:04,080
अगर यह बदलाव बहुत छोटा था तो यह 
धीरे धीरे नहीं हुआ होगा। 

782
00:58:04,520 --> 00:58:08,080
हमें अपने पुराने पूर्वज मंदिरों 
के दिमाग के बारे में कुछ नहीं 

783
00:58:08,080 --> 00:58:11,040
पता। 
हमें यह भी नहीं पता कि दिमाग की 

784
00:58:11,040 --> 00:58:15,600
नर्स सोच को कैसे बनाती है। 
हो सकता है कि नसों में एक छोटा 

785
00:58:15,600 --> 00:58:20,520
सा बदलाव हुआ हो और उस छोटे बदलाव
ने ही बंदर के दिमाग को इंसान 

786
00:58:20,520 --> 00:58:24,760
जैसा बना दिया हो। 
बंदर और इंसान का दिमाग देखने में

787
00:58:24,760 --> 00:58:29,000
एक जैसा ही लगता है, पर दोनों की 
सोच में दोनों के माइंडसेट में। 

788
00:58:29,280 --> 00:58:34,120
जमीन आसमान का फर्क है। 
इसका मतलब है कि छोटे से बदलाव ने

789
00:58:34,120 --> 00:58:38,600
बहुत बड़ा असर दिखाया। 
अगर ऐसा है तो यह करोड़ों साल का 

790
00:58:38,640 --> 00:58:44,160
धीरे धीरे होने वाला काम नहीं है।
सिर्फ दिमाग के उलझे होने से यह 

791
00:58:44,200 --> 00:58:47,080
साबित नहीं होता कि यह डार्विन का
ही खेल है। 

792
00:58:49,720 --> 00:58:52,360
डार्विन की कहानी में एक खास बात 
है। 

793
00:58:52,840 --> 00:58:55,920
शरीर की बनावट में थोड़ा सा बदलाव
आता है। 

794
00:58:56,320 --> 00:58:58,800
इसे जिंदा रहने में थोड़ा सा 
फायदा होता है। 

795
00:58:58,800 --> 00:59:03,800
जैसे जिराफ की गर्दन थोड़ी सी 
लंबी हुई, वह ऊंचे पेड़ के फल 

796
00:59:03,800 --> 00:59:07,480
थोड़े आसानी से खा सका। 
ऐसे धीरे धीरे गर्दन लंबी होती 

797
00:59:07,480 --> 00:59:10,840
गई। 
डार्विन का नियम तभी काम करता है 

798
00:59:10,840 --> 00:59:15,480
जब छोटे बदलाव से छोटा फायदा हो। 
प्रख्यात दिमाग के साथ भी ऐसा ही 

799
00:59:15,480 --> 00:59:18,320
है। 
हमें इसके बारे में कुछ नहीं पता।

800
00:59:18,800 --> 00:59:22,920
हमें नहीं पता कि दिमाग किन्नर से
सोच को कैसे बनाती है। 

801
00:59:23,000 --> 00:59:27,640
हो सकता है कि नर्स में बहुत छोटा
बदला हुआ हो, पर उसे सोचने का 

802
00:59:27,640 --> 00:59:32,400
पूरा तरीका बदल गया हो। 
अंदर से इंसान बनने में शायद यही 

803
00:59:32,400 --> 00:59:36,840
हुआ हो। 
टुरिंग ने हमें कंप्यूटर के बारे 

804
00:59:36,840 --> 00:59:39,680
में सिखाया था। 
कंप्यूटर के प्रोग्राम में ज़रा 

805
00:59:39,680 --> 00:59:43,280
सा बदलाव करिए। 
तो वह मशीन एकदम अलग और बड़ा काम 

806
00:59:43,280 --> 00:59:46,280
करने लगती है। 
दिमाग भी शायद ऐसा ही हो। 

807
00:59:46,960 --> 00:59:51,640
अगर दिमाग के सारे हिस्से आपस में
जुड़े हैं तो एक छोटा सा बदलाव हर

808
00:59:51,640 --> 00:59:55,800
जगह फैल जाएगा। 
तो फिर नई सोच वाले डार्विन को 

809
00:59:55,800 --> 00:59:59,960
इतना क्यों मानते हैं? 
इसके पीछे एक मजेदार लॉजिक है। 

810
01:00:01,440 --> 01:00:07,240
हर डिब्बा, हर मॉड्यूल अपने साथ 
एक खजाना, एक डेटबेस लेकर आता है।

811
01:00:07,720 --> 01:00:13,240
यह वो बातें हैं जो हम बचपन से 
जानते हैं और रेशनलिस्ट जैसे 

812
01:00:13,240 --> 01:00:17,280
डेकाट अलग सोचते थे। 
उन्हें लगता था कि बचपन का ज्ञान 

813
01:00:17,280 --> 01:00:22,160
मेस जैसा पक्का होता है जैसे। 
2+2 इक्वल्स फोर पर आज के 

814
01:00:22,160 --> 01:00:27,280
वैज्ञानिक कुछ और कहते हैं। 
हमारे अंदर ऐसी बहुत सी बातें हैं

815
01:00:27,280 --> 01:00:31,680
जो सिर्फ हमारे एनवायरनमेंट के 
लिए सच हैं, जैसे साथ चलने वाली 

816
01:00:31,680 --> 01:00:36,480
चीजें एक ही होती हैं या गहरी जगत
से गिरना खतरनाक है। 

817
01:00:36,960 --> 01:00:41,600
ये बातें हर पॉसिबल वर्ल्ड में सच
नहीं होती पर हमारी दुनिया में ये

818
01:00:41,600 --> 01:00:45,000
सच है। 
अब सवाल है कि हमें ये बातें पहले

819
01:00:45,000 --> 01:00:48,760
से कैसे पता है? 
इसका जवाब सिर्फ ड्रार्विन के पास

820
01:00:48,760 --> 01:00:51,400
है। 
हमारी दुनिया के हिसाब से ही 

821
01:00:51,400 --> 01:00:57,040
हमारा दिमाग चुना गया है। 
इसीलिए बंद डिब्बों वाली सोच बंद 

822
01:00:57,080 --> 01:01:00,640
मॉड्यूल्स वाली सोच को डार्विन की
जरूरत पड़ती है। 

823
01:01:02,400 --> 01:01:06,560
अब यह एक मजेदार बात समझिए। 
दिमाग के डिब्बों और डार्विन का 

824
01:01:06,560 --> 01:01:10,080
गहरा रिश्ता है। 
माना कि दिमाग की बनावट में थोड़ा

825
01:01:10,080 --> 01:01:13,680
बदलाव हो सकता है। 
पर क्या किस्मत से हमें सारी 

826
01:01:13,680 --> 01:01:16,360
सच्चाई पता चल जाएगी? 
बिल्कुल नहीं। 

827
01:01:16,680 --> 01:01:21,200
यह पॉसिबल ही नहीं है। 
बच्चे पैदा होते ही कुछ बातें 

828
01:01:21,200 --> 01:01:26,760
जानते हैं जैसे बिना सहारे के 
चीजें नीचे गिरती हैं या एक चीज़ 

829
01:01:26,760 --> 01:01:31,240
के सारे हिस्से साथ चलते हैं। 
ये सारी बातें हमारी दुनिया के 

830
01:01:31,240 --> 01:01:35,360
लिए सच है पर ये सच दिमाग में 
अपने आप नहीं आ सकते। 

831
01:01:36,080 --> 01:01:40,840
इस एक एग्ज़ैम्पल से समझिए, मान 
लीजिए आपने फ़ोन डाइरेक्टरी के 

832
01:01:40,840 --> 01:01:44,480
पन्ने काट दिए। 
अब आप नामों और नंबरों को आंख बंद

833
01:01:44,480 --> 01:01:49,320
करके जोड़ रहे हैं, क्या पक्का है
कि सही नाम को सही नंबर मिलेगा? 

834
01:01:49,480 --> 01:01:53,520
कभी नहीं यह तो बस एक अक्सीडेंट 
होगा एक इत्तफाक। 

835
01:01:53,640 --> 01:01:57,320
इतनी सारी सच्ची बातें दिमाग में 
लाने के लिए कोई चाहिए? 

836
01:01:58,240 --> 01:02:01,840
नेचर में डार्विन का चुनाव नेचुरल
सेलेक्शन ही वह टीचर है। 

837
01:02:02,400 --> 01:02:06,560
वो हमारे दिमाग में ये पक्की 
सच्चाई भरता है ताकि हम अपनी 

838
01:02:06,560 --> 01:02:13,280
दुनिया में ठीक से रह सकें। 
इंसानी लैंगुएज के बारे में सोचना

839
01:02:13,280 --> 01:02:17,120
बहुत मजेदार है। 
यह भी दिमाग का एक खास डिब्बा है,

840
01:02:17,760 --> 01:02:20,560
पर इसका डार्विन की कहानी से कम 
लेना देना है। 

841
01:02:21,280 --> 01:02:25,240
दूसरे डिब्बों को दुनिया की 
सच्चाई जाननी पड़ती है पर लैंगुएज

842
01:02:25,240 --> 01:02:28,240
को सिर्फ दूसरे लोगों की सोच 
जाननी है। 

843
01:02:29,080 --> 01:02:31,040
अगर हम एक ही स्पीशीज़ के लोग 
हैं। 

844
01:02:31,480 --> 01:02:34,480
तो मेरे दिमाग के नियम और आपके 
नियम एक जैसे होंगे। 

845
01:02:35,120 --> 01:02:38,680
मुझे आपकी बात समझने के लिए सिर्फ
आपके जैसा होना है। 

846
01:02:39,040 --> 01:02:42,240
इसके लिए हमें करोड़ों साल के 
सेलेक्शन की जरूरत नहीं। 

847
01:02:42,880 --> 01:02:47,960
इसलिए जोम्स्की कहते हैं कि 
लैंगुएज पैदाशी तो है पर यह 

848
01:02:47,960 --> 01:02:51,960
डार्विन का कोई खास खेल कोई। 
अडेप्टेशन नहीं है। 

849
01:02:53,520 --> 01:02:57,440
तो अगर आप मानते हैं कि पूरा 
दिमाग डिब्बों से बना है तो आपको 

850
01:02:57,440 --> 01:03:01,160
डार्विन की बात भी माननी ही 
पड़ेगी क्योंकि बिना उसके इन 

851
01:03:01,240 --> 01:03:05,680
डिब्बों में जानकारी नहीं आएगी। 
पर जैसा कि मैंने पहले भी कहा है,

852
01:03:06,120 --> 01:03:09,080
हमारा दिमाग सिर्फ छोटे डिब्बों 
का ढेर नहीं है। 

853
01:03:09,200 --> 01:03:12,240
हमारा दिमाग बड़ी सोच में बहुत 
माहिर है। 

854
01:03:12,840 --> 01:03:15,440
हम पहेलियों को सुलझाने में 
एक्सपर्ट हैं। 

855
01:03:16,120 --> 01:03:19,600
इंसान और मंदिर के दिमाग में बस 
जानकारी का फर्क नहीं है। 

856
01:03:19,800 --> 01:03:24,720
ऐसा नहीं है कि हमारे पास बस 
ज्यादा बात नहीं जमा है, बल्कि 

857
01:03:24,720 --> 01:03:27,720
हमारे सोचने का तरीका ही बदल गया 
है। 

858
01:03:27,800 --> 01:03:32,080
बंदर से इंसान बनने के बीच दिमाग 
में एक बड़ी छलांग लगी है। 

859
01:03:32,360 --> 01:03:36,600
इसी छलांग की वजह से हम आज यहाँ 
तक पहुँच पाए हैं। 

860
01:03:38,600 --> 01:03:44,520
अब तक हमने बहुत सारी बातें की। 
मैं आपको सब कुछ छोटा करके बताता 

861
01:03:45,600 --> 01:03:48,240
हूँ। 
हमारी बहुत सी सोच पहेली सुलझाने 

862
01:03:48,240 --> 01:03:52,000
जैसी है। 
अगर ऐसा है तो दिमाग डिब्बों वाला

863
01:03:52,000 --> 01:03:57,400
नहीं डिब्बित तो अपनी जानकारी में
बंद रहते हैं पर पहेली सुलझाने के

864
01:03:57,400 --> 01:04:01,880
लिए सब कुछ देखना पड़ता है। 
दिमाग को पूरे सिस्टम यानी ग्लोबल

865
01:04:01,880 --> 01:04:07,520
सिस्टम की जरूरत होती है। 
बड़ी सोच यानी ग्लोबल थिंकिंग 

866
01:04:07,520 --> 01:04:11,000
सिर्फ सिनटैक नहीं है, सिर्फ 
लिखावट नहीं है। 

867
01:04:11,600 --> 01:04:15,040
लिखावट सिर्फ ख्यालों के अंदरूनी 
हिस्सों को देखती है। 

868
01:04:15,360 --> 01:04:18,520
यह तरीका सिर्फ पास की चीजों को 
समझता है। 

869
01:04:19,000 --> 01:04:22,440
पर बड़ी सोच तो पूरे ख्यालों को 
एक साथ देखती है। 

870
01:04:22,600 --> 01:04:26,080
इसलिए। 
बड़ी सोच और सिर्फ लिखावट में 

871
01:04:26,080 --> 01:04:30,480
फर्क है। 
ख्यालों के अंदर की लिखावट उसका 

872
01:04:30,480 --> 01:04:36,000
सिन्टेक्स पक्का होता है। 
इससे बाहर के कॉन्टेक्स्ट से फर्क

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01:04:36,000 --> 01:04:38,800
नहीं पड़ता। 
अगर हमारी सोच सिर्फ अंदर की 

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01:04:38,800 --> 01:04:42,720
लिखावट पर टिक्की है तो उसे एक 
दिमाग से दूसरे में ले जाना 

875
01:04:42,720 --> 01:04:46,280
मुश्किल है। 
वह अपनी जगह पर ही पक्की हो जाती 

876
01:04:46,280 --> 01:04:48,080
है। 
फिक्स्ड हो जाती है। 

877
01:04:49,800 --> 01:04:54,760
बड़ी सोच भी शायद एक मशीन हो पर 
यह सिर्फ अंदरूनी हिस्सों के मेल 

878
01:04:54,760 --> 01:04:58,480
को नहीं देखती। 
यह ख्यालों के आपस के बाहरी 

879
01:04:58,480 --> 01:05:01,800
रिश्तों को भी देखती है। 
अगर ऐसा है। 

880
01:05:01,960 --> 01:05:06,720
तो दिमाग एक मशीन जैसा ही है, पर 
यह पुराने डिज़ैन वाला कंप्यूटर 

881
01:05:06,720 --> 01:05:10,480
नहीं है। 
पुराना डिज़ैन बाहरी रिश्तों को 

882
01:05:10,520 --> 01:05:21,850
नहीं समझ पाता। 
आज के लिए बस इतना ही हम फिर 

883
01:05:21,850 --> 01:05:25,530
मिलेंगे आपसे एक नई एपिसोड में एक
नई किताब के साथ। 

884
01:05:25,720 --> 01:05:30,800
मेरा नाम है रोहित और आप सुन रहे 
थे सिलेबस विथ रोहित धन्यवाद।

